तीन वर्षीय बेटे अभिनव ने दी मुखाग्नि

Published at :21 Jul 2016 4:37 AM (IST)
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तीन वर्षीय बेटे अभिनव ने दी मुखाग्नि

दुखद क्षण. चरित्रवन घाट पर नम आंखों से दी गयी शहीद को विदाई, फफक पड़े लोग बक्सर : नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में शहीद जवान अनिल कुमार सिंह को बुधवार की सुबह नम आंखों से विदाई दी गयी. बक्सर के चरित्र वन घाट पर शहीद का अंतिम संस्कार किया गया. उनका पार्थिव शरीर बक्सर पहुंचते […]

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दुखद क्षण. चरित्रवन घाट पर नम आंखों से दी गयी शहीद को विदाई, फफक पड़े लोग

बक्सर : नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में शहीद जवान अनिल कुमार सिंह को बुधवार की सुबह नम आंखों से विदाई दी गयी. बक्सर के चरित्र वन घाट पर शहीद का अंतिम संस्कार किया गया. उनका पार्थिव शरीर बक्सर पहुंचते ही पूरा माहौल गमगीन हो उठा. स्थिति उस समय हृदय विदारक हो गयी, जब तीन साल के मासूम अभिनव ने अपने पापा को मुखाग्नि दी. उसके बड़े पापा राजाराम ने गोद में लेकर मदद की. उसके बाद राजाराम अपने भतीजे को गोद में लेकर जमीन पर बैठ कर फफक पड़े. इससे मौके पर मौजूद लोग भी रो पड़े. जिले के आला अफसर भी अपने आंसू नहीं रोक पाये.
वहीं मुखाग्नि के साथ ही पूरा माहौल शहीद अनिल अमर रहे के नारों से गूंज उठा. इससे पहले सशस्त्र बलों द्वारा सलामी दी गयी. सुबह करीब सात बजे शहीद का पार्थिव शरीर वाहनों के काफिले के साथ डुमरांव से बक्सर पहुंचा. इस दौरान पूरे रास्ते जब तक सूरज-चांद रहेगा अनिल तेरा नाम रहेगा के नारे लगते रहे. डुमरांव से लेकर बक्सर गगनभेदी नारों से गूंजता रहा. पार्थिव शरीर के बक्सर पहुंचने पर अफसरों द्वारा पुष्पंजलि अर्पित की गयी.
उसके बाद अंतिम संस्कार किया गया. मौके पर डीएम रमण कुमार, एसपी उपेंद्र शर्मा, एसडीओ गौतम कुमार. डीएसपी शैशव यादव, सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट, टाउन थानाध्यक्ष राघव दयाल सहित कई थानों की पुलिस सहित हजारों लोग उपस्थित थे. बता दें कि सोमवार को गया और औरंगाबाद की सीमा पर स्थित सोनदह जंगल में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में बक्सर के सपूत अनिल सिंह सहित 10 जवान शहीद हो गये थे. अनिल सिंह नावानगर प्रखंड के परमेश्वरपुर गांव निवासी रामचंद्र सिंह के पुत्र थे.
शहीद का पार्थिव शरीर आते ही डुमरांव में मचा कोहराम : मंगलवार की देर रात शहीद का पार्थिव शरीर आते ही डुमरांव में कोहराम मच गया. पति के वियोग में दो दिनों से बेसुध पड़ी मीरा शव देखते ही बिलख कर शव से लिपट कर रोने लगी. उसकी चीत्कार से पूरा माहौल गमगीन हो उठा. पति के पार्थिव शरीर को झकझोर को जगाने का प्रयास कर रही थी. कभी जोर-जोर से रोने लगती तो कभी पूरी तरह चुप होकर एकटक पति के चेहरे को निहारने लगती.
उसकी हालत देख लोग भी अपने आंसू नहीं रोक पा रहे थे. स्थिति उस समय हृदय विदारक हो उठी जब शहीद के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जाने लगा. उस समय पत्नी मीरा बार-बार नहीं ले जाने की गुहार लगा रही थी. उसका कहना था कि आरे हमारे पति को कहां ले जा रहे हैं. अभी तो कुछ देर पहले ही आयें हैं, कुछ देर देख तो लेने दीजिए.
वहीं बच्चे व घर के अन्य लोग भी अलग बिलख रहे थे. उसे किसी तरह शव से अलग किया गया़
और उसके बाद पार्थिव शरीर को ले जाया गया.
अनिल अमर रहें के नारों से गूंज उठा वातावरण शहीद को सशस्त्र बलों द्वारा दी गयी सलामी
सावन से पहले उजड़ गया मीरा का सुहाग
किसी भी सुहागन के लिए सावन का महीना खास होता है. इस महीने में सुहागन सोलह शृंगार करती है, पर मीरा के लिए यह सावन काफी दुखदायी रहा. सावन शुरू होने से पहले ही उसका सुहाग उजड़ गया. सावन का महीना भगवान शंकर व पार्वती का सबसे प्यारा महीना होता है. इसमें विवाहिता अपने पतियों को रिझाती हैं.
इसके लिए सोलह शृंगार करती हैं. इस माह में खुशियों का प्रतीक हरे रंग का भी महत्व होता है. आम महिलाओं की तरह मीरा भी सावन की तैयारी में जुटी थी. बाजार से हरी चूड़ी व हरी साड़ियां खरीदने की तैयारी कर रही थी. पर शायद भगवान को उसकी खुशी मंजूर नहीं थी. ऐसे में सावन का महीना शुरू होने से दो दिन पहले ही उसका सुहाग हमेशा के लिए छीन लिया.
जिसे पाला, उसी की अरथी को देना पड़ा कंधा
अनिल को बड़े नाज से पाला था. उसे कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी. आज उसी को कंधा देना पड़ रहा है. इतना कहते-कहते शहीद अनिल के बड़े भाई राजराम सिंह फफक पड़े. नियति ने उनके साथ बहुत क्रूर मजाक किया है. उनके बेटे जैसे भाई को छीन लिया, जिसे कभी चलना सिखाया, आज उसी के लिए अरथी तैयार करनी पड़ रही है. सोचा था बूढ़ा होने पर अनिल उनकी सेवा करेगा, पर आज उसी के पार्थिव शरीर को उठाना पड़ गया.
बताया जाता है कि बचपन में राजाराम व अनिल के पिता की मौत हो गयी थी. बड़ा भाई होने के कारण राजाराम सिंह पर पूरे परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदार थी. उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहण करते हुए अनिल को एक योग्य नागिरक बनाया.
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