नये समीकरण ने बढ़ायीं चुनौतियां

Published at :03 Sep 2015 12:59 AM (IST)
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नये समीकरण ने बढ़ायीं चुनौतियां

चैतन्य महाप्रभु से लेकर शंकर माधवन की धरती बांका में कई बड़े राजनीतिक नेताओं नेअपनी किस्मत आजमायी है. चंद्रशेखर जैसे कई राजनेता यहां से चुनाव जीते और देश की राजनीति में जगह बनायी. चंद्रशेखर ने इस जिले को सिरामिक फैक्ट्री देने की कोशिश की थी, तो दिग्विजय सिंह ने ट्रेन लाकर इस जिले को भारत […]

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चैतन्य महाप्रभु से लेकर शंकर माधवन की धरती बांका में कई बड़े राजनीतिक नेताओं नेअपनी किस्मत आजमायी है. चंद्रशेखर जैसे कई राजनेता यहां से चुनाव जीते और देश की राजनीति में जगह बनायी.
चंद्रशेखर ने इस जिले को सिरामिक फैक्ट्री देने की कोशिश की थी, तो दिग्विजय सिंह ने ट्रेन लाकर इस जिले को भारत के दूसरे हिस्सों से जोड़ने का काम किया.
जिले में विधानसभा की कुल पांच सीटें हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में इनमें से चार सीटों पर एनडीए की जीत हुई थी. एक सीट राजद की झोली में गयी थी. पिछले साल हुए उपचुनाव में राजद की इस सीट पर भाजपा ने कब्जा कर लिया. वर्तमान में तीन सीटें जदयू के पास और दो भाजपा के पास हैं. लोकसभा चुनाव में राजद ने भाजपा को करीब 10 हजार वोटों के अंतर से हराया.
बांका
हर चुनाव में बदलते रहे हैं चेहरे
बांका विधानसभा क्षेत्र का इतिहास रहा है कि प्रत्येक चुनाव में यहां के मतदाता अपने प्रतिनिध को बदल देते हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में राजद के जावेद इकबाल अंसारी ने भाजपा के रामनारायण मंडल को हराया था.
भाजपा-जदयू गंठबंधन के टूटने के बाद विधायक अंसारी ने राजद छोड़ कर जदयू की सदस्यता ग्रहण कर ली और विधानसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया था. बाद में वह विधान परिषद के सदस्य और नीतीश सरकार में मंत्री बने.
1995 से वह यहां के विधायक रहे. वह राबड़ी देवी सरकार में मंत्री रहे थे. पिछले साल विधानसभा की सदस्यता से उनके इस्तीफे के बाद यहां उपचुनाव हुआ, जिसमें भाजपा ने राजद से यह सीट छीन ली. राजद ने इकबाल हुसैन अंसारी को उम्मीदवार बनाया था, जबकि भाजपा ने एक बार फिर रामनारायण मंडल को मैदान में उतारा.
मंडल ने अंसारी को करीब तीन हजारों मतों के अंतर से हराया. बहरहाल इस बार भी ये दोनों दल आमने-सामने होंगे. राजद को पिछले चुनाव में जीत और भाजपा को सीटिंग गेटिंग के आधार पर अपने-अपने गंठबंधन में यह सीट पाने का भरोसा है. इसी आधार पर दोनों दलों के कई नेता टिकट पाने की दौड़ में शामिल हैं. सीटिंग विधायक होने के नाते भाजपा के रामनारायण मंडल का दुबारा उम्मीदवार होना लगभग तय माना जा रहा है. जदयू से अलग होने के बाद भाजपा का यहां वोट प्रतिशत बढ़ा है.
अब तक
जावेद इकबाल अंसारी राजद छोड़ जदयू में आ गये. उपचुनाव में भाजपा ने यह सीट राजद से छीनी.
इन दिनों
भाजपा परिवर्तन रथ के साथ चुनावी अभियान में जुटी है. राजद , कांग्रेस व हम पार्टी के कार्यकर्ता भी सक्रिय हैं. रालोसपा का भी विस सम्मेलन जारी है.
प्रमुख मुद्दे
शहर में चौबीस घंटे विद्युत आपूर्ति
सिंचाई की व्यवस्था
भागलपुर-बांका मुख्य मार्ग की मरम्मत
किसानों की समस्याओं का समाधान
तकनीकी शिक्षा व रोजगार.
अमरपुर
सभी चाह रहे उम्मीदवारी की गारंटी
अमरपुर विधानसभा सीट पर 2010 के चुनाव में जदयू ने कब्जा किया था. इसके प्रत्याशी जनार्दन मांझी ने राजद के सुरेंद्र सिंह कुशवाहा को करीब 15 फीसदी वोटों के अंतर से हराया था.
2000 के चुनाव में भी इस सीट पर जदयू का कब्जा हुआ था, लेकिन 2005 में उसने यह सीट खो दी थी. लिहाजा 2010 के चुनाव में उसने उम्मीदवार बदला. इस चुनाव में करीब 18 हजार वोट से जदयू को कामयाबी मिली. जनार्दन मांझी जिले में सबसे ज्यादा मत से विजयी होने वाले प्रत्याशी बने. इस बार चुनावी गणित बदल चुका है. पिछले चुनाव में राजद के टिकट पर अपनी किस्मत आजमा चुके सुरेंद्र सिंह कुशवाहा इस बार भाजपा में शामिल हो चुके है. भाजपा में टिकट के दावेदारों की संख्या ज्यादा है.
भागलपुर के पूर्व सांसद सह भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन के प्रवक्ता मृणाल शेखर, विकास सिंह, इंद्रजीत कुमार, पूर्व आइपीएस श्रीधर मंडल व बेबी यादव इस दौड़ में शामिल हैं. वहीं रालोसपा के कौशल सिंह की भी इस सीट पर नजर है. महागंठबंधन में सीटिंग गेटिंग के आधार पर इस सीट के जदयू के खाते में जाने की पूरी संभवना है. लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में राजद के वोट प्रतिशत में करीब पांच फीसदी से ज्यादा की बढ़ेतरी हुई.
विधानसभा चुनाव में उसे 25.25 फीसदी वोट मिले थे, जबकि लोकसभा में इसने 30.32 फीसदी वोट हासिल किये. यह दोनों चुनावों में दूसरे स्थान पर रहा. इस बार राजद, जदयू और कांग्रेस का गंठबंधन होने का भी उसे लाभ मिल सकता है. लिहाजा उसके नेता भी टिकट को लेकर भाग-दौड़ में लगे हैं. वहीं एनडीए में यह सीट किस घटक दल को मिलती है, इस पर सब की नजर है. लोकसभा चुनाव में इसे इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा वोट मिले थे.
अब तक
पिछला चुनाव यहां से जदयू ने जीता था. तीन बार विधायक रहे सुरेंद्र सिंह कुशवाहा राजद छोड़ भाजपा में शामिल हो चुके है. टिकट के लिए प्रयासरत.
प्रमुख मुद्दे
अमरपुर को अनुमंडल का दर्जा
बाइपास निर्माण
बड़ी बांध व बदुआ जलाशय परियोजना को पूरा करना
इन दिनों
दोनों गंठबंधनों के घटक दल जनसंपर्क अभियान में जुटे हैं. कार्यकर्ता सम्मेलनों का दौर सभी दलों में चल रहा है.
बेलहर
संभावित उम्मीदवार जनसंपर्क में जुटे
नक्सल प्रभावित बेलहर विधानसभा सीट पर पिछले दो चुनाव से जदयू का कब्जा रहा है. हालांकि नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण अब भी सुदूर ग्रामीण इलाकों तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच पायी है.
राजद का दामन को छोड़ कर कांग्रेस और कांग्रेस के बाद जदयू में आये गिरधारी यादव यहां से वर्तमान विधायक हैं. गिरधारी यादव सांसद भी रह चुके हैं. राजद के रामदेव यादव भी यहां से कई बार विधायक चुने गये. पिछले चुनाव में वह दूसरे नंबर पर रहे. वह इस बार भी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं.
गिरधारी यादव सीटिंग एमएलए होने के आधार पर इस बार भी यहां से पार्टी-टिकट को लेकर आश्वस्त हैं, जबकि राजद के रामदेव यादव भी टिकट के लिए ताल ठोंक रहे हैं. पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में राजद को सबसे ज्यादा वोट मिले थे. इस लिहाज से वह इस सीट पर अपने दावे को स्वाभाविक मान रहा है. उधर, भाजपा में टिकट को लेकर मारा-मारी ज्यादा है.
हालांकि जदयू से अलग होने के बाद लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में अपेक्षा से बहुत कम समर्थन मिला. केवल 9.27 फीसदी वोट मिले थे. इस सीट पर भाकपा भी उम्मीदवार दे सकती है. लोकसभा चुनाव में राजद के बाद सबसे ज्यादा वोट उसे ही मिले.
प्रमुख मुद्दे
विकास की मुख्य धारा से जोड़ने की जरूरत
शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण सड़क की समस्या
नक्सल घटनाओं पर रोक लगाने की ठोस व्यवस्था
इन दिनों
फिलहाल दोनों गंठबंधन के कार्यकर्ता इलाके में सक्रिय हैं. जगह-जगह जनसपंर्क शुरू हो चुका है. लाउडस्पीकर की गूंज भी सुनाई पड़ने लगी है.
अब तक
इस विधानसभा से वर्ष 2005 चुनाव में पहले व दूसरे नंबर पर रहे प्रत्याशी भाजपा में शामिल हो चुके हैं और जनसंपर्क कर रहे हैं.
धोरैया (अजा)
टिकट की खातिर दल-बदल
धोरैया विधानसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. पिछले चार चुनावों से इस सीट पर जदयू का कब्जा है. 2010 के चुनाव में इसके मनीष कुमार ने राजद के नरेश दास को मतों के बड़े अंतर से हराया था.
दास पहले सीपीआई में थे. उसके टिकट पर वह यहां से विधायक भी चुने गये थे, लेकिन राजद में आने के बाद अपनी जीत को वह बरकरार नहीं रख सके. मनीष से पहले भूदेव चौधरी यहां से दो बार विधायक चुने गये थे. बाद में वह जमुई लोकसभा सीट से सांसद बने थे. उनके संसद जाने के बाद जदयू ने यह सीट मनीष कुमार को दी और वह लगातार यहां का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. उधर, भूदेव चौधरी ने जदयू की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. वह रालोसपा का दामन थाम चुके हैं. इससे यहां का चुनावी समीकरण रोचक हो गया है.
यह अनुमान लगाया जा रहा है कि एनडीए में अगर यह सीट रालोसपा को मिलती है, तो चौधरी इस बार यहां से उसके उम्मीदवार होंगे. वहीं सीटिंग विधायक होने के नाते मनीष कुमार का जदयू के टिकट पर एक बार फिर यहां से उम्मीदवार होना लगभग तय है. जदयू-राजद-कांग्रेस गंठबंधन के कारण पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे नरेश दास के चुनावी अवसर पर संदेह के घने बादल मंडरा रहे हैं.
पिछले चुनाव में भाकपा ने भी यहां उम्मीदवार दिया था, लेकिन उसकी जमानत तक नहीं बची थी. उसे महज 4.34 प्रतिशत वोट मिले थे. बहरहाल सभी दलों में अभी सीट के बंटवारे को लेकर कयास लगाने का दौर जारी है.
अब तक
पिछला चुनाव जदयू के मनीष कुमार ने जीता था, लेकिन उससे पूर्व दो दो बार विधायक रहे भूदेव चौधरी जदयू छोड़ रालोसपा का दामन थाम चुके हैं. वह इस सीट से जद यू का प्रत्याशी बनना चाह रहे थे, लेकिन संभावना नहीं देख उन्होंने पाला बदल लिया. फिलहाल वे रालोसपा में हैं.
इन दिनों
भाजपा का परिवर्तन रथ गांवों में घूम रहा है, जबकि हर घर दस्तक देने के बाद जदयू के कार्यकर्ता जनसंपर्क में लग गये हैं. इसके अलावा इलाके में हर दल अपनी गतिविधियों को तेज कर चुका है. महागंठबंधन और नरेंद्र मोदी की भागलपुर रैली की समीक्षा चल रही है.
प्रमुख मुद्दे
भागलपुर-दुमका मार्ग की मारम्मत
शहरी क्षेत्र का विकास और नागरिक सुविधाओं की मुकम्मल व्यवस्था
सिंचाई के साधन व किसानों को उनकी उपज की सही कीमत की व्यवस्था
विधि व्यवस्था में सुधार
उच्च व तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था.
कटोरिया (अजजा)
यहां भी टिकट की मारामारी
2010 के विधानसभा चुनाव से यह सीट एसटी के लिए आरक्षित हुई. इससे आदिवासी वोटरों में ज्यादा उत्साह है. हालांकि इस विधानसभा क्षेत्र में यादव वोटों की संख्या आदिवासी मतदाताओं से ज्यादा है.
2010 के पहले तक इस सीट पर राजद और कांग्रेस का कब्जा रहा था. एक बार लोजपा के राज किशोर यादव उर्फ पप्पू यादव भी यहां से विधायक चुने गये थे. यादव ने बाद में लोजपा छोड़ राजद का दामन थामा और फिर वह विजयी हुए.
पिछले चुनाव में भाजपा के सोने लाल हेंब्रम ने राजद के सुखलाल बेसरा को हराया था. इस बार हेंब्रम की बेटी भी इलाके में सक्रिय है. इस बार पिता की जगह उनके चुनाव लड़ने के कयास लगाये जा रहे हैं. आरक्षित सीट होने के कारण यहां सामान्य सीटों की तरह ज्यादा मारा-मारी नहीं है.
फिर भी हर दल में टिकट के कई-कई दावेदार हैं. सोने लाल हेम्ब्रम अगर अपनी बेटी को टिकट दिलाने की कोशिश करेंगे, तो उनकी पार्टी में भी कई आदिवासी नेता उन्हें चुनौती देने को तैयार हैं. महागंठबंधन में यह सीट किस घटक दल के खाते में जायेगी, इस पर अभी अटकलें ही लगायी जा रही हैं. वैसे विधानसभा चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे राजद को लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा वोट मिले थे. उसने भाजपा की लहर को रोक दी थी.
अब तक
पिछला चुनाव यहां से भाजपा के सोने लाल हेंब्रम ने जीता था. इस बार उनकी पुत्री निक्की हेंब्रम टिकट की दावेदार हैं. कटोरिया के पूर्व विधायक राज किशोर यादव उर्फ पप्पू यादव राजद छोड़ भाजपा में शामिल हो चुके हैं.
इन दिनों
भाजपा परिवर्तन रथ के साथ चुनावी अभियान में जुटी है. राजद , कांग्रेस व हम पार्टी के कार्यकर्ता भी काफी सक्रिय हैं. रालोसपा का भी विस सम्मेलन जारी है. फिलहाल दोनों गंठबंधन के कार्यकर्ता रैली की तैयारी में जुटे हैं.
प्रमुख मुद्दे
आदिवासियों को समाज को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना
नक्सली घटनाओं पर रोक
पिछड़े क्षेत्रों का समुचित विकास
सिंचाई की सुविधा
बिजली और पेयजल की बेहतर व्यवस्था
स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और सेवा का विस्तार
ग्रामीण क्षेत्र की सड़कों की मरम्मत तथा सुदूरवर्ती गांवों तक सडक़
रोजगार के साधन तथा किसानों को कृषि की सही कीमत.
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