सिंचाई के अभाव में खेतों में पड़ने लगी दरार

Published at :13 Oct 2015 9:01 PM (IST)
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सिंचाई के अभाव में खेतों में पड़ने लगी दरार

सिंचाई के अभाव में खेतों में पड़ने लगी दरार फोटो 13 बीएएन 60 : खेत में सूखने लगे धान प्रतिनिधि, कटोरियाकटोरिया इलाके के घघरीजोर बहियार के सभी खेतों में धान की फसल लहलहा रही है. लेकिन, खेत की जमीन देखने पर कलेजा दहल जाता है. खेत में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गयी हैं. ऐसा पहली बार […]

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सिंचाई के अभाव में खेतों में पड़ने लगी दरार फोटो 13 बीएएन 60 : खेत में सूखने लगे धान प्रतिनिधि, कटोरियाकटोरिया इलाके के घघरीजोर बहियार के सभी खेतों में धान की फसल लहलहा रही है. लेकिन, खेत की जमीन देखने पर कलेजा दहल जाता है. खेत में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गयी हैं. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. सिंचाई सुविधा के अभाव में हर साल इस इलाके में धान की फसल को दुर्गती झेलनी पड़ती है. पानी के अभाव में इस बहियार में लगे धान का फसल खेत में ही जलने को विवश है. यह कहानी एक जगह की नहीं है. बल्कि, आप बाघमारी भदोरिया, बड़वासनी, कुम्हरातरी, बीचकोड़ी, तेंलगवां, भलभेड़ी, सिमरखुट इलाके का कोई बहियार चले जायें, हर जगह किसानों में हाहाकार मचा हुआ है. खेत में एक छटांक पानी नहीं है. भादो में कादो की निकल रही तेज धूप खेतों का कलेजा चिर रहा है. चुनावी चर्चा के बीच किसानों को अपने अगले एक साल की चिंता हो रही है. अब अगर बारिश नहीं हुई तो धान को बचाये रखना मुश्किल हो जायेगा. सर्वाधिक नदी और जलाशय वाले जिला के खेतों का यह किसने बना रखा है. सिंचाई सिस्टम गिन रहा आखिरी सांस इस मानसून सीजन में पहले जून और फिर जुलाई में बारिश ने दाग दिया. अगस्त के आखिरी सप्ताह में अच्छी बारिश से किसानों में आस जगी थी, लेकिन सितंबर अब पूरी तरह सूखा रहा है. यानि भादो में कादो की पुरानी कहावत भी हवा हो गयी है. अक्तूबर का 13 दिन निकल जाने के बाद भी बारिश नहीं हुई है. दरअसल बांका की सिंचाई व्यवस्था पर लंबे समय से जनप्रतिनिधि उदासीन रहे. किसी ने किसानों की इस बड़ी समस्या पर ध्यान नहीं दिया. बांका के डैम से मुंगेर और भागलपुर के खेतों की सिचांई का इंतजाम है. पर अभी बांका के ही दो तिहाई खेत सूखा हैं. एकोरिया बीयर से बांका के लंबे क्षेत्रो में सिंचाई होती रही है. जलाशय के सिंचाई सिस्टम का भी यही हाल है. ओढ़नी बढुआ चांदन हर जलाशय की सिंचाई सुविधा प्राय: ध्वस्त है. कई इलाकों में किसान चांदन और ओढ़नी बाध कर पहले खेतों में पानी ले जाते थे. पर पिछले तीन चार वर्षों में बालू उत्खनन से नदियां इतनी गहरी हो गयीं, कि इससे पानी जाना मुश्किल हो गया है.

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