बेगूसराय: 2026 में 100वें वर्ष में प्रवेश करेगा तेघड़ा का ऐतिहासिक श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मेला, 15 मंडपों में सजेगी भव्य झांकियां
तेघड़ा में कृष्ण जन्माष्टमी मेला को लेकर तोरण द्वार निर्माण करते हुए कलाकार
तेघड़ा का श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मेला 2026 में अपना शताब्दी वर्ष मनाएगा. 8 किलोमीटर के दायरे में 15 भव्य मंडपों में भगवान श्रीकृष्ण की मनमोहक झांकियां सजी होंगी. जानिए इस ऐतिहासिक मेले से जुड़ी प्लेग महामारी की किवदंती.
Teghra Shri Krishna Janmstsav Mela: जैसे-जैसे जन्माष्टमी का पर्व करीब आता है, तेघड़ा की गलियां श्रीकृष्ण की भक्ति में रंगने लगती हैं. रंग-बिरंगी रोशनी से सजे मंडप, आकर्षक झांकियां, बांके बिहारी के अलग-अलग स्वरूप, आधुनिक साज-सज्जा और ‘जय कन्हैया लाल की’ की गूंज तेघड़ा को मिनी मथुरा-वृंदावन का रूप देने लगती है.
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वर्ष 2026 में अपने 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहा तेघड़ा का ऐतिहासिक श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मेला इस बार और भी विराट स्वरूप में नजर आएगा. करीब आठ किलोमीटर के दायरे में 15 मंडपों में आयोजित होने वाला यह मेला लाखों श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनेगा.
4 सितंबर को भगवान कृष्ण के जन्मदिन से लेकर छठी 9 सितंबर तक आयोजित होने वाले इस मेले में अलग-अलग मंडपों में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की विभिन्न झांकियां और स्वरूप देखने को मिलेंगे. 9 और 10 सितंबर को प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा. छह दिनों तक दिन-रात 24 घंटे चलने वाले इस मेले में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है. मंडपों की सजावट और विद्युत रोशनी ऐसी होती है कि राहगीरों की नजरें बरबस ठहर जाती हैं.
एक मंडप से शुरू हुआ सफर, अब 15 मंडपों तक पहुंचा
तेघड़ा के श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मेले की शुरुआत वर्ष 1928 में महज एक मंडप से हुई थी. स्टेशन रोड में स्वर्गीय बंसी पोद्दार, विशेश्वर लाल और लखन साह के नेतृत्व में पहली बार श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का आयोजन किया गया था.
वर्ष 1929 में स्वर्गीय सूर्य नारायण पोद्दार हाकिम, नुनु पोद्दार और हरिलाल सहित अन्य लोगों के नेतृत्व में मेन रोड स्थित मुख्य मंडप में जन्मोत्सव मनाया गया. इसके बाद करीब तीन दशकों तक यह आयोजन लगातार विस्तार लेता रहा. अलग-अलग क्षेत्रों में नये मंडप बनते चले गये और आज यह मेला आठ किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में 15 मंडपों के साथ आयोजित होता है.
प्लेग महामारी के बीच जन्मी थी कृष्ण जन्मोत्सव की परंपरा
तेघड़ा के इस ऐतिहासिक मेले की शुरुआत के पीछे वर्ष 1927 में फैली प्लेग महामारी से जुड़ी एक किवदंती भी है. उस समय तेघड़ा बाजार सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों में महामारी ने भारी तबाही मचायी थी. बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और भय के कारण कई परिवार अपने घर छोड़कर दूसरे स्थानों पर चले गये थे.
महामारी से बचने के लिए लोगों ने यज्ञ, अनुष्ठान और विभिन्न धार्मिक उपाय किये, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ. इसी दौरान भारत भ्रमण पर निकली चैतन्य महाप्रभु की कीर्तन मंडली तेघड़ा पहुंची. स्थानीय लोगों ने उन्हें महामारी की भयावह स्थिति से अवगत कराया.
बताया जाता है कि मंडली ने लोगों को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाने की सलाह दी. इसके बाद वर्ष 1928 में पहली बार श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का आयोजन किया गया. स्थानीय लोगों की आस्था और विश्वास के साथ यह आयोजन धीरे-धीरे परंपरा बन गया. लोगों का मानना है कि जन्मोत्सव शुरू होने के बाद क्षेत्र में महामारी का प्रकोप कम होने लगा. इसी आस्था ने आगे चलकर इस आयोजन को विशाल मेले का रूप दे दिया.
समय के साथ बढ़ता गया मेले का विस्तार
तेघड़ा के अलग-अलग इलाकों में समय के साथ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के नये मंडप बनने लगे. स्वर्गीय लखी साह, स्वर्गीय रामेश्वर साह और हरिलाल मखारिया के नेतृत्व में पूर्वी क्षेत्र में भी आयोजन शुरू हुआ.
वर्ष 1932 में डॉ. कृष्ण नारायण पोद्दार, कारी लाल साह सहित अन्य लोगों के नेतृत्व में जन्मोत्सव मनाया गया. इसके बाद 1990 में चैती दुर्गा स्थान और प्रखंड कार्यालय परिसर में भी मंडप बनने लगे. वर्ष 2000 के बाद मेला स्टेशन रोड से आगे बढ़ते हुए नये प्रखंड कार्यालय की तरफ फैल गया.
धीरे-धीरे रजिस्ट्री ऑफिस से लेकर त्रिवेणी मार्केट तक मेला क्षेत्र का विस्तार हो गया. आज करीब आठ किलोमीटर के क्षेत्र में 15 मंडपों में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का आयोजन किया जाता है. मेला परिसर में श्रद्धालुओं के लिए पूजा-पाठ के साथ मनोरंजन के लिए अत्याधुनिक झूले, थिएटर और विभिन्न प्रकार के आकर्षण भी लगाए जाते हैं.
पेट्रोमैक्स और लालटेन से एलईडी तक पहुंचा मेला
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मेले ने बदलते समय के साथ तकनीक और सजावट के क्षेत्र में भी लंबा सफर तय किया है. शुरुआती दौर में जब तेघड़ा में बिजली की सुविधा नहीं थी, तब बाहर से आने वाले दुकानदार अपने साथ पेट्रोमैक्स और लालटेन लेकर आते थे. इन्हीं की रोशनी से पूरा मेला परिसर जगमगाता था.
उस समय मंडपों को कूट पर डिजाइन तैयार कर और चमकी का चूर्ण चिपकाकर सजाया जाता था. मंडपों में बिजली की व्यवस्था के लिए पटना से कारीगर और उपकरण मंगाये जाते थे. उस समय दास एंड कंपनी का साउंड सिस्टम भी पटना से आया था. अब वही मेला आधुनिक एलईडी और रंग-बिरंगी विद्युत सजावट से जगमगाता है. रात के समय रोशनी से सजे मंडपों और झांकियों का दृश्य श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है.
1960 में शुरू हुआ तीसरे मंडप का निर्माण
वर्ष 1960 में स्टेट बैंक के समीप तीसरे मंडप का निर्माण शुरू हुआ. इसमें हरिलाल, चिरंजी लाल, राघो साह, मधुरापुर के विसो सिंह, कसवा के सीताराम सिंह, डॉ. नरेश सिंह और राजेंद्र सुल्तानिया उर्फ कल्लू सहित कई लोगों का सहयोग रहा.
वर्ष 1975 में पश्चिमी क्षेत्र में स्वर्गीय सूर्य नारायण साह के मकान में चौथे मंडप का निर्माण शुरू हुआ. इसी दौर में तेघड़ा में बिजली की सुविधा भी पहुंची. वर्ष 1960 में तेघड़ा अस्पताल से सत्संग मंदिर तक और स्टेशन रोड में सेंट्रल बैंक तक बिजली पहुंचायी गयी. इसका उद्घाटन बिहार सरकार के तत्कालीन बिजली एवं सिंचाई मंत्री तथा तेघड़ा के तत्कालीन विधायक रामचरित्र सिंह ने किया था.
छह दिनों तक कृष्णमय रहता है पूरा तेघड़ा
आज श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि तेघड़ा की पहचान बन चुका है. जन्माष्टमी के दौरान पूरा क्षेत्र कृष्ण धाम में तब्दील हो जाता है. दिन-रात चलने वाले मेले में दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं.
अलग-अलग मंडपों में सजे भगवान श्रीकृष्ण के मनमोहक स्वरूप, आकर्षक झांकियां, विद्युत सजावट, सांस्कृतिक कार्यक्रम और मनोरंजन के साधन मेले को खास बनाते हैं. वर्ष 2026 में मेले के 100वें वर्ष में प्रवेश करने के साथ आयोजक इसे अब तक का सबसे भव्य आयोजन बनाने की तैयारी में जुटे हैं. आठ किलोमीटर में फैला यह मेला एक बार फिर श्रद्धा, भक्ति और आकर्षण के रंग में तेघड़ा को रंगने के लिए तैयार है.
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