आदमी कार्य करता है. कार्य करने पर कभी उसे सफलता, तो कभी उसे असफलता भी मिल सकती है. सिद्धि और असिद्धि जो भी मिल जाये, उसमें आदमी को समता रखनी चाहिए और विकार, हर्ष एवं शोक में नहीं जाना चाहिए. कार्य करना एक बात है और होना दूसरी बात है.
आप लोग व्यापार करते हैं, तब पहले सोचते हैं कि व्यापार कहां करें, किस चीज का करें, कब करें, कैसे करें, ताकि हमें नफा हो. कार्य प्रारंभ करने से पहले अच्छी तरह सोचना चाहिए, चिंतनपूर्वक काम शुरू करना चाहिए. इस तरह काम शुरू करने से नफा के साथ ही कभी घाटा भी हो सकता है. इसलिए व्यापार में मानसिक संतुलन की बहुत जरूरत होती है. मस्तिष्क का, चिंतन का यदि असंतुलन हो जाता है, तो वह कभी-कभी अवसाद तक की स्थिति पैदा कर सकता है.
इसलिए गीताकार ने कहा है कि सिद्धि में ज्यादा हर्ष नहीं करना चाहिए और असिद्धि में ज्यादा शोक नहीं करना चाहिए. हर्ष और शोक से बच कर आदमी समता में रहे, सहज प्रसन्न रहे, शांति में रहे, जो स्थिति आये उसे शांत भाव से देखे, किंतु राग-द्वेष से बचने का प्रयास करे. जो सफलता और असफलता में मानसिक संतुलन बनाये रखता है, वह सात्त्विक कर्ता है.
– आचार्य महाश्रमण