रक्षा का बंधन है रक्षाबंधन
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :18 Aug 2016 6:16 AM (IST)
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रक्षाबंधन पर्व अनादि काल से वसुधैव कुटुंबकम् की स्नेहमयी भावना का मंत्र फूंक रहा है. भाई-बहन के पवित्र प्रेम का यह भावनाप्रधान पर्व संस्कृति की विजय का भी उद्घोष करता है. यही कारण है कि मानवीय संबंधों की मधुरता के प्रतीक इस त्योहार को पूरा देश आत्मीयता के साथ मनाता चला आ रहा है. राखी […]
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रक्षाबंधन पर्व अनादि काल से वसुधैव कुटुंबकम् की स्नेहमयी भावना का मंत्र फूंक रहा है. भाई-बहन के पवित्र प्रेम का यह भावनाप्रधान पर्व संस्कृति की विजय का भी उद्घोष करता है. यही कारण है कि मानवीय संबंधों की मधुरता के प्रतीक इस त्योहार को पूरा देश आत्मीयता के साथ मनाता चला आ रहा है. राखी बांधते समय बहन के भाव होते हैं कि उसके भाई के द्वारा रक्षा सदैव होती रहे. रक्षा सूत्र वैसे तो केवल कच्चा धागा ही होता है, लेकिन इसमें जब श्रद्धा-भावना की शक्ति समाहित हो जाती है, तो यह साधारण धागा मात्र नहीं रह जाता है, उसे तोड़ना असंभव होता है.
प्राचीनकाल से ही हम कच्चे धागे का उपयोग प्रकृति और मानवीय व्यवहार में करते आ रहे हैं. रक्षाबंधन केवल मात्र रक्त संबंध का ही सूचक नहीं है, अपितु उसका प्रभाव अपरिमित क्षेत्र तक विस्तृत है, जहां संबंधों में प्रेम, सौहार्द, त्याग और पवित्रता की भावना हो. रक्षा सूत्र से एक अनजान और विजातीय को भी भाई-बहन बनाने के आदर्श संबंधों के इतिहास के पन्ने सुशोभित है, चूंकि रक्षाबंधन का शाब्दिक अर्थ ही है- रक्षा का बंधन, जो इस बंधन से बंध जाता है, वह अपने प्राण का उत्सर्ग करके भी रक्षा करता है. साहित्य और इतिहास में ऐसे अनेक प्रसंग आये हैं, जिनमें राखी के कच्चे धागे ने कायरों में भी प्रेरणा और साहस भर कर देश और धर्म के नाम पर न्यौछावर होकर अपना नाम रोशन किया है. राखी ने अगणित शत्रुओं को मित्र बनाया है.
इतिहास साक्षी है कि मुगल बादशाह हुमायूं और राणा सांगा में घोर शत्रुता थी, परंतु जब गुजरात के बादशाह बहादुर शाह ने अपने पूर्वजों की पराजय का बदला लेने के लिए चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया, तब महारानी कर्मावती ने अपने पुत्र युवराज उदयसिंह की सुरक्षा के लिए हुमायूं को राखी भेजी थी. जैसे ही हुमायूं को राखी मिली, तो वह पुरानी शत्रुता को भूल कर बंगाल की विजय अधूरी छोड़ कर तुरंत चित्तौड़ की ओर सेना लेकर रवाना हुआ. हुमायूं जब बंगाल से लंबी यात्रा करके चित्तौड़ पहुंचा, तब तक चित्तौड़ का पतन हो चुका था.
महारानी कर्मावती अपनी सहेलियों के साथ जौहर व्रत करके भस्मीभूत हो चुकी थीं. फिर भी हुमायूं ने बहादुर शाह पर आक्रमण करके उसे पराजित किया और महारानी के पुत्र उदयसिंह को गद्दी पर बिठा कर राखी बंद भाई के नाम को उज्ज्वल करके इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित कराया.
– पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
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