प्रतिद्वंद्वी अवस्थाओं में

Published at :06 May 2016 6:05 AM (IST)
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प्रतिद्वंद्वी अवस्थाओं में

इन दिनों निरंतर दो दबाव बढ़ते जा रहे हैं. एक है- व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करने का दबाव, और दूसरा है- नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता का दबाव. निजी और छोटे क्षेत्र में भी यह दोनों कार्य अति कठिन पड़ते हैं. प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए […]

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इन दिनों निरंतर दो दबाव बढ़ते जा रहे हैं. एक है- व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करने का दबाव, और दूसरा है- नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता का दबाव. निजी और छोटे क्षेत्र में भी यह दोनों कार्य अति कठिन पड़ते हैं. प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए तदनुरूप योग्यता एवं कर्मनिष्ठा उत्पन्न करनी पड़ती है. इनके बिना सामान्य स्थिति में रहते हुए किसी प्रकार दिन काटते ही बन पड़ता है. अनेकों समस्याएं और कठिनाइयों, आये दिन त्रास और संकट भरी परिस्थितियों बनी रही रहती हैं.
जो कठिनाइयों से जूझ सकता है और प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के साधन जुटा सकता है, उसी को प्रतिभावान कहते हैं. औचित्य कहां है, इसकी विवेचना बुद्धि इनमें नहीं के बराबर होती है. वे साधनों के लिए, मार्गदर्शन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं. उनके उत्थान-पतन का निमित्त कारण दूसरे ही बने रहते हैं. दूसरा वर्ग वह है, जो समझदार होते हुए भी संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरा रहता है. योग्यता और तत्परता जैसी विशेषताएं होते हुए भी वे उन्हें मात्र लोभ, मोह, अहंकार की पूर्ति के लिए ही नियोजित किये रहते हैं. तीसरा वर्ग प्रतिभाशालियों का है. वे भौतिक क्षेत्र में कार्यरत रहते हैं, तो अनेक व्यवस्थाएं बनाते हैं. आड़े समय में उच्च स्तरीय प्रतिभाओं की ही आवश्यकता होती है.
मनस्वी, तेजस्वी और ओजस्वी ऐसे कर्मयोग की साधना में ही निरत रहते हैं. बड़ी योजनाएं बनाते और चलाते हैं. जिन्होंने महत्वपूर्ण सफलताएं पायी, प्रतिस्पर्धाएं जीतीं, उनमें ऐसी ही मौलिक सूझ-बूझ होती है. वर्तमान समय विश्व इतिहास में अद्भुत एवं अभूतपूर्व स्तर का है. इसमें एक ओर महाविनाश का प्रलयंकर तूफान अपनी प्रचंडता का परिचय दे रहा है, तो दूसरी ओर सतयुगी नवनिर्माण की उमंगें भी उछल रही हैं.
विनाश और विकास एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं, तो भी उनके एक ही समय में अपनी-अपनी दिशा में चलना संभव है. इन दिनों आकाश में सघन तमिस्त्रा का साम्राज्य है, तो दूसरी ओर, ब्रह्ममुहूर्त का आभास भी प्राची में उदीयमान होता दिख रहा है. इन दोनों के समन्वय को देखते हुए ही इस समय को युगसंधि का समय माना गया है.À पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
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