ब्लड कैंसर से जिंदगी की जंग लड़ रही सलोनी

Published at :09 Jan 2016 6:52 PM (IST)
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ब्लड कैंसर से जिंदगी की जंग लड़ रही सलोनी

ब्लड कैंसर से जिंदगी की जंग लड़ रही सलोनीबेटी के इलाज के लिए माता-पिता ने लोगों से की मदद की गुहार अभी प्रत्येक माह सलोनी को ओ निगेटिव ब्लड की पड़ती है जरूरतफोटो नंबर-29, 30, परिचय-अपने मां-बाप के साथ पांच वर्षीय सलोनी,ब्लड बैंक में खून देते मुखिया मनीष कुमारऔरंगाबाद (ग्रामीण)दो बेटों के बाद बेटी की […]

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ब्लड कैंसर से जिंदगी की जंग लड़ रही सलोनीबेटी के इलाज के लिए माता-पिता ने लोगों से की मदद की गुहार अभी प्रत्येक माह सलोनी को ओ निगेटिव ब्लड की पड़ती है जरूरतफोटो नंबर-29, 30, परिचय-अपने मां-बाप के साथ पांच वर्षीय सलोनी,ब्लड बैंक में खून देते मुखिया मनीष कुमारऔरंगाबाद (ग्रामीण)दो बेटों के बाद बेटी की तमन्ना कुसुम देवी व धर्मेंद्र रजक को ईश्वर ने उनकी मुराद पूरी कर दी. घर में लक्ष्मी के कदम पड़ते ही खुशियों की बहार आ गयी, लेकिन यह खुशी चंद वर्षों के लिए ही रही. मां-बाप की प्यारी बिटिया की किसी की नजर लग गयी. जिस आंगन में वह चहकती थी वहां अब सन्नाटा पसर गया. स्वस्थ सलोनी को लाइलाज माने जाने वाली बीमारी कैंसर ने उसे जकड़ लिया. पिता धर्मेंद्र रजक व मां कुसुम देवी को अक्तूबर 2015 में एक चिकित्सक से जानकारी मिली की उसे ब्लड कैंसर हो गया. इसके बाद तो धर्मेंद्र के परिवार पर पहाड़ टूट पड़ा. बेटी को बचाने के लिए पटना से टाटा व टाटा से कोलकाता तक की राह पकड़नी पड़ी. अब तो सलोनी के इलाज में आर्थिक स्थिति भी आड़े आ रही है. दो माह के भीतर एक लाख से अधिक रुपये खर्च हो गये. ऐसे में एक गरीब परिवार लाखों रुपये का इंतजाम कैसे करता.अभी प्रत्येक माह सलोनी को ओ निगेटिव ब्लड की जरूरत पड़ती है. बेटी को बचाने के लिए पिता खून के लिए या तो पता करता रहता है या जानकारी मिलने पर ओ निगेटिव के व्यक्ति से खून देने की गुहार लगाता रहता है. अभी उसे खून उपलब्ध भी हो जा रहा है, लेकिन यह कब तक होगा. किस-किस को खोजता फिरेगा और किस-किस से खून देने की गुहार लगाता रहेगा. शनिवार को बेटी सलोनी को खून चढ़ाने के लिए धर्मेंद्र व उसकी पत्नी कुसुम सदर अस्पताल पहुंची. खून का जुगाड़ भी आज हो गया था. पश्चिमी केताकी पंचायत के मुखिया मनीष राज पाठक ने ओ निगेटिव खून देकर सलोनी की जरूरतों को पूरा कर दिया था. अब अगले माह के लिए तलाश करनी थी. सदर अस्पताल परिसर के फर्श पर बैठे सलोनी के माता-पिता की नजर जब मीडिया पर गयी, तो उन्हें एक उम्मीद जग गयी. बेटी को लिए मदद की गुहार लगानी शुरू कर दी. सदर अस्पताल में बात करने के दौरान पीड़ित के पिता धर्मेंद्र रजक व मां कुसुम देवी बिलख पड़ी. दोनों के आंसू हर बात पर निकल रहे थे. फफकते हुए पिता ने बताया कि वह कुटुंबा थाना क्षेत्र के मध्य विद्यालय महसू में टोला सेवक के पद पर कार्यरत हैं. सरकार से आठ हजार रुपये प्रत्येक माह मानदेय बंधा हुआ है, लेकिन तीन से चार माह में पैसे मिलते हैं. घर में पिता युगल रजक व मां कौशल्या देवी के अलावे दो छोटे-छोटे बेटे हैं. परिवार का भरण पोषण बटाई पर जमीन लेकर करते थे. लेकिन बेटी के इलाज में सब कुछ पीछे छुट गया. अब तो खाने के भी लाले पड़ गये हैं. इलाज कैसे कराऊंगा. अगर कोई मदद मिल जाती तो बेटी की खुशियां घर में लौट जाती. लेकिन किस-किस से मदद की गुहार लगाऊं. धर्मेंद्र बताते हैं कि बेटी को अधिक बीमार रहने के बाद चार अक्तूबर 2015 को डेहरी में डाॅ अशोक को दिखाया,जहां ब्लड कैंसर की जानकारी मिली. इसके बाद टीएमसीएच टाटा में इलाज कराया. मुंबई कैंसर अस्पताल भी जाने की सलाह मिली,लेकिन आर्थिक स्थिति से हार गया. अभी कोलकाता के मेदनीपुर से एक वैद्य के क्लिनिक से इलाज चल रहा है. कुछ लोग लाखों रुपये खर्च होने की बात करते है तो आंख में आंसू आ जाता है.आखिर कहा से पैसे की जुगाड़ करूं, कौन करेगा मदद. सुना है लाचार व्यक्ति के साथ भगवान होता है, लेकिन भगवान भी…

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