गोपालगंज में वैज्ञानिकों ने किसानों को दिया प्रशिक्षण, बताया- खेतों के लिए खतरनाक है गाजर घास
जागरूकता अभियान चलाते वैज्ञानिक
Carrot Grass Awareness Campaign : गाजर घास एक तेजी से फैलने वाला आक्रामक खरपतवार है जो खेतों, सड़कों और घरों के आसपास उग आता है. यह न केवल फसलों को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि त्वचा और सांस संबंधी एलर्जी का कारण भी बनता है. जानिए इसे जड़ से खत्म करने और कंपोस्ट बनाने के प्रभावी तरीके.
Carrot Grass Awareness Campaign : गोपालगंज के कुचायकोट प्रखंड स्थित कृषि विज्ञान केंद्र सिपाया में गाजर घास जागरूकता सप्ताह के तहत अभियान चलाया गया. वैज्ञानिकों ने किसानों और कर्मचारियों को इस तेजी से फैलने वाले खरपतवार के कृषि और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की जानकारी दी. केंद्र की वरीय वैज्ञानिक सह प्रधान डॉ. अनुपमा कुमारी ने बताया कि समय रहते गाजर घास को नियंत्रित करना जरूरी है. उन्होंने फूल आने से पहले इसे जड़ समेत हटाने की सलाह दी.
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तेजी से फैल रहा है गाजर घास
कृषि विज्ञान केंद्र सिपाया की वरीय वैज्ञानिक सह प्रधान डॉ. अनुपमा कुमारी ने बताया कि गाजर घास एक समस्याग्रस्त और तेजी से फैलने वाला आक्रामक खरपतवार है. यह खाली जमीन, रेलवे लाइन, सड़क किनारे, घरों के आसपास और खेतों की मेड़ों पर आसानी से उग जाता है. भारत में इसका प्रकोप व्यापक रूप से फैल चुका है.
एक पौधा हजारों बीज पैदा कर सकता है
वैज्ञानिकों के अनुसार गाजर घास के बीज बहुत हल्के होते हैं. हवा, पानी, वाहन और पशुओं के माध्यम से इसके बीज दूर-दूर तक फैल सकते हैं. एक पौधे से 25 से 50 हजार तक बीज पैदा होने की क्षमता बताई गई है. यही कारण है कि समय पर नियंत्रण नहीं होने पर इसका फैलाव हर साल बढ़ सकता है.
फसलों की बढ़वार पर भी पड़ता है असर
गाजर घास खेतों में फसलों के साथ पोषक तत्व, पानी, सूर्यप्रकाश और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करता है. इससे फसलों की उपज और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है. वैज्ञानिकों ने बताया कि इसकी जड़ों से निकलने वाले एलेलोपैथिक रसायन आसपास उगने वाले दूसरे पौधों की बढ़वार को भी प्रभावित कर सकते हैं.
त्वचा और सांस से जुड़ी समस्या का खतरा
गाजर घास के सीधे संपर्क में आने से कुछ लोगों में त्वचा संबंधी एलर्जी, खुजली, चकत्ते और डर्मेटाइटिस जैसी समस्या हो सकती है. इसके परागकण हवा में फैलने से छींक, एलर्जिक राइनाइटिस, अस्थमा और सांस लेने में परेशानी जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं. लंबे समय तक संपर्क से संवेदनशील लोगों में समस्या बढ़ सकती है.
पशुओं के लिए भी उपयोगी नहीं
वैज्ञानिकों ने बताया कि गाजर घास पशु चारे के रूप में उपयोगी नहीं है. इसके कारण पशुओं के लिए भी नुकसान की आशंका रहती है. इसलिए चारागाहों और पशुओं के आसपास इसके फैलाव को रोकना जरूरी है. किसानों को इसे चारे के रूप में इस्तेमाल नहीं करने की सलाह दी गई.
फूल आने से पहले जड़ समेत उखाड़ने की सलाह
गाजर घास के नियंत्रण के लिए वैज्ञानिकों ने समय रहते इसके उन्मूलन पर जोर दिया. फूल आने से पहले इसे जड़ समेत उखाड़कर नष्ट करने की सलाह दी गई, ताकि इसमें बीज न बन सकें. इसे हटाते समय दस्ताने और अन्य सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करने की सलाह भी दी गई है.
उखाड़ी गई घास से बनाई जा सकती है कंपोस्ट
अभियान के दौरान बताया गया कि फूल आने से पहले उखाड़ी गई गाजर घास को उचित तरीके से कंपोस्ट पिट में जैविक खाद बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. इसे सूक्ष्म जैविक मिश्रण और मिट्टी के साथ परतों में भरकर कंपोस्ट तैयार करने की जानकारी दी गई. तैयार जैविक खाद भूमि की उर्वरता बढ़ाने में सहायक हो सकती है.
संस्थान परिसर को गाजर घास मुक्त बनाने की पहल
कृषि विज्ञान केंद्र के कर्मचारियों ने संस्थान परिसर में स्वयं गाजर घास को उखाड़कर एकत्रित किया. किसानों से भी सामूहिक रूप से फूल आने से पहले इस खरपतवार को खत्म करने का आह्वान किया गया. केंद्र की ओर से पूरे सप्ताह अलग-अलग गतिविधियों के माध्यम से लोगों को गाजर घास के नुकसान और नियंत्रण के प्रति जागरूक किया गया.
वैज्ञानिकों और कर्मचारियों ने लिया हिस्सा
जागरूकता अभियान में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों और कर्मचारियों ने भाग लिया. कार्यक्रम के दौरान किसानों को गाजर घास की पहचान, उसके प्रसार को रोकने और सुरक्षित तरीके से उन्मूलन की जानकारी दी गई. अभियान का उद्देश्य खेतों, आसपास के क्षेत्रों और संस्थान परिसर को इस खरपतवार के प्रकोप से बचाना रहा.
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