26 अगस्त को नेपाल में आई भयानक बाढ़ को 13 दिन बीत चुके हैं, लेकिन तबाही की तस्वीर अभी भी नहीं बदली है. राहत और बचाव टीमें पहाड़ों में मलबे के बीच फंसे लोगों को खोज रही हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 13 हजार से ज्यादा लोगों को बचाया जा चुका है, लेकिन 4,894 लोग अभी भी लापता हैं. इनमें 587 विदेशी नागरिक शामिल हैं.बाढ़ और भूस्खलन से 1,356 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि तिब्बत में 43 लोगों की जान गई है. इस तबाही के बाद 4 सितंबर को नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र से राहत के लिए 49.6 मिलियन डॉलर की सहायता मांगी थी, लेकिन अब वो इससे आगे की बात कर रहा है.नेपाल का सवाल है कि जलवायु बदलाव से हो रहे इस नुकसान की भरपाई की जिम्मेदारी किसकी है?पहले राहत की अपील, अब मुआवजे की उम्मीदनेपाल में बड़े पैमाने पर हुए नुकसान को लेकर 4 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र और उसके सहयोगी संगठनों ने 49.6 मिलियन डॉलर की राहत अपील की. इस पैसे से करीब 84 हजार जरूरतमंद लोगों तक मदद पहुंचाने की बात कही गई.जिसमें जरूरतमंद लोगों को खाना, पीने का पानी, दवाएं, अस्थायी घर और दूसरी जरूरी चीजें उपलब्ध कराई जा रही. यह पैसा मुआवजा के तौर पर नहीं बल्कि लोगों को तत्काल राहत देने के लिए जारी किया गया है.हालांकि अब नेपाल की मांग दूसरी है, उसका कहना है कि जलवायु में चेंज की वजह से हुए बड़े नुकसान के लिए अलग से मुआवजा के तौर पर भी पैसा मिले.नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा था कि, नेपाल का ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान बहुत कम है और ऐसी आपदाओं का असर देश को गंभीर रूप से झेलना पड़ता है.अब सवाल ये है कि क्या नेपाल की मांग सही है और अगर हां, तो क्या इसके लिए कोई अंतरराष्ट्रीय कानून है. सवाल ये है कि क्या ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए किस पैमाने पर किसी को दोषी माना जाएगा?ये भी पढ़ें: Nepal Flood : भारत, चीन और अमेरिका से नेपाल ने क्यों कहा-दान नहीं मुआवजा चाहिए, समझिए क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानूनआपदाओं से हुए नुकसान की भरपाई के लिए क्या है कानून?आपदाओं से निपटने के लिए दुनिया में अलग-अलग स्तर पर मदद की व्यवस्था है. संयुक्त राष्ट्र की जलवायु व्यवस्था(Climate System) के तहत इस बात को माना गया है कि गरीब और जलवायु बदलाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील देशों को बाढ़, भूस्खलन, सूखा, चक्रवात और दूसरी आपदाओं से भारी नुकसान उठाना पड़ता है.लेकिन कई बार यह आपदा इतनी बड़ी होती है कि इन देशों के पास नुकसान से उबरने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं होता. इसलिए इन देशों की सहायता के लिए लॉस एंड डैमेज, यानी जलवायु बदलाव से हुए नुकसान और क्षति की बात आती है.आसान भाषा में समझें तो लॉस एंड डैमेज का मतलब ऐसे नुकसान से है, जिसे सिर्फ बेहतर तैयारी, मजबूत सड़क-पुल या मौसम की चेतावनी देकर पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं है, मसलन, बाढ़ में घर बह गया, खेती बर्बाद हो गई, लोगों का रोजगार चला गया या किसी इलाके से लोगों को हमेशा के लिए दूसरी जगह जाना पड़ा. इस तरह के नुकसान से निपटने के लिए फंड फॉर रेस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज, बनाया गया है.इसका मकसद उन विकासशील देशों की मदद करना है, जो जलवायु बदलाव का ज्यादा असर झेल रहे हैं. लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है कि लॉस एंड डैमेज फंड कोई ऐसा सिस्टम नहीं है कि आपदा आई और अगले दिन नुकसान की पूरी रकम देश के खाते में पहुंच गई.इसके लिए किसी देश को अपनी जरूरत बतानी होती है. उसे यह दिखाना होता है कि किस तरह का नुकसान हुआ है और पैसे की जरूरत किस काम के लिए है. इसके बाद तय प्रक्रिया के तहत प्रस्ताव की जांच और मंजूरी के बाद ही पैसा मिलता है.यानी लॉस एंड डैमेज फंड मौजूद जरूर है, लेकिन यह अभी ऐसा अंतरराष्ट्रीय मुआवजा सिस्टम नहीं है जो किसी बड़ी आपदा के तुरंत बाद हुए पूरे नुकसान की भरपाई कर दे.नेपाल के लिए कितना जरूरी है लॉस एंड डैमेज फंडनेपाल के लिए लॉस एंड डैमेज फंड इसलिए जरूरी है क्योंकि जलवायु बदलाव का असर वहां लगातार बढ़ रहा है.बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियर पिघलने और ग्लेशियल झील फटने जैसी घटनाएं अब बड़ा खतरा बन रही हैं. खास बात यह है कि दुनिया के कुल उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी बहुत कम है, लेकिन जलवायु बदलाव (Climate Change) का नुकसान उसे काफी ज्यादा झेलना पड़ रहा है.26 अगस्त की बाढ़ ने इस खतरे को फिर सामने ला दिया. शुरुआती अनुमान के मुताबिक इस आपदा से नेपाल को करीब 2.56 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है.हजारों घर तबाह हुए हैं, जबकि सड़क, पुल और जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचा है. इतना बड़ा नुकसान नेपाल के लिए अकेले संभालना आसान नहीं है. यहीं लॉस एंड डैमेज फंड उसके काम आ सकता है. .दरअसल, नेपाल को सिर्फ बाढ़ के बाद राहत का पैसा नहीं चाहिए.उसे टूटे घर, सड़कें, बिजली परियोजनाएं और लोगों की रोजी-रोटी फिर से खड़ी करने के लिए लंबे समय की मदद चाहिए. लॉस एंड डैमेज फंड इस काम में बड़ा सहारा बन सकता है, लेकिन अभी इसकी रकम नेपाल की जरूरत से काफी कम है.जलवायु बदलाव से हिमालय में क्यों बढ़ रहा खतरा?हिमालय में खतरा अब सिर्फ भारी बारिश और बाढ़ से नहीं है. जलवायु बदलाव(Climate Change) के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे पहाड़ों में बड़ी-बड़ी झीलें बन रही हैं. इनमें पानी बढ़ने पर इनके टूटने का खतरा भी बढ़ जाता है.अगर ऐसी झील टूटती है तो बहुत तेज रफ्तार से पानी नीचे आता है. इसके साथ पत्थर, मिट्टी और बर्फ भी बह सकती है. इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है. ऐसी बाढ़ घर, सड़क, पुल और बिजली की परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा सकती है.ICIMOD के मुताबिक हिमालय के ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं,चिंता की बात यह है कि एक खतरा दूसरे को बढ़ा सकता है. भारी बारिश से भूस्खलन, भूस्खलन से ग्लेशियर झील में हलचल और फिर अचानक बाढ़ आ सकती है.नेपाल में 26 अगस्त की बाढ़ ने इस खतरे की गंभीरता दिखा दी. घर, सड़कें, पुल और बिजली की परियोजनाएं प्रभावित हुईं. ऐसे में नेपाल को सिर्फ आपदा के बाद राहत नहीं, बल्कि नुकसान के बाद दोबारा सब कुछ खड़ा करने के लिए भी पैसे की जरूरत है. यही वजह है कि नेपाल के लिए लॉस एंड डैमेज फंड की अहमियत लगातार बढ़ रही है.ये भी पढ़ें: Explainer : बिहार में हर साल हजारों करोड़ पानी में बह रहा, फिर क्यों बाढ़ नहीं रोक पा रही सरकार?