बरौली विधान सभा: नीतीश का डेवलपमेंट फैक्टर आया काम

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बरौली विधान सभा: नीतीश का डेवलपमेंट फैक्टर आया काम राजद की जीत पर बोले राजनीतिक विशेषज्ञ फोटो नं- 16मो अली इमाम अधिवक्ता – आमने बरौली में नीतीश का डेबलपमेंट फैक्टर राजद की जीत का कारण बना. विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद राजद की हुई जीत पर अपना विश्लेषण देते हुए अधिवक्ता मो अली […]

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बरौली विधान सभा: नीतीश का डेवलपमेंट फैक्टर आया काम राजद की जीत पर बोले राजनीतिक विशेषज्ञ फोटो नं- 16मो अली इमाम अधिवक्ता – आमने बरौली में नीतीश का डेबलपमेंट फैक्टर राजद की जीत का कारण बना. विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद राजद की हुई जीत पर अपना विश्लेषण देते हुए अधिवक्ता मो अली इमाम ने कहा कि राजद की जीत के कई कारण रहे हैं. पहला तो ये दाल की महंगाई तथा भागवत जी का आरक्षण वाला मुद्दा आम जनता के दिमाग में बैठे रहे. बिहार में लालू और नीतीश का महागंठबंधन जातीय ध्रुवीकरण करने में सफल रहा है. खास कर के मुसलिम, यादव और कुर्मी जहां एक खेमे में हो गये, वहीं पिछड़ा और अतिपिछड़ा ने भी नीतीश सरकार द्वारा किये गये कार्यों को याद रखा. जहां तक प्रधानमंत्री जी का कार्यक्रम का सवाल है, तो उनकी रैली से खास कर बरौली में पार्टी को लाभ कम, नुकसान ज्यादा हुआ है. धर्म के नाम पर मोदी जी की दलील ने एक खास वर्ग को एकजुट कर दिया और वोट उनके विपक्ष में गया. जहां तक बरौली का सवाल है, यहां स्थानीय स्तर पर एंटी कांबेन्सी फैक्टर भी हावी रहा. वैसे लोग जो भाजपा के विधायक से नाराज थे, वे भी राजद के खेमे में पहुंचे और भाजपा को हराने का काम किया. लोकल फैक्टर और विगत डेढ़ वर्षों में भाजपा की केंद्रीय सरकार द्वारा लोगों को कोई विशेष धरातल पर लाभ नहीं दिखाई दिया. नतीजतन भाजपा पर लोगों ने कम विश्वास किया. जहां तक विकास का सवाल है, लोगों को नीतीश कुमार में विकास को लेकर विश्वास घटा नहीं बल्कि उम्मीदें बनी रहीं और सब कुछ मिला कर एक ऐसा माहौल बना कि अन्य वर्ग के लोगों ने भी महागंठबंधन को वोट किया. चार बार से जीत रही भाजपा को बरौली में इस बार इस तरह से हार का सामना करना पड़ा है. भाजपा प्रत्याशी नहीं जगा सके विश्वास फोटो नं-17प्रो विनोद कुमार सिंह -सामने 15 वर्ष बाद बरौली में भाजपा की हार हुई है. आखिर भाजपा की हार का क्या कारण है. भाजपा की हुई हार पर प्रो विनोद कुमार सिंह ने अपना विचार देते हुए बताया कि भाजपा प्रत्याशी वोटरों में अपने प्रति विश्वास नहीं दिला सके. वैसे बरौली में विकास नगण्य रहा है. इसमें विधायक विफल रहे हैं. उन्होंने मतदाताओं को इस विश्वास में नहीं ले पाया कि भविष्य में भी वे काम करेंगे. उनके प्रयास या अन्य कारणों से जो कुछ बरौली में पर्याप्त हुआ उसे बचाने में पूरी तरह असफल रहे. इसके कारण मतदाताओं का विश्वास उन पर से हटता चला गया. उनके द्वारा ऐसा कोई काम नहीं किया गया, जो सार्वजनिक या मास स्तर लोगों को उनके तरफ कर सके. स्थानीय मुद्दों के द्वारा लालू-नीतीश के महागंठबंधन ने मुसलिम और कुर्मी को एक पटरी पर ला दिया. वहीं, यादवों को अपना बनाने में भाजपा पूरी तरह विफल रही. एक खास वर्ग के वोटरों का ध्रुवीकरण ने महागंठबंधन को जहां लाभ पहुंचाया, वहीं भाजपा को उसके ही कई मुद्दों ने हानि पहुंचाया. हालांकि मामूली जीत-हार और बिहार में बना समीकरण बरौली में बड़ी हार नहीं कही जा सकती है. कार्यकर्ताओं तक नहीं सिमट कर खुद से अगर छह माह पूर्व से रामप्रवेश राय प्रयास किये होते, तो बरौली में शायद ये स्थिति नहीं बनती.

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