पुत्रदा एकादशी पर पढ़ें श्री विष्णु चालीसा, मिलेगा भगवान विष्णु का आशीर्वाद

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भगवान विष्णु की पूजा करते हुए भक्त की सांकेतिक तस्वीर (एआई)

Putrada Ekadashi 2026: भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए पुत्रदा एकादशी के दिन विष्णु चालीसा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है. मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक चालीसा पढ़ने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, मन शांत रहता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है.

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Putrada Ekadashi 2026: सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी आज, 23 अगस्त 2026 को पुत्रदा एकादशी का पावन पर्व मनाया जा रहा है. भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित यह व्रत संतान प्राप्ति, संतान की दीर्घायु और उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के दौरान विष्णु चालीसा का पाठ करने से शुभ फलों में वृद्धि होती है. साथ ही नकारात्मकता और तनाव दूर होता है तथा सुख-शांति की प्राप्ति होती है. ऐसे में यहां पढ़ें भगवान विष्णु चालीसा के पूरे लिरिक्स.

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श्री विष्णु चालीसा

भगवान विष्णु (AI Image)
भगवान विष्णु (AI Image)

दोहा

विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय. कीरत कुछ वर्णन करूं, दीजै ज्ञान बताय॥

चौपाई

नमो विष्णु भगवान खरारी. कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥

प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी. त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत. सरल स्वभाव मोहिनी मूरत॥

तन पर पीतांबर अति सोहत. बैजंती माला मन मोहत॥

शंख चक्र कर गदा बिराजे. देखत दैत्य असुर दल भाजे॥

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सत्य धर्म मद लोभ न गाजे. काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥

संत-भक्त सज्जन मनरंजन. दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥

सुख उपजाय कष्ट सब भंजन. दोष मिटाय करत जन सज्जन॥

पाप काट भवसिंधु उतारण. कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥

करत अनेक रूप प्रभु धारण. केवल आप भक्ति के कारण॥

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा. तब तुम रूप राम का धारा॥

भार उतार असुर दल मारा. रावण आदिक को संहारा॥

आप वराह रूप बनाया. हिरण्याक्ष को मार गिराया॥

धर मत्स्य तन सिंधु बनाया. चौदह रतनन को निकलाया॥

अमिलख असुरन द्वंद मचाया. रूप मोहिनी आप दिखाया॥

देवन को अमृत पान कराया. असुरन को छवि से बहलाया॥

कूर्म रूप धर सिंधु मझाया. मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥

शंकर का तुम फंद छुड़ाया. भस्मासुर को रूप दिखाया॥

वेदों को जब असुर डुबाया. कर प्रबंध उन्हें ढूंढ़वाया॥

मोहित बनकर खलहि नचाया. उसी कर से भस्म कराया॥

असुर जलंधर अति बलदाई. शंकर से उन कीन्ह लड़ाई॥

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हार-पार शिव सकल बनाई. कीन सती से छल खल जाई॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी. बतलाई सब विपत कहानी॥

तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी. वृंदा की सब सुरति भुलानी॥

देखत तीन दनुज शैतानी. वृंदा आय तुम्हें लपटानी॥

हो स्पर्श धर्म क्षति मानी. हना असुर उर शिव शैतानी॥

तुमने ध्रुव प्रह्लाद उबारे. हिरण्यकशिपु आदिक खल मारे॥

गणिका और अजामिल तारे. बहुत भक्त भवसिंधु उतारे॥

हरहु सकल संताप हमारे. कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥

देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे. दीनबंधु भक्तन हितकारे॥

चहत आपका सेवक दर्शन. करहु दया अपनी मधुसूदन॥

जानूं नहीं योग्य जप-पूजन. होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥

शील, दया, संतोष सुलक्षण. विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥

करूं आपका किस विधि पूजन. कुमति विलोक होत दुख भीषण॥

करूं प्रणाम कौन विधि सुमिरण. कौन भांति मैं करूं समर्पण॥

सुर-मुनि करत सदा सेवकाई. हर्षित रहत परम गति पाई॥

दीन-दुखिन पर सदा सहाई. निज जन जान लेव अपनाई॥

पाप दोष संताप नशाओ. भव-बंधन से मुक्त कराओ॥

सुख-संपत्ति दे सुख उपजाओ. निज चरणन का दास बनाओ॥

निगम सदा ये विनय सुनावै. पढ़ै-सुनै सो जन सुख पावै॥

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