Monsoon Session: क्या संसद में चली जाएगी राजनीति की सबसे दिलचस्प शतरंज?

मोदी-शाह: संख्या से आगे, सहमति की राजनीति
क्या परिसीमन सिर्फ सीटों का बंटवारा है, या 2030 के दशक की भारतीय राजनीति की नई पटकथा? इस मानसून सत्र में संसद में भाषणों से ज्यादा रणनीति, गठबंधन और फ्लोर मैनेजमेंट की परीक्षा होगी.
जोहार. आज है 20 जुलाई. आज से शुरू होने वाला संसद का monsoon session कई कारणों से चर्चा में रहेगा.
एक ओर Sonam Wangchuk का आमरण अनशन, E20 एथेनॉल मिश्रण पर बहस, राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े प्रश्न और दक्षिण भारत में कांग्रेस की नई राजनीतिक सक्रियता. यह सब विपक्ष को सरकार के खिलाफ मुद्दे उपलब्ध कराएगी.
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लिए यह सत्र न केवल सवालों के जवाब देने का, बल्कि लंबे समय के विधायी और राजनीतिक बिसात बिछाने का भी मौका होने वाला है.
इन्हीं संभावित मुद्दों के बीच यदि कोई विषय पूरे सत्र की दिशा तय करने की क्षमता रखता है, तो वह है परिसीमन (Delimitation).
शायद इस मानसून सत्र में, संसद केवल बहस का मंच नहीं रहेगा. मानो ना मानो, ये मौजूदा राजनीति के सबसे रोचक शतरंज के खेल में बदलने वाला है... जहां भाषणों की तुलना में रणनीति, कूटनीति, संतुलन और 'फ्लोर मैनेजमेंट' खूब देखने को मिलेगा. जहां हर वोट, हर अनुपस्थिति, हर नया समूह और हर बाहरी समर्थन अपने भीतर एक बड़ा राजनीतिक संदेश छिपाए होगा.
परिसीमन आखिर है क्या?
परिसीमन का अर्थ केवल संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं बदलना नहीं है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि जनसंख्या के अनुपात में प्रत्येक सांसद लगभग समान संख्या के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करे.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 170 संसद और विधानसभाओं के लिए परिसीमन का संवैधानिक आधार प्रदान करते हैं. सामान्यतः प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन किया जाना चाहिए.
हालांकि, 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा सीटों के पुनर्वितरण पर रोक लगा दी गई थी, ताकि परिवार नियोजन अपनाने वाले राज्यों को तत्काल राजनीतिक नुकसान न हो. बाद में 84वें संविधान संशोधन (2001) ने यह व्यवस्था आगे बढ़ाई और लोकसभा सीटों के राज्यों के बीच पुनर्वितरण को पहली जनगणना के बाद तक स्थगित रखा, जो 2026 के बाद होगी.
यानी आने वाले वर्षों में परिसीमन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत की संघीय राजनीति का सबसे बड़ा संवैधानिक अभ्यास बनने जा रहा है.
मतदान से अधिक चर्चा में रह सकती है 'अनुपस्थिति'
भारतीय संसदीय राजनीति में कई बार मतदान जितना महत्वपूर्ण होता है, उतना ही महत्वपूर्ण होता है मतदान के समय सदन में उपस्थित या अनुपस्थित रहना.
हर राजनीतिक दल अपनी रणनीति तैयार करेगा.
- कौन मतदान करेगा?
- कौन मतदान से अनुपस्थित रहेगा?
- कौन संशोधन प्रस्ताव लाएगा?
- कौन बाहर से समर्थन देगा?
- कौन आखिरी समय तक अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करेगा?
इन सभी कदमों का राजनीतिक महत्व बराबर होगा.
संसदीय राजनीति में कई बार संख्या जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतनी ही महत्वपूर्ण होती है समय पर बनाई गई राजनीतिक सहमति. यदि परिसीमन पर व्यापक बहस होती है, तो मतदान की प्रक्रिया स्वयं राजनीतिक विश्लेषण का विषय बन सकती है. इसलिए यह सत्र संसदीय रणनीति का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन सकता है.
उत्तर-दक्षिण पर फिर बवाल होगा…
डिलिमिटेशन पर चर्चा के साथ, उत्तर और दक्षिण भारत के रिप्रेजेंटेशन का मुद्दा एक बार फिर नेशनल चर्चा का हिस्सा बन सकता है.
दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने शिक्षा, हेल्थकेयर और जनसंख्या कंट्रोल को बढ़िया मैनेज किया है. इसलिए, रिप्रेजेंटेशन के सवाल को सिर्फ जनसंख्या वृद्धि के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए.
दूसरी ओर, ज्यादा आबादी वाले राज्यों का डेमोक्रेटिक नजरिया है कि पार्लियामेंट्री रिप्रेजेंटेशन जनसंख्या के साइज के हिसाब से होना चाहिए.
इन दोनों नजरियों के बीच बैलेंस बनाना किसी भी सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक और संवैधानिक चुनौती होगी.
मोदी-शाह: संख्या से आगे, सहमति की राजनीति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीतिक कार्यशैली का एक महत्वपूर्ण पक्ष दीर्घकालिक तैयारी रही है.
पिछले वर्षों में अनेक महत्वपूर्ण विधेयकों के दौरान सरकार ने सहयोगी दलों के साथ संवाद, संसदीय प्रबंधन और चरणबद्ध राजनीतिक तैयारी का प्रदर्शन किया है.
यदि परिसीमन जैसा संवेदनशील विषय आगे बढ़ता है, तो सरकार केवल अपने बहुमत पर निर्भर नहीं रहेगी. राज्यों की चिंताओं को सुनना, सहयोगी दलों से निरंतर संवाद बनाए रखना और व्यापक राजनीतिक सहमति तैयार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा.
बड़े संवैधानिक विषयों की स्थिरता केवल संख्यात्मक बहुमत से नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यता से भी आती है. प्रभात खबर UPSC पर खास कवरेज कर रहा है, ताकि आपको एक्सपर्ट गाइडेंस के लिए कहीं और न जाना पड़े. UPSC परीक्षाओं से जुड़ी सभी ताजा जानकारी के लिए हमारे साथ जुड़े रहें.

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क्षेत्रीय दलों की अग्निपरीक्षा
यदि परिसीमन का मुद्दा संसद में निर्णायक रूप से आगे बढ़ता है, तो इसकी सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा भाजपा या कांग्रेस की नहीं, बल्कि भारत के क्षेत्रीय दलों की होगी.
पिछले एक दशक में राष्ट्रीय राजनीति का एक दिलचस्प सच यह रहा है कि दिल्ली में बनने वाले बड़े गठबंधनों और राज्यों की वास्तविक राजनीति के बीच अक्सर बड़ा अंतर दिखाई देता है. संसद में साथ खड़े दिखने वाले दल कई बार अपने-अपने राज्यों में अलग राजनीतिक गणित के आधार पर फैसले लेते हैं. परिसीमन का प्रश्न इसी अंतर्विरोध को सबसे स्पष्ट रूप से सामने ला सकता है.
सबसे अधिक निगाहें तमिलनाडु की राजनीति पर रहेंगी. DMK लंबे समय से दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व, भाषाई पहचान और संघीय अधिकारों की मुखर आवाज रही है. INDIA गठबंधन का एक प्रमुख स्तंभ होने के कारण उससे यह अपेक्षा भी की जाएगी कि वह परिसीमन पर राष्ट्रीय विपक्षी दृष्टिकोण के साथ खड़ी दिखाई दे.
लेकिन उसके सामने चुनौती केवल भाजपा का विरोध करने की नहीं होगी, बल्कि तमिलनाडु की जनता को यह विश्वास दिलाने की भी होगी कि राज्य के राजनीतिक और प्रतिनिधित्व संबंधी हित सर्वोच्च प्राथमिकता पर हैं.
दिलचस्प बात यह है कि, अभिनेता विजय की पार्टी TVK के उभार ने भविष्य की राजनीति को और जटिल बना दिया है. ऐसे में परिसीमन पर DMK का प्रत्येक कदम केवल संसद में दिया गया वोट नहीं होगा, बल्कि 2029 और उससे आगे की तमिलनाडु राजनीति का संकेत भी माना जाएगा.
झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थिति भी कम दिलचस्प नहीं होगी. हाल के वर्षों में कई अवसरों पर यह देखा गया है कि राष्ट्रीय गठबंधनों का हिस्सा होने के बावजूद क्षेत्रीय दल अपने राज्य-विशेष हितों के आधार पर अलग राजनीतिक निर्णय लेते रहे हैं.
राज्यसभा चुनाव में परिमल नथवानी को मिले समर्थन को भी कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इसी दृष्टि से देखा था. जहां राष्ट्रीय राजनीति से अधिक महत्व स्थानीय राजनीतिक और विकासात्मक समीकरणों को दिया गया.
परिसीमन जैसे बड़े मुद्दे पर JMM को भी यह संतुलन साधना पड़ सकता है कि वह राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति, आदिवासी प्रतिनिधित्व और झारखंड के क्षेत्रीय हितों के बीच किस प्रकार अपना रास्ता तय करता है.
पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) के सामने भी एक अलग चुनौती होगी. दिल्ली और पंजाब की राजनीति में पार्टी स्वयं को राष्ट्रीय विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है, लेकिन परिसीमन जैसे विषय पर उसे क्षेत्रीय संवेदनशीलताओं और राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं दोनों को साथ लेकर चलना होगा. यही कारण है कि AAP का रुख केवल संसदीय रणनीति नहीं, बल्कि उसके राष्ट्रीय विस्तार की दिशा का भी संकेत माना जाएगा.
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) जैसे दलों के सामने भी समान चुनौती होगी. वे भाजपा-विरोधी राजनीति के महत्वपूर्ण चेहरे हैं, लेकिन परिसीमन का मुद्दा केवल भाजपा-विरोध तक सीमित नहीं है. यह प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय शक्ति और भविष्य की चुनावी संरचना का प्रश्न भी है. इसलिए उनके लिए भी निर्णय केवल गठबंधन धर्म के आधार पर लेना आसान नहीं होगा.

वास्तव में परिसीमन की बहस उन सभी दलों की परीक्षा लेगी जो एक ओर राष्ट्रीय गठबंधनों का हिस्सा हैं और दूसरी ओर अपनी राजनीतिक पहचान क्षेत्रीय अस्मिता, स्थानीय हितों और राज्य-विशेष मुद्दों पर आधारित रखते हैं.
यही कारण है कि इस बार संसद में केवल यह नहीं देखा जाएगा कि कौन सरकार के साथ है और कौन विपक्ष के साथ. अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि कौन-सा दल अपने घोषित सिद्धांतों, अपने राज्य के हितों और अपने राष्ट्रीय राजनीतिक संबंधों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करता है.
INDIA block के सामने सबसे बड़ी चुनौती
परिसीमन INDIA block के लिए भी आसान विषय नहीं होगा.
राष्ट्रीय दल इसे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न के रूप में देख सकते हैं.
दक्षिण भारत के दल इसे संघीय संतुलन के संदर्भ में उठाएंगे।
कुछ दल सामाजिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण की नई संरचनाओं पर चर्चा करेंगे.
कुछ दल निर्वाचन क्षेत्रों की नई सीमाओं के राजनीतिक प्रभाव पर प्रश्न उठाएंगे.
यानी विपक्ष के सामने चुनौती केवल सरकार का विरोध करना नहीं होगी, बल्कि विभिन्न क्षेत्रीय हितों को एक साझा राजनीतिक दृष्टिकोण में बदलना भी होगी.
यही इस बहस को और अधिक रोचक बनाता है.
2030 के दशक की राजनीति की पटकथा यहीं से लिखी जा सकती है...
यदि मानसून सत्र में परिसीमन पर गंभीर विधायी पहल होती है, तो उसका प्रभाव केवल वर्तमान संसद तक सीमित नहीं रहेगा. यह 2030 के दशक की भारतीय राजनीति की दिशा तय करने वाली प्रक्रिया बन सकती है.
आने वाले वर्षों में कौन-से राज्य राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में होंगे, किन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, क्षेत्रीय दलों की भूमिका कैसी होगी, राष्ट्रीय दल अपनी चुनावी रणनीति किस प्रकार पुनर्गठित करेंगे और नए सामाजिक-राजनीतिक समीकरण कैसे बनेंगे… इन सभी प्रश्नों की नींव इसी प्रक्रिया में दिखाई दे सकती है.
इसीलिए परिसीमन को केवल एक संवैधानिक अभ्यास या संसदीय विधेयक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह उस राजनीतिक मानचित्र की रूपरेखा है, जिस पर 2030 के दशक की चुनावी लड़ाइयां लड़ी जाएँगी और भारत के अगले दौर का सत्ता-संतुलन तय होगा.
संभव है कि आने वाले वर्षों में इतिहासकार इस मानसून सत्र को केवल एक संसदीय सत्र के रूप में नहीं, बल्कि उस मोड़ के रूप में याद करें, जहां से भारतीय लोकतंत्र के अगले राजनीतिक अध्याय की शुरुआत हुई.
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लेखक के बारे में
By अचल प्रियदर्शी
अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.
उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.
उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.
साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.
ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;
Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)
बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)
International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)
ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)
झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)
जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)
Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)
उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)
बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)
International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
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