वासंतिक नवरात्र सातवां दिन : ऐसे करें मां कालरात्रि की पूजा

Published at :24 Mar 2018 5:12 AM (IST)
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वासंतिक नवरात्र सातवां दिन : ऐसे करें मां कालरात्रि की पूजा

करालरूपा कालाब्जसमानाकृति विग्रहा। कालरात्रिः शुभं दद्दाद् देवी चण्डाटटहासिनी।। जिनका रूप विकराल है, जिनकी आकृति और विग्रह कृष्ण कमल सदृश है तथा जो भयानक अट्टहास करनेवाली हैं, वे कालरात्रि देवी दुर्गा मंगल प्रदान करें. सच्चिदानंदस्वरूपा परमेश्वरी -7 सगुण-उपासना के ब्रह्मपद से संबंधित चिद्-भाव का आश्रय लेकर विष्णु, सद् भाव से शिव, तेजो भावप्रधान सूर्य, बुद्धिप्रधान गणपति […]

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करालरूपा कालाब्जसमानाकृति विग्रहा।
कालरात्रिः शुभं दद्दाद् देवी चण्डाटटहासिनी।।
जिनका रूप विकराल है, जिनकी आकृति और विग्रह कृष्ण कमल सदृश है तथा जो भयानक अट्टहास करनेवाली हैं, वे कालरात्रि देवी दुर्गा मंगल प्रदान करें.
सच्चिदानंदस्वरूपा परमेश्वरी -7
सगुण-उपासना के ब्रह्मपद से संबंधित चिद्-भाव का आश्रय लेकर विष्णु, सद् भाव से शिव, तेजो भावप्रधान सूर्य, बुद्धिप्रधान गणपति तथा भगवत-शक्ति का आश्रय ग्रहण कर शक्ति की उपासना का क्रम उदभूत हुआ.
चिदंश से जगत का दर्शन, सदंश से जगत के अस्तित्व का अनुभव, तेज-अंश से ब्रह्म की ओर आकर्षण, बुद्धि से सद्-ब्रह्म और असत जगत के भेद का ज्ञान होता है. शक्ति सृष्टि, स्थिति और लय करती हुई जीव को बद्ध भी करती तथा मुक्ति भी प्रदान कराती है. इन उपासनाओं से ब्रह्म सांनिध्य तथा अंत में ब्रह्मसायुज्य प्राप्त होता है. इनकी पांच पृथक गीताएं हैं. इनके प्रधान देवों का ब्रह्मरूप में निर्देश है.
शक्ति उपासना में मातृभाव से उपास्य की करूणा उपासक को सर्वदा सुलभ रहती है. उपासना की शक्ति-प्रधान में मधुरता विशेष है. आद्दाशक्ति परमेश्वरी मां के उपासना में काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी या षोड़शी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला या कमलात्मिका – इन दस महाविद्याओं का अत्यंत महत्व है. इनमें प्रथम दो महाविद्या, पांच विद्या तथा अंत की तीन सिद्ध विद्या के नाम से प्रसिद्ध हैं.
षोड़शी को श्रीविद्या माना जाता है,उनके ललित, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुंदरी, बालापंचदशी आदि अनेक नाम हैं. इन्हें आद्याशक्ति माना जाता है. वे भुक्ति-मुक्तिदात्री हैं. अन्य विद्याएं भोग या मोक्ष में से एक ही देती है. इनके स्थूल, सूक्ष्म, पर तथा तुरीय चार रूप हैं. सांसारिक रागी पुरूष सगुण तथा विरागी निर्गुण के उपासक हैं –
सगुणा निर्गुणा चेति व्दिधा प्रोक्ता मनीषिभिः ।
सगुणा रागिभिः प्रोक्ता निर्गुणा तु विरागिभिः ।।
( क्रमशः)
प्रस्तुति : डॉ एन के बेरा
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