पहले तीज का निर्जला उपवास, फिर चौरचन पर चंद्र दर्शन: भादो शुक्ल पक्ष में मिथिला की पावन परंपरा, देखें पूरा नियम

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चौरचन पर्व और तीज पर्व की खरीददारी करती महिलाएं | Prabhat Khabar Network

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सीमांचल और मिथिलांचल में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष में मनाए जाने वाले हरितालिका तीज और चौरचन पर्व महिलाओं की गहरी आस्था का प्रतीक हैं. जानिए इन महत्वपूर्ण व्रतों और परंपराओं का पूरा विधान.

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भाद्रपद (भादो) मास के शुक्ल पक्ष में मनाए जाने वाले 'हरितालिका तीज' और 'चौरचन' (चौठचंद्र) महापर्व को लेकर सीमांचल और मिथिलांचल के घर-आंगन में उल्लास का माहौल है. बिहार की लोक संस्कृति में इन दोनों पर्वों को महिलाओं की अगाध आस्था और निष्ठा का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है.

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पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और संतान के कल्याण के लिए सुहागिन महिलाएं अत्यंत कठिन नियमों का पालन करते हुए यह व्रत रखती हैं. यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मायके और ससुराल के अटूट रिश्तों और लोक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का सबसे बड़ा माध्यम है.

हरितालिका तीज: 24 घंटे का कठोर निर्जला व्रत और शिव-पार्वती की साधना

भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन हरितालिका तीज मनाई जाती है, जिसे हिंदू सनातन परंपरा में सबसे कठिन व्रतों में शुमार किया जाता है:

  • नामकरण और कथा: धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को वर रूप में पाने के लिए अन्न-जल त्यागकर कठोर तप किया था. जब उनके पिता उनका विवाह अन्यत्र करना चाहते थे, तब उनकी सखियों ने उनका 'हरण' (सुरक्षित गुप्त स्थान पर ले जाना) कर घने जंगल में साधना कराई थी. इसी कारण 'हरित' (हरण) और 'आलिका' (सखी) से मिलकर इसका नाम हरितालिका पड़ा.
  • पूजन विधान: सुहागिनें पूरे 24 घंटे तक अन्न और जल की एक बूंद ग्रहण किए बिना निर्जला उपवास रखती हैं. शाम को सोलह श्रृंगार कर सुहागिनें बालू या काली मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश की प्रतिमाएं स्थापित करती हैं, रात्रि जागरण कर तीज कथा सुनती हैं और आरती करती हैं.
चौरचन पर्व और तीज पर्व की खरीददारी करती महिलाएं | Prabhat Khabar Network
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चौरचन पर्व: चतुर्थी के चांद की पूजा और मिथ्या कलंक से मुक्ति का विधान

तीज के ठीक अगले दिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मिथिला का प्रसिद्ध 'चौरचन' पर्व श्रद्धा के साथ मनाया जाता है:

  • चांद और चतुर्थी की संयुक्त पूजा: चतुर्थी तिथि को चंद्रमा की पूजा किए जाने के कारण इसे लोकभाषा में 'चौरचन' या 'चौठचंद्र' कहा जाता है. इस दिन गणेश चतुर्थी का भी संयोग रहता है.
  • अर्घ्य और नैवेद्य: महिलाएं दिनभर उपवास रखकर संध्या काल में बांस की सजी हुई डलिया (टोकरी) में नए मौसमी फल, खीरा, केला, विभिन्न मिठाइयां, शुद्ध मिट्टी के बर्तनों में जमाई गई गाढ़ी दही, पान के पत्ते और चावल के आटे से बने पारंपरिक लड्डू (पिठार/लाई) सजाती हैं.
  • कलंक मुक्ति की मान्यता: पौराणिक मान्यता है कि इसी तिथि को चंद्रदेव को गणेश जी का श्राप लगा था, जिसके कारण इस दिन खाली आंखों से चांद देखने पर कलंक लगने का भय रहता है. लेकिन हाथ में फल और नैवेद्य लेकर रोहिणी सहित चंद्रमा को विधिवत अर्घ्य देने और दर्शन करने से साधक को किसी भी प्रकार के मिथ्या कलंक और बदनामी से मुक्ति मिलती है.

मायके और ससुराल के मिलन का उत्सव

मिथिला क्षेत्र में तीज और चौरचन सामाजिक समरसता और पारिवारिक मिठास का उत्सव है:

  • ससुराल से 'डाला' और मायके में पहली तीज: नवविवाहिताओं के लिए पहली तीज का विशेष महत्व होता है. परंपरा के अनुसार नई दुल्हन की पहली तीज उसके मायके में मनाई जाती है. इस अवसर पर ससुराल पक्ष की ओर से वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार सामग्री और मिठाइयों का विशेष 'डाला' मायके भेजा जाता है.
  • पारंपरिक लोकगीतों की गूंज: संध्या वेला में महिलाएं समूह बनाकर आंगन और छतों पर पारंपरिक मैथिली लोकगीत गाती हैं, जिससे पूरा परिवेश भक्ति, उल्लास और आत्मीयता के रंगों से सराबोर हो जाता है.

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