हाइटेक युग में भी कागजी न्योता बरकरार

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हाइटेक युग में भी कागजी न्योता बरकरार मांगलिक कार्यक्रमों में भेजे जा रहे कार्ड प्रतिनिधि, भभुआ (सदर) जमाना हाइटेक हो गया. इ-मेल व मोबाइल फोन के बढ़ते प्रचलन में चिट्ठी-पाती व त्योहारों पर बधाई का तौर-तरीका बदल गया है. लेकिन, हाइटेक जमाना होने के बावजूद भी मांगलिक कार्यक्रमों में कागजी न्योता का परंपरा आज भी […]

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हाइटेक युग में भी कागजी न्योता बरकरार मांगलिक कार्यक्रमों में भेजे जा रहे कार्ड प्रतिनिधि, भभुआ (सदर) जमाना हाइटेक हो गया. इ-मेल व मोबाइल फोन के बढ़ते प्रचलन में चिट्ठी-पाती व त्योहारों पर बधाई का तौर-तरीका बदल गया है. लेकिन, हाइटेक जमाना होने के बावजूद भी मांगलिक कार्यक्रमों में कागजी न्योता का परंपरा आज भी बरकरार है. इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी माना जाता है कि यह लोगों की परंपरा से जुड़ा हुआ है. दूसरे इ-मेल, मैसेज, फोन की अपेक्षा कार्ड से कार्यक्रम के बारे में विस्तृत जानकारी भी मिल जाती है. पिछले डेढ़ दशक में लोगों के रहन-सहन और जिंदगी जीने के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है. खासतौर पर युवा वर्ग पश्चिमी लबादा ओढ़ चुका है या फिर ओढ़ने के प्रयास में लगे होने के चलते इनके रहन-सहन में भी काफी बदलाव आया है. उदाहरण के तौर पर पहले दिसंबर माह आते ही लोग दोस्त, मित्र, रिश्तेदारों को नववर्ष की बधाई के लिए ग्रीटिंग कार्ड भेजने में जुट जाते थे. वहीं, एक-दूसरे का कुशल क्षेम जानने के लिए पत्र का सहारा लिया जाता था. आकस्मिक परिस्थितियों में तार भेजे जाते थे. लेकिन, समय बदला, संचार क्रांति आयी, फोन और मोबाइल का प्रचलन बढ़ा तो लोग इन पुरानी चीजों को छोड़ कर हाइटेक होने लगे और चिट्ठी लिखना छोड़ दिए. इनके बदले में लोगों द्वारा बधाई पत्र भेजने के बजाय एसएमएस और मोबाइल पर वाट्सएप का उपयोग होने लगा. पिछले कुछ वर्षों में इ-मेल की प्रक्रिया में तेजी आयी है. लेकिन, वैवाहिक और मांगलिक कार्यक्रमों में आज भी कागज के आमंत्रण पत्र की परंपरा बदस्तूर जारी है. बल्कि यूं कह सकते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों की सूचना यदि फोन या मोबाइल पर दी जाये. तो लोग यह मान कर चलते हैं कि उन्हें निमंत्रण मिला ही नहीं है. इस संबंध में भूपेश गुप्त कॉलेज स्थित समाजशास्त्र के प्रोफेसर राजनाथ सिंह इसका कई कारण मानते हैं. इनका कहना है कि किसी चीज की बधाई देना अलग बात है. पहले निमंत्रण में हल्दी भेजी जाती थी. बाद में कार्ड का प्रचलन हुआ. इसके पीछे प्रमुख कारण है कि मांगलिक कार्यों में हल्दी को शुभ माना जाता है. इसके लिए कार्ड का कलर भी हमेशा शुभ रंग का ही होता है और कार्ड भेजने से पहले हम इस पर हल्दी लगाते हैं. ऐसे में हम यह कह सकते हैं कि यह कहीं न कहीं समाज की परंपरा व आस्था से जुड़ा है और जो चीज आस्था से जुड़ी होती है. उसका महत्व कभी कम नहीं होता. दूसरी चीज यह भी है कि इ-मेल या मैसेज से हम उतनी विस्तृत जानकारी नहीं दे सकते. जितना हम कार्ड पर लिखवा सकते हैं. इस पर हम हल्दी भी नहीं लगा सकते हैं. शहर के आम नागरिकों का मत भी कुछ ऐसा ही है. शहरवासी शिव प्रताप सिंह व कुणाल पांडेय आदि का कहना है कि कार्ड का प्रचलन कम नहीं होने का प्रमुख कारण हमारी परंपरा और आस्था से जुड़ा होना है. दूसरी चीज कार्यक्रमों को याद रखने के लिए निमंत्रण कार्ड एक बेहतर माध्यम साबित होता है.

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