भागलपुर में 8 महीने में 5 करोड़ की साइबर ठगी, 117 ठग गिरफ्तार फिर भी 40% रकम ही बची, जानें 30 मिनट का खेल

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सांकेतिक तस्वीर

भागलपुर में साइबर अपराध एक गंभीर आर्थिक खतरा बन चुका है, जिसमें लाखों की ठगी के मामले सामने आ रहे हैं. इस लेख में बताया गया है कि कैसे ठगी के 30 मिनट के भीतर की गई शिकायत से आपकी रकम वापस मिलने की संभावना बढ़ सकती है.

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Bhagalpur Cyber Crime: भागलपुर. एक फोन कॉल, कुछ मिनट की बातचीत और बैंक खाते से लाखों रुपये गायब. भागलपुर में साइबर ठगी अब सिर्फ ऑनलाइन अपराध नहीं रह गया है, बल्कि तेजी से बढ़ता आर्थिक खतरा बन चुका है. वर्ष 2026 में अब तक जिले में एक लाख रुपये से अधिक की साइबर ठगी के 62 मामले दर्ज किये गये हैं. इन मामलों में करीब चार से पांच करोड़ रुपये की ठगी हुई है.

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पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अब तक 117 आरोपितों को गिरफ्तार किया है. इसके बावजूद ठगी गयी रकम का करीब 40 फीसदी ही रिकवर हो सका है. यानी करोड़ों रुपये की ठगी के बाद बड़ी चुनौती सिर्फ अपराधियों तक पहुंचना नहीं, बल्कि पैसा वापस लाना भी है.

इस पूरी पड़ताल में सबसे अहम बात सामने आती है. साइबर ठगी के बाद शुरुआती 30 मिनट पीड़ित के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. इसी दौरान शिकायत कर दी गयी तो खाते में गयी रकम को होल्ड कराने और रिकवर करने की संभावना काफी बढ़ जाती है. लेकिन पैसा एक खाते से दूसरे खाते में घूमते हुए निकाल लिया गया, तो उसकी वापसी बेहद मुश्किल हो जाती है.

भागलपुर में साइबर ठगी का नया हॉटस्पॉट कौन?

जिले में साइबर अपराध के बड़े मामलों में शहरी क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित नजर आ रहा है. साइबर अपराधी लोगों को ठगने के लिए लगातार नये तरीके अपना रहे हैं.

सबसे ज्यादा खतरा 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों पर देखा जा रहा है. बुजुर्गों को डिजिटल अरेस्ट, निवेश, बीमा, एलआइसी प्रीमियम और फ्रेंचाइजी जैसे अलग-अलग बहानों से निशाना बनाया जा रहा है.

ठग पहले भरोसा पैदा करते हैं. इसके बाद डर या लालच का इस्तेमाल करते हैं. जैसे ही पीड़ित उनकी बातों में आता है, उससे बैंक खाते या ऑनलाइन ट्रांजेक्शन के जरिये रकम ट्रांसफर करा ली जाती है.

सिर्फ 30 मिनट तय कर सकते हैं पैसा वापस मिलेगा या नहीं

साइबर ठगी में समय सबसे बड़ा हथियार है. पुलिस के अनुसार, ठगी होने के बाद 30 मिनट के भीतर 1930 पर शिकायत करना बेहद महत्वपूर्ण है.

जल्दी शिकायत मिलने पर संबंधित बैंक खातों और ट्रांजेक्शन को होल्ड कराने की कोशिश की जा सकती है. इससे रकम को आगे ट्रांसफर होने या निकाले जाने से रोकने की संभावना बढ़ती है.

लेकिन अगर ठग रकम को दूसरे खातों में भेज देते हैं और वहां से पैसा निकाल लिया जाता है, तो उसे वापस कराना काफी मुश्किल हो जाता है.

यही वजह है कि ठगी के बाद शर्म, डर या घबराहट में समय गंवाना पीड़ित को और बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है.

500 से ज्यादा म्यूल अकाउंट बने ठगों का बड़ा हथियार

साइबर ठगी के नेटवर्क में सिर्फ ठग ही नहीं, बल्कि ऐसे बैंक खाते भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जिनके जरिये ठगी की रकम को आगे भेजा जाता है.

भागलपुर जिले में पुलिस ने 500 से अधिक म्यूल अकाउंट की पहचान की है. इन खातों का इस्तेमाल संदिग्ध लेन-देन और साइबर ठगी की रकम को एक जगह से दूसरी जगह भेजने के लिए किया जाता है.

म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खाते होते हैं, जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम प्राप्त करने और उसे आगे ट्रांसफर करने के लिए किया जाता है. कई मामलों में खातेधारकों को कमीशन या दूसरे लालच देकर उनका बैंक खाता इस्तेमाल किया जाता है.

ठगी की रकम जब एक खाते से दूसरे खाते में पहुंचती रहती है, तो पैसे की पूरी कड़ी को ट्रेस करना और रकम वापस कराना पुलिस के लिए चुनौती बन जाता है.

एक लाख से ज्यादा की ठगी तो साइबर थाना में मामला

भागलपुर में एक लाख रुपये से अधिक की साइबर ठगी के मामले साइबर थाना में दर्ज किये जाते हैं.

वहीं इससे कम रकम की साइबर ठगी के मामले संबंधित नजदीकी थाने में दर्ज किये जाते हैं. ऐसे मामलों में भी पुलिस साइबर सेल की मदद से रकम को होल्ड कराने और आरोपितों तक पहुंचने का प्रयास करती है.

इस व्यवस्था का उद्देश्य बड़े साइबर अपराध मामलों की जांच को विशेषज्ञ टीम के जरिये आगे बढ़ाना है.

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बुजुर्गों को डराया जा रहा

साइबर अपराधियों का एक नया और खतरनाक तरीका डिजिटल अरेस्ट है.

ठग खुद को पुलिस अधिकारी या किसी दूसरी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर फोन करते हैं. इसके बाद पीड़ित को बताया जाता है कि उसका नाम किसी आपराधिक मामले, मनी लॉन्ड्रिंग या दूसरे अपराध से जुड़ा है.

डर का माहौल बनाकर पीड़ित को वीडियो कॉल पर रहने के लिए कहा जाता है. उसे यह विश्वास दिलाया जाता है कि वह पुलिस की ऑनलाइन निगरानी में है.

इसके बाद बैंक खाते में मौजूद रकम की जानकारी लेकर उसे कथित तौर पर सुरक्षित खाते में ट्रांसफर करने को कहा जाता है. यहीं से ठगी का सबसे बड़ा खेल शुरू होता है.

पुलिस साफ कर चुकी है कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है. कोई पुलिस अधिकारी या सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल के जरिये पैसे ट्रांसफर करने का निर्देश नहीं देती.

एलआइसी प्रीमियम के नाम पर 25 लाख गायब

एक अन्य मामले में एलआइसी का प्रीमियम जमा कराने में मदद करने के नाम पर एक व्यक्ति से 25 लाख रुपये ठग लिये गये.

पुलिस ने इस मामले में चार आरोपितों को गिरफ्तार किया और करीब आठ लाख रुपये रिकवर किये.

यानी ठगी का तरीका जितना सामान्य और भरोसेमंद दिखता है, उसके पीछे उतना ही बड़ा खतरा छिपा हो सकता है.

निवेश में मोटे मुनाफे का लालच देकर 40 लाख की ठगी

निवेश के नाम पर भी लोगों को बड़े मुनाफे का लालच दिया जा रहा है.

भागलपुर में निवेश के नाम पर 40 लाख रुपये की ठगी का मामला सामने आया. पुलिस ने तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया और करीब 10 से 12 लाख रुपये रिकवर किये.

ठग पहले निवेश पर अच्छा रिटर्न दिखाकर भरोसा पैदा करते हैं. इसके बाद अलग-अलग शुल्क, टैक्स या निवेश के नाम पर रकम मंगायी जाती है.

फ्रेंचाइजी के नाम पर 45 लाख का फ्रॉड

निजी कंपनी की फ्रेंचाइजी दिलाने के नाम पर भी भागलपुर में बड़ी ठगी हुई.

इस मामले में 45 लाख रुपये ठगे गये. पुलिस ने छह आरोपितों को गिरफ्तार किया और करीब 25 लाख रुपये रिकवर किये.

इन मामलों से साफ है कि साइबर अपराधी पीड़ित की जरूरत और उसकी उम्मीद दोनों को हथियार बना रहे हैं.

पुलिस की कार्रवाई तेज, लेकिन पैसा वापस लाना सबसे बड़ी चुनौती

आंकड़ों के अनुसार 117 आरोपितों की गिरफ्तारी पुलिस की कार्रवाई को दिखाती है. लेकिन करीब 40 फीसदी रकम की ही रिकवरी यह बताती है कि साइबर ठगी में अपराधी तक पहुंचने के बाद भी पूरा पैसा वापस पाना आसान नहीं है.

म्यूल अकाउंट की लंबी श्रृंखला, अलग-अलग खातों में रकम का ट्रांसफर और तेजी से पैसे की निकासी जांच को मुश्किल बनाती है.

यही कारण है कि पुलिस की कार्रवाई के साथ आम लोगों की तत्काल प्रतिक्रिया भी बेहद महत्वपूर्ण है.

Bhagalpur Cyber Crime: ठगी होते ही क्या करें?

अगर बैंक खाते से ठगी के जरिये पैसा निकल गया है, तो सबसे पहले घबराने के बजाय तुरंत 1930 पर शिकायत करें. जितनी जल्दी सूचना पहुंचेगी, उतनी ही जल्दी रकम को होल्ड कराने की कोशिश की जा सकेगी.

किसी अनजान व्यक्ति को बैंक खाते, ओटीपी, यूपीआई पिन या अन्य संवेदनशील जानकारी नहीं देनी चाहिए.

अगर कोई फोन पर पुलिस अधिकारी बनकर डराये, वीडियो कॉल पर निगरानी की बात करे या पैसे को किसी 'सुरक्षित खाते' में भेजने को कहे, तो उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए.

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