Jantar Mantar Protest : जोहार. आज है 27 जुलाई. आप सोचते होंगे कि Instagram, Facebook, Youtube और सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन के साधन हैं. कुछ रील्स देख लीं, कुछ मीम्स शेयर कर दिए और दिन खत्म.लेकिन अगर कोई कहे कि आज के दौर में टैंक, मिसाइल और बंदूक से ज्यादा ताकतवर हथियार एक मोबाइल स्क्रीन बन चुकी है, तो शायद यकीन करना मुश्किल होगा.मगर दुनिया की राजनीति बदल चुकी है.पहले देशों को कमजोर करने के लिए सीमाओं पर युद्ध लड़े जाते थे. अब युद्ध लोगों के दिमाग में लड़े जाते हैं. पहले सैनिक सीमा पार करते थे, अब नैरेटिव सीमा पार करते हैं. पहले बम गिरते थे, अब एल्गोरिदम गिरते हैं.यही कारण है कि पूरी दुनिया सोशल मीडिया को सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे के रूप में देखने लगी है.भारत की कहानी: क्या आपकी फीड किसी और ने तय की थी?हाल के वर्षों में भारत ने कई छात्र और युवा आंदोलनों को देखा.शुरुआत शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों से हुई. लेकिन सोशल मीडिया पर जो तस्वीर दिखाई गई, उस पर कई सवाल उठे.कई लोगों ने दावा किया कि उनके इंस्टाग्राम और फेसबुक फीड अचानक एक जैसे वीडियो से भर गए. हर वीडियो में लगभग एक जैसी भाषा, एक जैसा संगीत और एक जैसी भावनात्मक अपील थी.लेकिन जिन वीडियो में हिंसा, पत्थरबाजी, सरकारी संपत्ति को नुकसान या पुलिस पर हमले दिखाई देते थे, वे अपेक्षाकृत कम लोगों तक पहुंचे.यहीं से सवाल शुरू होता है-क्या सोशल मीडिया वही दिखाता है जो सच है?या फिर वही दिखाता है जो उसका एल्गोरिदम सबसे ज्यादा वायरल करना चाहता है?एल्गोरिदम कैसे तय करता है कि आप क्या देखेंगे?तकनीकी विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तटस्थ नहीं होते.उनका बिजनेस मॉडल लोगों को अधिक समय तक स्क्रीन पर बनाए रखने पर आधारित है.इसलिए एल्गोरिदम उन पोस्टों को प्राथमिकता देते हैं जो गुस्सा, डर, भावनात्मक प्रतिक्रिया और विवाद पैदा करें.यानी सच से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है—एंगेजमेंटयदि कोई वीडियो आपको क्रोधित करता है, तो उसके वायरल होने की संभावना बढ़ जाती है.यदि कोई पोस्ट आपको भावुक बनाती है, तो वह ज्यादा लोगों तक पहुंचती है.और यदि कोई नैरेटिव समाज को दो हिस्सों में बांटता है, तो प्लेटफॉर्म का ट्रैफिक भी बढ़ता है.यहीं से एल्गोरिदम केवल तकनीक नहीं, बल्कि जनमत निर्माण का साधन बन जाता है.रंग क्रांति क्या है?दुनिया में एक शब्द काफी चर्चित रहा है- कलर रिवोल्यूशन.इसका अर्थ है ऐसा राजनीतिक परिवर्तन जिसमें सेना नहीं, बल्कि जनभावनाओं को हथियार बनाया जाता है.इस मॉडल में सोशल मीडिया, डिजिटल अभियान, एनजीओ नेटवर्क और भावनात्मक नैरेटिव के माध्यम से सरकारों के खिलाफ व्यापक माहौल तैयार किया जाता है.कई विशेषज्ञ इसे आधुनिक दौर का सूचना युद्ध (Information Warfare) भी कहते हैं.अरब स्प्रिंग: जब फेसबुक बना क्रांति का मंच2011 में दुनिया ने पहली बार सोशल मीडिया की राजनीतिक शक्ति को बड़े स्तर पर देखा.ट्यूनीशिया की एक घटना देखते ही देखते फेसबुक और ट्विटर के जरिए पूरे अरब क्षेत्र में फैल गई.फिर मिस्र, लीबिया और सीरिया में बड़े आंदोलन हुए.उस समय सोशल मीडिया को लोकतंत्र का नया हथियार कहा गया.लेकिन वर्षों बाद तस्वीर बदली हुई दिखाई दी.लीबिया लंबे समय तक अस्थिरता से जूझता रहा.सीरिया गृहयुद्ध में फंस गया.लाखों लोग विस्थापित हुए.इसलिए आज सवाल पूछा जाता है कि क्या सोशल मीडिया आधारित आंदोलनों का परिणाम हमेशा लोकतंत्र को मजबूत करता है, या कभी-कभी अराजकता भी पैदा करता है?भारत के पड़ोस में क्या हुआ?भारत के तीन पड़ोसी देश अक्सर इस बहस में उदाहरण के रूप में सामने आते हैं.श्रीलंका में आर्थिक संकट के दौरान सोशल मीडिया ने व्यापक जनसंगठन में बड़ी भूमिका निभाई.बांग्लादेश में डिजिटल अभियान और राजनीतिक ध्रुवीकरण लगातार चर्चा का विषय रहे.नेपाल में भी राजनीतिक अस्थिरता के दौरान ऑनलाइन नैरेटिव का प्रभाव देखा गया.इन तीनों उदाहरणों में एक समान बात थी-डिजिटल प्लेटफॉर्म राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख मैदान बन चुके थे.विदेशी फंडिंग का विवादयहीं एक और बड़ा विवाद सामने आता है.कई विश्लेषक अमेरिका स्थित संस्थाओं- USAID, National Endowment for Democracy (NED) और George Soros समर्थित Open Society Foundations की भूमिका पर सवाल उठाते रहे हैं.इन संस्थाओं का कहना है कि उनका उद्देश्य लोकतंत्र, मानवाधिकार और नागरिक समाज को मजबूत करना है.दूसरी ओर, आलोचकों का आरोप है कि कुछ देशों में ये संस्थाएं स्थानीय राजनीति और सरकार विरोधी अभियानों को अप्रत्यक्ष समर्थन देती हैं.इसी वजह से कई देशों ने इनके संचालन पर कड़े नियम बनाए हैं.यह विषय आज भी अंतरराष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना हुआ है. प्रभात खबर UPSC पर खास कवरेज कर रहा है, ताकि आपको एक्सपर्ट गाइडेंस के लिए कहीं और न जाना पड़े. UPSC परीक्षाओं से जुड़ी सभी ताजा जानकारी के लिए हमारे साथ जुड़े रहें.प्रभात खबर UPSC Exclusive : UPSC : एक ख्वाब, कई इम्तिहानप्रभात खबर UPSC Exclusive Interview : आखिर UPSC इतना डरा क्यों रहा है? पटना वाले Eduteria का Exclusive Interviewप्रभात खबर UPSC Exclusive Interview : UPSC : 'Tina Dabi जहां भी होती, उसी समर्पण के साथ मेहनत करती'- Khan Sir का एक्सक्लूसिव इंटरव्यूक्या सोशल मीडिया कंपनियां वास्तव में निष्पक्ष हैं?मेटा सहित कई बड़ी टेक कंपनियां पिछले कुछ वर्षों में विवादों के केंद्र में रही हैं.अलग-अलग देशों में उन पर आरोप लगे कि उन्होंने कुछ कंटेंट को सीमित किया, कुछ को बढ़ावा दिया और कई बार सरकारी अनुरोधों के आधार पर सामग्री हटाई.कंपनियों का कहना है कि वे स्थानीय कानूनों का पालन करती हैं।लेकिन आलोचक पूछते हैं- यदि कुछ निजी कंपनियां अरबों लोगों की सूचना नियंत्रित करती हों, तो क्या उनके एल्गोरिदम लोकतंत्र को भी प्रभावित नहीं करेंगे?चीन का मॉडल: डिजिटल संप्रभुता या सेंसरशिप?चीन ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे कई पश्चिमी प्लेटफॉर्म पर वर्षों पहले प्रतिबंध लगा दिया.इसके स्थान पर उसने वीचैट, वीबो और अन्य घरेलू प्लेटफॉर्म विकसित किए.चीन का तर्क है कि सूचना व्यवस्था पर राष्ट्रीय नियंत्रण भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है.आलोचक इसे सेंसरशिप कहते हैं.समर्थक इसे डिजिटल आत्मनिर्भरता.इसी वजह से भारत में भी समय-समय पर यह बहस उठती है कि क्या देश को अपने मजबूत स्वदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित करने चाहिए.भारत के सामने सबसे बड़ा सवालभारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है.करोड़ों लोग अपनी राजनीतिक समझ सोशल मीडिया के माध्यम से बनाते हैं.ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन-सा आंदोलन सही है और कौन-सा गलत.सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नागरिक पूरी तस्वीर देख पा रहे हैं?या फिर वे केवल वही देख रहे हैं जिसे एल्गोरिदम सबसे अधिक वायरल करना चाहता है?अगला युद्ध आपकी स्क्रीन पर होगालोकतंत्र में विरोध जरूरी है.सरकार से सवाल पूछना भी जरूरी है.लेकिन उतना ही जरूरी है हर वायरल वीडियो, हर ट्रेंडिंग हैशटैग और हर भावनात्मक नैरेटिव को आलोचनात्मक नजर से देखना.क्योंकि डिजिटल युग में सबसे बड़ा युद्ध जमीन पर नहीं, सूचना के क्षेत्र में लड़ा जा रहा है.इस युद्ध में सैनिक नहीं, बल्कि यूजर हैं.हथियार नहीं, बल्कि स्मार्टफोन हैं.और मोर्चा कोई सीमा नहीं, बल्कि आपकी सोशल मीडिया फीड है.इसलिए अगली बार जब कोई वीडियो आपको तुरंत गुस्सा दिलाए, किसी समुदाय के प्रति नफरत पैदा करे या किसी पक्ष के प्रति अत्यधिक भावुक बना दे, तो एक पल रुकिए और खुद से सिर्फ एक सवाल पूछिए- क्या मैं पूरी सच्चाई देख रहा हूं, या सिर्फ वही जो कोई एल्गोरिदम मुझे दिखाना चाहता है?यह भी पढ़ें : 20 जुलाई… Modi 3 vs Protest 3यह भी पढ़ें : Monsoon Session : क्या राहुल गांधी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में जान फूकेंगे? दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर से खास इंटरव्यूयह भी पढ़ें : Prashant Kishor : दूसरों की सरकार बनाने वाले PK, बांकीपुर उपचुनाव में क्या साबित करना चाहते हैं?