बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी के वरिष्ठ नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर देश के नए राष्ट्रपति चुने गए हैं. 20 अगस्त को संसद में हुए मतदान में उन्हें 255 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी ओली अहमद को 88 वोट मिले. यह 35 साल में पहली बार था जब बांग्लादेश में राष्ट्रपति पद के लिए मुकाबला हुआ.पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने 24 जुलाई को इस्तीफा दिया था, जिसके बाद यह चुनाव कराए गए.आलमगीर का राष्ट्रपति बनना भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह लंबे समय से बीएनपी के प्रमुख चेहरों में रहे हैं और भारत को लेकर उनके बयान कभी सख्त तो कभी सहयोग की जरूरत पर जोर देने वाले रहे हैं. ऐसे में सवाल है कि उनके राष्ट्रपति बनने के बाद नई दिल्ली और ढाका के रिश्ते किस दिशा में जाएंगे?आलमगीर के आने से भारत-बांग्लादेश संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?आलमगीर को भारत विरोधी नेता के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी. उन्होंने एक तरफ भारत से बांग्लादेश की संप्रभुता और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान करने को कहा है, तो दूसरी तरफ भारत के साथ अच्छे संबंधों की जरूरत को भी स्वीकार किया है. 2022 में उन्होंने साफ कहा था कि पड़ोसी भारत के साथ अच्छे संबंध बांग्लादेश के लिए महत्वपूर्ण हैं, हालांकि उन्होंने रिश्तों को देखने के तरीके पर सवाल उठाया था.यानी आलमगीर का संदेश यह रहा है कि बांग्लादेश भारत के साथ संबंध चाहता है, लेकिन बराबरी और राष्ट्रीय हित के आधार पर. भारत के लिए यह उनकी विदेश नीति का सबसे अहम संकेत माना जा सकता है.अगरतला कांड के बाद भारत पर क्या बोले थे आलमगीर?मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर का भारत को लेकर रुख केवल सामान्य कूटनीतिक असहमति तक सीमित नहीं रहा है. दिसंबर 2024 में अगरतला स्थित बांग्लादेशी सहायक उच्चायोग पर हुए हमले के बाद उन्होंने भारत के प्रति काफी तीखी प्रतिक्रिया दी थी.आलमगीर ने इस घटना को पूर्व-नियोजित बताया था. उन्होंने भारत सरकार और वहां के लोगों से अपील की थी कि बांग्लादेश-विरोधी भावनाओं को घरेलू राजनीति के औजार के तौर पर इस्तेमाल करने से दोनों देशों के रिश्तों में लंबे समय का तनाव पैदा हो सकता है.लंदन में आयोजित एक रैली में आलमगीर ने भारत के रवैये पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि यह कैसी दोस्ती है? यह कैसा पड़ोसी जैसा व्यवहार है? साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि भारत को बांग्लादेश की संप्रभुता और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान करना चाहिए.हालांकि, आलमगीर का रुख पूरी तरह भारत के साथ टकराने वाला भी नहीं रहा है. उसी दौर में उन्होंने भारत को बांग्लादेश का महत्वपूर्ण पड़ोसी और दोस्त बताया था और 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत की भूमिका को स्वीकार किया था.ये भी पढ़ें: फरक्का जल संधि को लेकर क्या है बिहार का रुख? जानिए संजय झा क्यों नहीं चाहते यह समझौता आगे बढ़े!हिंदू अल्पसंख्यकों पर उनका बयान भी चर्चा में रहाबांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा भारत के लिए लंबे समय से संवेदनशील रहा है. इस विषय पर आलमगीर के पुराने बयानों ने भी सवाल खड़े किए हैं.अगस्त 2024 में पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों की रिपोर्टों को तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक बताया था. उनका कहना था कि कुछ घटनाएं हुई हो सकती हैं, लेकिन उन्हें सांप्रदायिक हिंसा के बजाय राजनीतिक घटनाओं के रूप में देखा जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा था कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा बांग्लादेश का आंतरिक मामला है.उनके इस बयान की आलोचना भी हुई थी. उस समय बांग्लादेश में हिंदू समुदाय और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों की कई रिपोर्ट सामने आई थीं. हालांकि, बाद में आलमगीर ने सार्वजनिक तौर पर हिंदुओं की सुरक्षा और सभी नागरिकों के समान अधिकार की बात भी कही.जनवरी 2026 में उन्होंने कहा कि हिंदुओं को डर में रहने की जरूरत नहीं है और BNP की सरकार सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी.भारत के नजरिए से यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का सवाल दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत में लगातार उठता रहा है. ऐसे में आलमगीर के राष्ट्रपति बनने के बाद नई दिल्ली उनके बयानों और अल्पसंख्यक सुरक्षा को लेकर नई सरकार के वास्तविक कदमों पर भी नजर रखेगी.शेख हसीना के मुद्दे ने रिश्तों में बढ़ाई दूरी !मौजूदा दौर में भारत-बांग्लादेश संबंधों की सबसे बड़ी चुनौती, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का मुद्दा है. 2024 में सरकार गिरने के बाद हसीना भारत आ गई थीं. इसके बाद ढाका की नई राजनीतिक व्यवस्था ने भारत से उन्हें वापस भेजने की मांग की. यही मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों में तनाव का बड़ा कारण बना हुआ है.आलमगीर लंबे समय तक हसीना सरकार के प्रमुख विपक्षी नेताओं में रहे. इसलिए उनके राजनीतिक रुख को भारत में भी ध्यान से देखा जाता है, क्योंकि हसीना सरकार के दौरान नई दिल्ली और ढाका के संबंध काफी करीबी माने जाते थे.अब बीएनपी की सरकार आने के बाद भारत को पुराने समीकरणों के बजाय नए राजनीतिक नेतृत्व के साथ संबंध बनाने हैं. हालांकि, BNP के व्यापक रुख में भारत के साथ व्यापार, जल, सीमा और सुरक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है.आलमगीर के राष्ट्रपति बनने से भारत-बांग्लादेश विदेश नीति में दिखेगा बदलाव बांग्लादेश का राष्ट्रपति संवैधानिक रूप से देश का राष्ट्राध्यक्ष होता है, लेकिन रोजमर्रा की कार्यकारी सत्ता प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के पास होती है. इसलिए आलमगीर के राष्ट्रपति बनने से भारत-बांग्लादेश विदेश नीति में सीधे और बड़े बदलाव की उम्मीद करना सही नहीं होगा.इसलिए आलमगीर के राष्ट्रपति बनने को भारत-बांग्लादेश नीति में तत्काल यू-टर्न के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी.असली बदलाव इस बात से तय होगा कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार भारत के साथ पानी, सीमा, व्यापार, हसीना के प्रत्यर्पण और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर क्या रुख अपनाती है.ये भी पढ़ें: एथेनॉल के कारण महंगी हुई मिठास या कोई और है वजह ? समझिए अचानक क्यों बढ़ गए चीनी के दामभारत के सामने अब क्या हैं चुनौतियां?कुल मिलाकर, आलमगीर का हालिया रुख भी संतुलन की ओर इशारा करता है. उन्होंने भारत के साथ अच्छे संबंधों की जरूरत तो जताई है, लेकिन सीमा पर गोलीबारी, नदी जल बंटवारे और बांग्लादेश के राष्ट्रीय हित जैसे मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाया है. ऐसे में उनके नेतृत्व में भारत के साथ रिश्ते खत्म होने के बजाय अधिक मुद्दा-केंद्रित और बांग्लादेश के हितों पर जोर देने वाले हो सकते हैं.हालांकि, भारत के सामने सीमा सुरक्षा, व्यापार, नदी जल बंटवारा, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई अहम मुद्दे हैं. इसके अलावा चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए बांग्लादेश के साथ स्थिर और भरोसेमंद संबंध भारत के रणनीतिक हित में हैं.पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर