संरक्षण के अभाव में विलुप्त हो रहे प्राचीन अवशेष

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 04 Dec 2017 8:25 AM

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हुलासगंज : जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर और प्रखंड मुख्यालय से आठ किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है केउर गांव. प्राचीन और ऐतिहासिक विरासतों से परिपूर्ण है केउर. यहां पालकालीन और नालंदा विश्वविद्यालय के समय के कई प्राचीन अवशेष और मूर्तियां हैं. प्रसिद्ध इतिहासकार और पुरातत्वविद ए बनर्जी ने 1939 में इस गांव का दौरा किया […]

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हुलासगंज : जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर और प्रखंड मुख्यालय से आठ किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है केउर गांव. प्राचीन और ऐतिहासिक विरासतों से परिपूर्ण है केउर. यहां पालकालीन और नालंदा विश्वविद्यालय के समय के कई प्राचीन अवशेष और मूर्तियां हैं.
प्रसिद्ध इतिहासकार और पुरातत्वविद ए बनर्जी ने 1939 में इस गांव का दौरा किया था. यहां एक बहुत बड़ा गढ़ है, जिसकी ऊंचाई 40 फुट है. इस गढ़ की खुदाई के दौरान पाल काल की कई मूर्तियां मिली थीं, जो 10वीं एवं 12वीं सदी की हैं. खुदाई के क्रम में यहां बड़ी-बड़ी ईंटें भी मिली थीं, जिनकी लंबाई 14 इंच चौड़ाई 8.5 इंच और ऊंचाई 3 इंच है. केउर के ग्रामीण नरेश प्रसाद ने बताया कि इस गांव में ऐतिहासिक अवशेषों का भंडार है, परंतु उदासीनता और संरक्षण के अभाव में कई अवशेष चोरी हो चुके हैं.
मसूरी और मिश्री : एक समय में केउर का मसूरी और मिश्री काफी प्रसिद्ध थी. यहां के खेतों की उपजी मसूरी में अन्य मसूर की दाल की अपेक्षा ज्यादा स्वाद रहता है परंतु किसानों को इसका उचित मूल्य नहीं मिलता है. प्राचीन समय में यहां का मिश्री उद्योग काफी प्रसिद्ध उद्योग था. यहां की मिश्री की खासियत उसके बनाने के तरीके और स्वाद की वजह से थी. परंतु अब यह कुटीर उद्योग बंद हो चुका है. केउर में एक-दो लोग ही बचे हैं जो इस खास मिश्री को बनाना जानते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि अगर सरकारी सहयोग मिले इस मिश्री उद्योग से सैकड़ों लोगों को रोजगार मिल सकता है.
ज्योतिष विद्या केंद्र : ग्रामीणों ने बताया कि यहां नालंदा विश्वविद्यालय से संबंधित ज्योतिष विद्या केंद्र भी था. नालंदा विश्वविद्यालय में ज्योतिष विज्ञान के छात्र केउर में ही रहकर ज्योतिष विद्या की शिक्षा प्राप्त करते थे.
केउर में कभी 52 तालाब थे, जो गांव के चारों तरफ स्थित थे परंतु सरकारी उदासीनता और अवैध कब्जे के कारण मात्र 14 तालाब ही अब बचे हैं. ज्यादातर तालाबों की चकबंदी पदाधिकारी द्वारा बंदोबस्ती कर दी गया थी जो कि गैरकानूनी है.
ग्रामीणों ने बताया कि इस गांव के चारों दिशाओं में श्मशान हैं, जिससे पता चलता है कि इस गांव में कालांतर में चार अलग- अलग राजाओं का शासन रहा होगा. वर्तमान में ये चारों श्मशान सरकारी रिकॉर्ड में नहीं हैं परंतु ग्रामीणों द्वारा सदियों से इनका उपयोग किया जा रहा है. केउर में अग्निदेव की एक दुर्लभ मूर्ति भी मिली है. इस तरह की एक मूर्ति नालंदा संग्रहालय में भी मिली है. ग्रामीणों ने बताया कि कुछ वर्ष पहले एक पुरातत्विद आये थे. उन्होंने बताया कि इस मूर्ति के 200 मीटर के दायरे में अलग- अलग जगहों पर और भी मूर्तियां होंगी.
प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत बनवरिया स्थित पहाड़ पर योगेश्वर नाथ प्राचीन मंदिर में पूर्णिमा के अवसर पर भव्य रूप से पूजा- अर्चना की जा जाती है. इस अवसर पर स्थानीय ग्रामीणों की भीड़ उमड़ पड़ती है. कात्यायनी शक्ति पीठ के प्रधान पुजारी जालेश्वर नाथ के द्वारा की जा रही है पूजा -अर्चना से वातावरण भक्तिमय हो जाता है.
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