दहशत भरी यात्रा : ट्रेनों की स्पीड 10 किलोमीटर प्रति घंटे की होती है

Published at :06 Aug 2015 12:29 AM (IST)
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दहशत भरी यात्रा : ट्रेनों की स्पीड 10 किलोमीटर प्रति घंटे की होती है

ठोरा नदी की पुलिया पर से गुजरनेवाले रेलयात्रियों का धक-धक करता है दिल बक्सर : उत्तरप्रदेश से बिहार में घुसते ही ट्रेनों की रफ्तार न सिर्फ धीमी होती है, बल्कि उसकी गति के साथ यात्राियों को कई तरह की फजीहत ङोलनी होती है. बिहार-उत्तरप्रदेश के बॉर्डर पर कर्मनाशा नदी पर बने पुल की मरम्मत लगातार […]

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ठोरा नदी की पुलिया पर से गुजरनेवाले रेलयात्रियों का धक-धक करता है दिल
बक्सर : उत्तरप्रदेश से बिहार में घुसते ही ट्रेनों की रफ्तार न सिर्फ धीमी होती है, बल्कि उसकी गति के साथ यात्राियों को कई तरह की फजीहत ङोलनी होती है. बिहार-उत्तरप्रदेश के बॉर्डर पर कर्मनाशा नदी पर बने पुल की मरम्मत लगातार होती रहती है. फिर भी उसकी जजर्रता गाड़ी की स्पीड को ब्रेक लगा देती है.
गाड़ी इस पुल से जब गुजरती है, तो उसकी स्पीड पांच से दस प्रति किलोमीटर की रफ्तार से हो जाती है और गाड़ियों को कॉसन के साथ चलाया जाता है. इस पुल से सटे ही मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर बक्सर-चौसा स्टेशन के बीच ठोरा नदी पर दूसरी पुलिया बनी है, जिस पुलिया से ट्रेन जब भी गुजरती है, तो जोरों की आवाज कंपन के साथ होती है, जो पुल की जजर्रता को जगजाहिर कर देता है.
बक्सर जिले सेक्टर में वैसे, तो रेलवे प्रबंधन के पास 35 पुलों व पुलियों के आंकड़े हैं, जिसमें यही दो पुल नदियों के ऊपर है, बाकी 33 पुल-पुलियों के नीचे से बरसाती पानी अथवा नहरों का पानी गुजरता है, जो आये दिन सूखे भी रहते हैं. इन पुल-पुलियों से करीब प्रतिदिन आठ दर्जन से ऊपर ट्रेनें गुजरती हैं, जिनमें यात्रा करनेवाले यात्राियों की जान को खतरा बना रहता है.
बक्सर जिले में 35 पुल-पुलिया हैं : रेल प्रबंधन के सूत्र बताते हैं कि 35 पुलियों में से सभी पुलियों की हालत ठीक है और उन पुलियों से ट्रेनों के गुजरने में कोई खतरा नहीं है.
समय-समय पर उन पुलियों की मरम्मत करायी जाती है. एक अनुमान के मुताबिक करीब 10 लाख रुपये से ऊपर इन पुलियों के रखरखाव पर औसतन खर्च होते हैं. अब तक जो रिपोर्ट विभाग में है, उसमें किसी भी पुल-पुलियों पर कोई खतरा अंकित नहीं किया गया है, जिससे रेल प्रबंधन फिलहाल सुरक्षित यात्रा को लेकर निश्चित है.
कर्मनाशा नदी पर बना पुल अंगरेज जमाने का है : कर्मनाशा नदी पर बना पुल अंगरेज के जमाने का है और जब भारतीय रेल का आगाज हुआ था उसके कुछ ही वर्षो बाद कर्मनाशा नदी पर पुल बनाया गया था. छह खंभों के सहारे बने इस रेल पुल का पिछले साल भी आरसीसी लगा कर जैकेटिंग का काम कराया गया था, जिससे जजर्र पुल की स्थिति में नयी जान आ गयी थी.
जैकेटिंग का काम भी छह पायों में से मात्र चार में ही कराया गया है. पुल के पूर्वी छोरवाले दो पायों में जैकेटिंग का काम नहीं कराया गया, जिससे आज भी स्थिति जजर्र बनी हुई है. यह पुल करीब पांच सौ फुट लंबा है. जैकेटिंग न होने के कारण बिहार में घुसते ही ट्रेनों को कॉसन देकर यहां धीमी गति से चलाया जाता है. दो पायों का जैकेटिंग का काम फिलहाल पानी बढ़ जान के कारण रुका पड़ा है.
ठोरा नदी पर बना पुल काफी जजर्र है : ठोरा नदी पर बने पुल हालांकि कर्मनाशा नदी के पुल से छोटा है, मगर इसकी जजर्रता गंभीर है. बक्सर और चौसा स्टेशन के बीच यह पुल करीब तीन सौ फुट लंबा है, जो कर्मनाशा नदी के पुल से काफी करीब है.
इस पुल से भी गाड़ियों की गति गुजरते वक्त धीमी होती है, लेकिन तेज गति से गाड़ियां अपेक्षाकृत गुजरती हैं, जिसके कारण पुल में कंपन और यात्राियों को तेज आवाज सुनने को मिलती है. यह पुल भी सदैव पानी में डूबा रहता है.
पुलिया में जैकेटिंग का भी नहीं हुआ काम
आरा स्टेशन से मात्र डेढ़ किलोमीटर दूर इटाढ़ी गुमटी से पूरब 339 संख्यावाली पुलिया जजर्र स्थिति में पहुंच गयी है. 30 फुट की इस छोटी पुलिया के नीचे से बरसाती पानी और नहर का पानी गुजरता है.
लोगों का आना-जाना ग्रामीण क्षेत्रों के लिए होता है. मरम्मत के अभाव में यह पुलिया भी जजर्र हो गयी है. इस पुलिया में न जैकेटिंग का काम किया गया और न ही पुलिया में लगे लोहे को बचाने के लिए कोई जंगरोधी पेंट ही लगाया गया. पुलिया के बगल में बना फुटपाथी रास्ता जानलेवा हो गया है. दो साल से इस फुटपाथी रास्ते से गुजरनेवाले लोग मात्र एक पटरे के सहारे गुजरते हैं. जबकि नीचे 20 फुट खाई है.
इस फुटपाथ में लगाये गये लकड़ी के सामान पानी में डूबे रहने के कारण सड़ चुके हैं और कभी भी हादसे का कारण बन सकता है. इस फुटपाथी पुलिये से प्रतिदिन सैकड़ों यात्री, स्कूली बच्चे और व्यवसाय करनेवाले छोटे-छोटे दुकानदार गुजरते हैं.
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