फागुन का बदला रंग, डीजे के शोर में खोती ‘फगुआ’ की मिठास

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पंजवारा व आसपास के बाजारों में रंग और गुलाल की दुकानें सज चुकी हैं और लोगों में पर्व को लेकर उमंग दिखाई दे रही है.

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गौरव कश्यप, पंजवारा. होली के त्योहार में अब महज दो दिन शेष है. इसको लेकर पंजवारा व आसपास के बाजारों में रंग और गुलाल की दुकानें सज चुकी हैं और लोगों में पर्व को लेकर उमंग दिखाई दे रही है. कभी फागुन का महीना शुरू होते ही गांवों की चौपालों पर शाम ढलते ही महफिलें सजती थीं. होली खेले रघुवीरा अवध में और यमुना तट श्याम खेले होली जैसे पारंपरिक फाग गीत वातावरण को मधुर बना देते थे. बुजुर्ग बताते हैं कि बसंत पंचमी से ही होली की तैयारी शुरू हो जाती थी. अब आधुनिकता की चकाचौंध में वह देसी मिठास फीकी पड़ती दिख रही है. आज ढोलक और मंजीरे की जगह तेज आवाज वाले डीजे ने ले ली है. प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि जहां पहले लोकगीतों में संस्कार और सामाजिक मर्यादा झलकती थी, वहीं अब फूहड़ गीतों का प्रचलन बढ़ा है. सामूहिक फगुआ गायन, जिसमें बच्चे और बुजुर्ग एक साथ शामिल होते थे, अब कम होता जा रहा है. डीजे के तेज शोर से बुजुर्गों और बीमार लोगों को परेशानी भी होती है. बुजुर्गों के अनुसार फगुआ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का माध्यम था. चौपाल पर जुटान से आपसी मतभेद मिटते थे. अब संवाद और भाईचारे की वह परंपरा कमजोर पड़ती दिख रही है. बुद्धिजीवियों का मानना है कि लोक संस्कृति को बचाना समय की मांग है. होली की असली खुशी तभी लौटेगी, जब गांवों में फिर से पारंपरिक फाग और ढोलक की थाप गूंजेगी.

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