लड्डू गोपाल की छठी पर क्यों लगाया जाता है कढ़ी-चावल का भोग? जानें वजह
भगवान कृष्ण को कढ़ी-चावल का भोग लगाती महिला की सांकेतिक तस्वीर (एआई)
लड्डू गोपाल की छठी पर घरों में खास पूजा-अर्चना की जाती है. इस दिन बाल गोपाल को कढ़ी-चावल का भोग लगाने की परंपरा है. आखिर छठी के दिन यह भोग क्यों चढ़ाया जाता है? इसकी वजह जानने के लिए पढ़ें यह खबर.
Laddu Gopal Chatti: आज 9 सितंबर 2026, बुधवार के दिन लड्डू गोपाल की 'छठी' मनाई जा रही है. यह उत्सव कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक छह दिन बाद मनाया जाता है. इस बार कृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई गई थी. हिंदू धर्म में नवजात शिशु के जन्म के छठे दिन छठी पूजन की परंपरा है. भक्त बालगोपाल को अपने घर का सदस्य मानकर ठीक उसी रीति-रिवाज से यह उत्सव मनाते हैं. इस दिन लड्डू गोपाल का अभिषेक किया जाता है, उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनका श्रृंगार किया जाता है. इस उत्सव में कान्हा जी को कढ़ी-चावल का भोग लगाना विशेष महत्व रखता है. आइए जानते हैं, बाल गोपाल की छठी पर कढ़ी-चावल का भोग लगाने के धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से.

बाल गोपाल को कढ़ी-चावल का भोग क्यों लगाया जाता है?
सात्विक भोग: लड्डू गोपाल की छठी पर सात्विक और सुपाच्य भोजन का भोग लगाने की परंपरा है. दही, बेसन और हल्दी से बनने वाली कढ़ी को सात्विक भोजन माना जाता है. इसलिए छठी के दिन बाल गोपाल को कढ़ी-चावल का भोग लगाया जाता है.
हल्दी का शुभ प्रभाव: कढ़ी का पीला रंग हल्दी से आता है. भगवान श्रीकृष्ण का पीला रंग यानी पीतांबर प्रिय माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं में पीले रंग को सुख-समृद्धि, ज्ञान और शुभता का प्रतीक माना गया है.
ठाकुरजी का प्रिय दही: भगवान श्रीकृष्ण को दही और मक्खन प्रिय माना जाता है. कढ़ी का मुख्य आधार दही होता है, इसलिए मान्यता है कि छठी के दिन कढ़ी-चावल का भोग लगाने से बाल गोपाल की विशेष कृपा प्राप्त होती है.
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लड्डू गोपाल की 'छठी' पर बरतें ये सावधानियां
- ध्यान रखें कि जिस बर्तन में भोग बनाया जा रहा है, वह साफ और शुद्ध हो.
- भोग बनाते समय ध्यान रखें कि रसोईघर और चूल्हा पूरी तरह साफ हों.
- कढ़ी बनाते समय किसी भी तरह की तामसिक चीजें, जैसे लहसुन-प्याज, का इस्तेमाल न करें.
- भोग तैयार करने से पहले स्नान करके साफ कपड़े पहनें और भगवान के लिए भोग शुद्ध मन से तैयार करें.
- कढ़ी-चावल तैयार होने के बाद सबसे पहले इसे लड्डू गोपाल को भोग लगाएं. इसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य प्रसाद के रूप में ग्रहण करें.
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