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स्वदेशी और स्वावलंबन को मिले बढ़ावा

By डॉ अश्विनी महाजन
Updated Date
PTI

डॉ अश्वनी महाजन, एसोसिएट प्रोफेसर, डीयू

ashwanimahajan@rediffmail.com

कोरोना वायरस के कारण लागू किये गये लॉकडाउन में नौकरियों और व्यवसायों से वंचित बड़े शहरों से प्रवासी मजदूर वापस गांव लौटने को मजबूर हुए. किसी प्रकार के वाहन की व्यवस्था न होने के कारण वे पैदल ही अपने गांव की ओर बढ़ने लगे, तो सरकारें हरकत में आयीं और उनके लिए वाहनों की व्यवस्था भी हुई. लेकिन उसके बावजूद उनकी व्यथा की कहानियां विचलित करनेवाली हैं. गांव से वे सभी शहरों में नौकरी या बेहतर जीवन की आस में निकले थे, लेकिन जिस हालत में वे शहरों से वापस गये, वह उनके जीवन की कहानी को स्वयं ही बखान कर रही है.

लॉकडाउन में केंद्र और राज्य सरकारों का स्वभाविक दायित्व था कि लोगों के भोजन की व्यवस्था करें और ऐसी स्थिति से भी निपटे. सरकारों ने ही नहीं, बल्कि सामाजिक संगठनों ने भी भारी मात्रा में राहत उपलब्ध करायी है और गरीबों की मुश्किलों को कम करने का काम किया है. लेकिन दुर्भाग्य से हमारे राजनीतिक दल मदद के बजाये राजनीति करते दिख रहे हैं.

मजदूरों की हालत के समाधान के लिए यह जानना जरूरी है कि इसके पीछे क्या कारण हैं? साल 1991 से शुरू हुए आर्थिक सुधारों के नीति निर्माताओं ने कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र पर आधारित कोटा-लाइसेंस राज, घरेलू उद्योगों और खासतौर पर लघु उद्योगों के संरक्षण की नीति आदि असफल हो गये हैं, और अब हमें उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण (एलपीजी) की नीति पर चलना होगा. लघु उद्योगों एवं घरेलू उद्योगों का संरक्षण समाप्त कर दिया गया.

बड़े कॉर्पोरेट और विदेशी कंपनियों को तरजीह दी जाने लगी. कुशलतापूर्वक चल रही कंपनियों का भी अधिग्रहण विदेशियों ने कर लिया. छोटे-छोटे स्टार्टअप भी विदेशी निवेशकों के चंगुल में फंसने लगे. कई कंपनियों का तो प्रबंधन भी पूरी तरह से विदेशी हाथों में चला गया. आर्थिक सुधार और विदेशी पूंजी का प्रभुत्व बढाया जाना पर्यायवाची बन चुके थे. देश के उद्योगों का संरक्षण जैसे अपराध की श्रेणी में आ गया था. जीडीपी ग्रोथ ही विकास का प्रतिमान बन गया. इससे हमारी मैन्युफैक्चरिंग को भारी नुकसान हुआ.

बिजली के उपकरणों, कैमिकल, दवाओं के कच्चे माल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक, टेलीकॉम उत्पाद सब चीन और दूसरे देशों से आने लगे. आज करोड़ों मजदूर जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से भी अभी तक वंचित हैं. उनकी हालत का अंदाजा इस बात से लग रहा है कि वे कुछ ही दिनों के लॉकडाउन से उत्पन्न स्थिति का भी सामना नहीं कर पाये और वापस लौटने के लिए बाध्य हो गये.

प्रश्न यह है कि उच्च ग्रोथ का दंभ भरने वाली आर्थिक नीतियां गरीब मजदूर को आर्थिक रूप से सशक्त क्यों नहीं बना पायीं. वास्तव में यह एलपीजी की नीति गरीब किसान के भले के लिए थी ही नहीं. कुछ आंकड़े इस नीति की पोल खोल देते हैं. विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी भारतीय आर्थिक ग्रोथ के बारे में लिखते हैं कि 1980 और 2014 के बीच जितनी भी ग्रोथ हुई, उसका 66 प्रतिशत हिस्सा ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों तक ही पहुंचा और उसमें से आधा यानी 33 प्रतिशत हिस्सा तो ऊपर के मात्र एक प्रतिशत लोगों द्वारा ही हस्तगत कर लिया गया.

साल 1991 में कुल फैक्ट्री ‘वैल्यू एडिशन’ यानी उत्पादन में श्रम का हिस्सा 78 प्रतिशत होता था, वह घटकर अब मात्र 45 प्रतिशत रह गया है, जबकि लाभ का हिस्सा 19 प्रतिशत से बढ़कर 52 प्रतिशत हो गया है. साल 1991 से अब तक मौद्रिक मजदूरी तो सात गुना बढ़ी है, लेकिन कीमतें भी 6.5 गुना बढ़ गयी हैं यानी वास्तविक मजदूरी में अत्यंत मामूली वृद्धि हुई है. वास्तविक जीडीपी कम-से-कम 10 गुना बढ़ गयी है, पर मजदूरों की हालत बदतर होती गयी. गांव और शहर में भी खाई पहले से ज्यादा गहरी हो गयी. आज स्थिति यह है कि गांव में प्रति व्यक्ति आय मात्र 23 हजार रुपये प्रति वर्ष है, जबकि शहरों में यह लगभग 2.90 लाख है यानी गांव से 12.3 गुना ज्यादा.

विडंबना यह है कि मजदूर किसान की इस बदहाली के लिए जिम्मेदार राजनीतिक दल इनके सबसे बड़े हिमायती बने दिखाई दे रहे हैं. मजदूरों की यह बदहाली दो माह के लॉकडाउन से स्पष्ट दिखाई देने लगी है. आज जरूरत इस बात की है कि कॉर्पोरेट, एफडीआइ और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर आधारित विकास मॉडल को बदल कर एक ऐसा मॉडल बने, जिसमें उत्पादन के साथ रोजगार, आमदनी और संपत्ति के वितरण का भी ध्यान रहे, जिसमें मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं के साथ विकेंद्रित विकास हो.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘लोकल’ यानी स्थानीय स्तर पर उत्पादन को बढ़ावा देने की बात कही है. यह मार्ग दुनिया पर निर्भरता को कम करेगा ही, लघु-कुटीर उद्योगों और कारीगरों के विकास के साथ रोजगार और गरीबों के लिए अधिक आय के अवसर भी प्रदान करेगा. स्वदेशी और स्वावलंबन पर आधारित विकास का यह मॉडल सबके लिए कुशल क्षेम बढ़ाने वाला होगा. इससे ग्रामीण उद्योगों और अन्य आर्थिक गतिविधियों के साथ गांव भी खुशहाल होंगे. फिर अपने घरों को लौटे प्रवासी देशवासी शहरों में वापस जाने के लिए बाध्य भी नहीं होंगे.

(यह लेखक के निजी विचार है)

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