नालंदा विश्वविद्यालय में आईएएसएसआई का 25वां वार्षिक सम्मेलन संपन्न, मानव-केंद्रित शासन पर जोर
सम्मेलन में शामिल हुए विभिन्न विश्वविद्यालयों के डेलिगेटों के साथ राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन | Prabhat Khabar Network
Biharsharif News : नालंदा विवि में 25वें IASSI सम्मेलन में जन-केंद्रित शासन और विकास में सामाजिक विज्ञान की अहमियत पर विचार-विमर्श हुआ. जानें मुख्य बिंदु.
Biharsharif News : नालंदा विश्वविद्यालय में भारतीय सामाजिक विज्ञान संस्थान संघ (आईएएसएसआई) का चार दिवसीय 25वां वार्षिक सम्मेलन संपन्न हो गया. सम्मेलन में देशभर के विश्वविद्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों और शोध संगठनों से जुड़े विद्वानों, शोधकर्ताओं तथा नीति-निर्माताओं ने भारत की विकास प्राथमिकताओं और सार्वजनिक नीति निर्माण में सामाजिक विज्ञान की भूमिका पर विचार-विमर्श किया.

समापन सत्र में बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर एस. महेंद्र देव, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति सह आईएएसएसआई के अध्यक्ष प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी और इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट, नई दिल्ली के निदेशक प्रोफेसर अलख एन. शर्मा ने अपने विचार रखे.
जनविश्वास और मानव-केंद्रित शासन में सामाजिक विज्ञान की अहमियत
राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने कहा कि सामाजिक विज्ञान अनुसंधान का वास्तविक उद्देश्य लोगों की समझ को गहरा करना और उनके जीवन को बेहतर बनाना है. सैन्य सेवा और आपदा प्रबंधन से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि संस्थाओं की प्रभावशीलता केवल संसाधनों और कार्यक्षमता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि लोगों की चिंताओं, आकांक्षाओं और रोजमर्रा की परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है. सामाजिक समझ, जनविश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच गहरा संबंध है.
उन्होंने कहा कि शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जन-केंद्रित बनाने के लिए सामाजिक विज्ञान के निष्कर्षों को नीतियों में शामिल करना आवश्यक है. इससे प्रशासन और आम लोगों के बीच विश्वास मजबूत करने में मदद मिल सकती है.
बिहार में बाढ़ और प्रवास जैसी चुनौतियों पर ध्यान देने की जरूरत
राज्यपाल ने बिहार की विकास संबंधी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए भौगोलिक परिस्थितियों, प्रवास, आजीविका और क्षेत्रीय विकास के बीच आपसी संबंधों पर ध्यान देने की जरूरत बतायी. उत्तर बिहार में बार-बार आने वाली बाढ़ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन को केवल इंजीनियरिंग और पूर्वानुमान तक सीमित नहीं रखना चाहिए.
उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन की योजनाओं में स्थानीय ज्ञान, सामुदायिक व्यवहार, आजीविका की सुरक्षा और विस्थापन के दीर्घकालिक प्रभावों को भी शामिल करना जरूरी है. इसके लिए सामाजिक वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, प्रशासकों और अन्य विशेषज्ञों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के साथ प्रभावित समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए.
विश्वविद्यालयों में अनुसंधान क्षमता बढ़ाने पर जोर
राज्यपाल ने बिहार के विश्वविद्यालयों में अनुसंधान क्षमता मजबूत करने, युवा शोधकर्ताओं को बेहतर मार्गदर्शन देने और क्षेत्रीय अध्ययन के अवसर बढ़ाने की जरूरत बतायी. उन्होंने कहा कि शोध के निष्कर्षों को व्यावहारिक नीतिगत सुझावों में बदलना महत्वपूर्ण है.
इसके लिए नीति-सारांश तैयार करने और हिंदी सहित अन्य प्रासंगिक भाषाओं में शोध के निष्कर्ष आम लोगों तक पहुंचाने की आवश्यकता है. उन्होंने डिजिटल पहुंच और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार इस्तेमाल जैसी समकालीन चुनौतियों से निपटने में संवाद, प्रमाण-आधारित दृष्टिकोण और सभ्यतागत समझ को भी महत्वपूर्ण बताया.
समावेशी और सतत विकास में भारत की अहम भूमिका
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर एस. महेंद्र देव ने सम्मेलन में संस्कृति, विकास और डिजिटल भविष्य जैसे विषयों पर हुई चर्चा की सराहना की. उन्होंने कहा कि समावेशी और सतत विकास वर्ष 2030 के बाद भी वैश्विक एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा.
उन्होंने कहा कि भारत अपने व्यापक अनुभव, आंकड़ों, नीतिगत प्रयोगों और विकास पहलों के माध्यम से इस दिशा में अहम योगदान दे सकता है. प्रोफेसर देव ने नालंदा की अंतर-अनुशासनात्मक शिक्षण परंपरा सहित भारत की सभ्यतागत और बौद्धिक विरासत की प्रासंगिकता पर भी जोर दिया.
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विकास का आकलन केवल भौतिक प्रगति से नहीं
नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति सह आईएएसएसआई के अध्यक्ष प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि विकास को केवल भौतिक प्रगति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. इसमें संस्कृति, मूल्य, सामाजिक संबंध और मानव कल्याण भी शामिल हैं.
उन्होंने विकास की प्राथमिकताएं तय करने में सामुदायिक ज्ञान और लोगों के जीवन-अनुभवों को महत्व देने की जरूरत बतायी. उनके अनुसार, सामाजिक विज्ञान संस्थानों की जिम्मेदारी विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध कराने, नीति निर्माण में सहयोग करने और समाज को जोड़ने की है.
जटिल सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए अंतरविषयक सहयोग जरूरी
इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट, नई दिल्ली के निदेशक प्रोफेसर अलख एन. शर्मा ने कहा कि जटिल सामाजिक चुनौतियों का समाधान किसी एक विषय के दृष्टिकोण से संभव नहीं है. इसके लिए सामाजिक विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के बीच सहयोग और दूसरे क्षेत्रों के शोधकर्ताओं के साथ सार्थक संवाद जरूरी है.
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उन्होंने संस्थागत क्षमता निर्माण, युवा विद्वानों के लिए अवसर सृजित करने और बेहतर अनुसंधान संस्कृति विकसित करने पर जोर दिया.
संस्कृति, शिक्षा और प्रौद्योगिकी सहित कई विषयों पर मंथन
चार दिवसीय सम्मेलन में संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं पोषण, सार्वजनिक नीति, सामाजिक परिवर्तन, प्रौद्योगिकी और जिम्मेदार अनुसंधान सहित विकास से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श हुआ. वक्ताओं ने साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण, अंतरविषयक अध्ययन और आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा देने की आवश्यकता बतायी.
सम्मेलन में अनुसंधान, शासन और समाज के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा विकास संबंधी नीतियों को अधिक प्रभावी और जन-केंद्रित बनाने में सामाजिक विज्ञान संस्थानों की भूमिका को रेखांकित किया गया.
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