जीवन की सांझ में ‘धोखा’
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :18 Jan 2018 4:02 AM (IST)
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शर्मनाक. नहीं रख रहे बुजुर्ग का ध्यान, फाइल में कानून तेजी से बढ़ रही हैं बुजुर्गों पर जुल्म ढाने की घटनाएं अपना दर्द भी सार्वजनिक नहीं करते बुजुर्ग गोपालगंज : यह मानवता को झकझोरने वाली खबर है. जीवन की सांझ में अपनों के ‘धोखा’ से बुजुर्ग आहत हैं. अपने ही घर के भीतर वे असुरक्षित […]
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शर्मनाक. नहीं रख रहे बुजुर्ग का ध्यान, फाइल में कानून
तेजी से बढ़ रही हैं बुजुर्गों पर जुल्म ढाने की घटनाएं
अपना दर्द भी सार्वजनिक नहीं करते बुजुर्ग
गोपालगंज : यह मानवता को झकझोरने वाली खबर है. जीवन की सांझ में अपनों के ‘धोखा’ से बुजुर्ग आहत हैं. अपने ही घर के भीतर वे असुरक्षित हैं. तेजी से आगे बढ़ते युवाओं के लिए परंपरा, मूल्य या संस्कृति निर्जीव शब्द जैसे हो गये हैं. आज मां-बाप बच्चों को बोझ लगने लगे हैं. बुजुर्ग अपना दर्द सार्वजनिक नहीं करना चाहते. मुंह खोलने पर परेशानी और बढ़ने की आशंका उन्हें सताती है. बदनामी का भी डर बना रहता है. इसके कारण घटनाएं और बढ़ रही हैं.
पिछले पांच दिनों के भीतर दो घटनाएं सामने आयी हैं, जो मानवता को शर्मसार करनेवाली हैं. बुजुर्गों के साथ मारपीट की शिकायतें भी अब बढ़ने लगी हैं. 39 फीसदी बुजुर्गों को परिवारवालों की पिटाई का शिकार होना पड़ता है. परिस्थितियां इस कदर बदल रही हैं कि बुजुर्गों की दर्द भरी दास्तान सुनकर कानों को यकीन भी न हो, जिन बच्चों की परवरिश में मां-बाप अपना पूरा जीवन खपा देते हैं वही उन्हें बेघर कर देते हैं.
क्या कहते हैं कानूनविद
मां-बाप को संरक्षण देने के लिए कानून पहले से बना है. लोगों को इसकी जानकारी नहीं है. इसके तहत पुत्र को अपने मां-बाप के भरण-पोषण की जवाबदेही है. अगर वे इससे मुकरते हैं तो उन पर कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है. सजा का प्रावधान है. प्रशासन के अधिकारियों को इसके लिए गंभीर होना होगा.
शैलेश तिवारी, अध्यक्ष, जिला विधिज्ञ संघ, गोपालगंज
क्या कहता है कानून
माता-पिता के संरक्षण के लिए कानून भी बने हैं. ऐसा ही एक कानून है, ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का रख-रखाव व कल्याण अधिनियम-2007’. इसमें बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के प्रावधान हैं. वृद्धावस्था से संबंधित चुनौतियों से निबटने के लिए यह एक ऐतिहासिक कानून है. इसमें दोष सिद्ध होने पर पर 10 वर्ष की सजा तक हो सकती है. जानकारी का अभाव और बदनामी के डर के चलते बुजुर्ग खुद ही कानून का सहारा लेने में हिचकते हैं. कई मामलों में बुजुर्ग अपने बच्चों को इस कदर प्यार करते हैं कि उनकी प्रताड़ना भी खामोशी से सह लेते हैं.
विजयीपुर थाना क्षेत्र के मझवलिया गांव में 55 वर्षीया फुलेश्वरी कुंवर के पति रामवृक्ष सेनुहार की मौत 15 साल पहले बीमारी के कारण हो गयी थी. उस समय फुलेश्वरी के दोनों बेटे किशोरावस्था में थे. पति की मौत के बाद फुलेश्वरी ने संघर्ष कर उन्हें बड़ा किया. बच्चे जब बड़े हुए, मां के सपनों को पूरा करने का वक्त आया तो वही उन्हें बोझ लगने लगी. दोनों बेटे पांच साल पहले फुलेश्वरी को छोड़ कर चले गये. पिछले रविवार को पोंछा लगाते समय वह बेहोश हो गयी और उसकी जान चली गयी. हालत यह थी कि अंतिम संस्कार करनेवाला कोई नहीं था. अंत में पंचायत के प्रतिनिधियों ने फुलेश्वरी का अंतिम संस्कार किया.
दूसरा मामला बरौली का है, जहां बेटे-बेटियों ने मां को जैसे-तैसे जीने के लिए उनके हाल पर छोड़ दिया. पिछले 15 दिनों से बरौली बाजार में 70 वर्षीया उर्मिला देवी ठंड से लड़ रही है. पति की मौत पहले ही हो चुकी है. बेटा हरियाणा में काम करता है. कुछ दिन बेटी के यहां रही. बाद में बेटी ने भी उसका साथ छोड़ दिया.
इस उम्मीद में वह बरौली पहुंची कि जमीन व मकान उसके भतीजे शंभु साह के पास है, जहां आसरा मिल जायेगा. लेकिन, जमीन रजिस्ट्री कराने के बाद भतीजा बेगाना हो गया और अपनी चाची की मदद नहीं की. अब उम्र के अंतिम पड़ाव में उर्मिला जीने की जद्दोजहद कर रही है. मांग कर खाती है और फुटपाथ पर समय काट रही है.
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