नयी दिल्ली के भारत मंडपम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर द्विपक्षीय मुलाकात को व्यक्तिगत कूटनीति की शानदार मिसाल में बदल दिया. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के उद्घाटन दिवस पर रूस के राष्ट्रपति पुतिन प्रधानमंत्री मोदी के सामने खड़े थे, तभी मोदी ने उनके हाथों में 'तिरुक्कुरल' का रूसी अनुवाद सौंपा. नैतिकता, सदाचार, शासन, प्रेम और जीवन के उचित आचरण पर आधारित तमिल भाषा के वे 1,330 दोहे हाशिये की टिप्पणी की तरह नहीं थे. यह पिछले 12 वर्षों से चल रही आलिंगन और उपहारों की लंबी कूटनीतिक परंपरा में एक और शानदार क्षण था. किताबों ने शायद ही कभी संधियों की दिशा बदली हो. समझौतों की बारीक शर्तें कविताएं नहीं, बल्कि हित तय करते हैं. फिर भी मोदी ने यह दिखाया है कि भारतीय गांवों की कार्यशालाओं में बनी वस्तुएं और भारतीय भाषाओं में छपी पुस्तकें भी विद्वता को 'विदेशी राजमहलों' तक पहुंचा सकती हैं. दशकों पहले इंदिरा गांधी ने भी विदेशों में हस्तशिल्प भेजे थे, पर तब यह काम पर्दे के पीछे होता था. मोदी ने इस परंपरा को सार्वजनिक और व्यक्तिगत बना दिया है. वह हर उपहार सौंपने के क्षण को इस तरह पेश करते हैं कि उसकी तस्वीर यात्रा की स्मृति का स्थायी हिस्सा बन जाए. उपहार के रूप में चुनी गयी पुस्तकों के पीछे की सोच स्पष्ट दिखाई देती है. दिसंबर, 2024 में मॉस्को में मोदी ने पुतिन को 'भगवद्गीता' का रूसी अनुवाद भेंट किया था, जिसके माध्यम से सेंट पीटर्सबर्ग की संस्कृत चिंतन में पुरानी रुचि को सामने रखा गया. वर्ष 2019 में बिश्केक में उन्होंने किर्गिस्तान के राष्ट्रपति को दिवंगत अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय द्वारा अंग्रेजी में अनूदित 10 खंडों वाली 'महाभारत' भेंट की थी. यह राज्यकला के एक महाकाव्य को किर्गिस्तान की अपनी ‘मानस’ महागाथा के साथ जोड़ने जैसा था. वर्ष 2023 में वॉशिंगटन यात्रा में मोदी ने राष्ट्रपति जो बाइडन को ‘द टेन प्रिंसिपल उपनिषद्स’ का प्रथम संस्करण दिया था, जिसका अनुवाद पुरोहित स्वामी और डब्ल्यूबी यीट्स ने किया था. एलन मस्क के परिवार को मोदी ने पुस्तकों का सेट भेंट किया, जिसमें रवींद्रनाथ टैगोर की ‘क्रेसेंट मून’, आरके नारायण की भारतीय जीवन पर आधारित कहानियां और चित्रों वाली 'पंचतंत्र' की पुस्तक शामिल थी. स्लोवाक संसद के सदस्यों को 'चरक संहिता' और 'सुश्रुत संहिता' भेंट की गयी, जो शरीर और चिकित्सा से संबंधित प्राचीन ग्रंथ हैं. कजाखस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति को भारत की विविध धार्मिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करने वाला एक संग्रह दिया गया, जिसमें 'गुरु ग्रंथ साहिब', जैन और बौद्ध पांडुलिपियां तथा फारसी भाषा में 'रामायण' शामिल थी. हस्तशिल्प के उपहार भी इसी क्रम और विशेषता का अनुसरण करते रहे.वर्ष 2022 में बाली में हुए जी-20 सम्मेलन के दौरान बाइडन को शृंगार शैली की कांगड़ा लघु चित्रकला भेंट की गयी. ब्रिटेन के ऋषि सुनक को गुजरात के वाघरी समुदाय द्वारा बनाये गये पवित्र चित्रित वस्त्र ‘माता नी पछेड़ी’ दी गयी. ऑस्ट्रेलिया के एंथनी अल्बनीज को राठवा कारीगरों की बनायी पिथोरा अनुष्ठानिक चित्रकला भेंट की गयी, जबकि इटली की जॉर्जिया मेलोनी को सादेली मोजेक वाले बक्से में डबल-इकत पाटन पटोला रेशम दिया गया. वर्ष 2022 के जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने बाइडन को वाराणसी की चांदी पर गुलाबी मीनाकारी से बने ब्रोच और कफलिंक दिये. जर्मनी के ओलाफ शोल्ज को मुरादाबाद का निकल-लेपित मारोड़ी पीतल का पात्र दिया गया और फ्रांस के इमैनुएल मैक्रों को लखनऊ की जरदोजी कढ़ाई में लिपटी तथा फ्रांसीसी तिरंगे के रंगों वाले धागों से सिली इत्र की शीशियां भेंट की गयीं. वर्ष 2023 की अमेरिकी राजकीय यात्रा के दौरान बाइडन को जयपुर की चंदन की एक संदूकची दी गयी, जिसमें चांदी की गणेश प्रतिमा और पंजाब, झारखंड तथा उत्तराखंड की पारंपरिक वस्तुएं थीं. वहीं, प्रथम महिला जिल बाइडन को कश्मीरी पेपर-माशे में जड़ा प्रयोगशाला में तैयार किया गया हरा हीरा भेंट किया गया था. प्रधानमंत्री मोदी विचारों को गढ़ने वाले व्यक्ति हैं, इसलिए उन्होंने क्षेत्रीय विविधता को भी उपहारों में शामिल किया. मेलोनी को असम का सुनहरा मूगा रेशम दिया गया. नीदरलैंड के अधिकारियों को जयपुर की नीली मिट्टी की कलाकृतियां भेंट की गयीं. नॉर्वे के प्रतिनिधियों को ओडिशा की चांदी की फिलिग्री वाली नावें दी गयीं. आइसलैंड के प्रधानमंत्री को 1953 में तेनजिंग नोर्गे द्वारा एवरेस्ट अभियान में इस्तेमाल की गयी बर्फ काटने वाली कुल्हाड़ी की प्रतिकृति भेंट की गयी. संयुक्त अरब अमीरात को केसर आम और मणिपुर का काला चाक-हाओ चावल दिया गया. कनाडा के मार्क कार्नी को पीतल से बनी बोधि वृक्ष की प्रतिकृति और मेक्सिको के राष्ट्रपति को महाराष्ट्र की वारली जनजातीय चित्रकला भेंट की गयी. अन्य देशों के नेता भी विदेशी राजनयिकों और राष्ट्राध्यक्षों को उपहार देते हैं, पर मोदी के तरीके और उनकी कूटनीतिक परंपरा के बीच अंतर है. अमेरिकी राष्ट्रपति आमतौर पर अपने देश की पहचान से जुड़ी वस्तुएं भेंट करते हैं, जैसे काउबॉय जूते, लिंकन की चमड़े की जिल्द वाली जीवनी. ये उपहार सरल, बड़े पैमाने पर बनाये जा सकने वाले और एक जैसे होते हैं. ब्रिटिश राजकीय प्रोटोकॉल भी सादगी को प्राथमिकता देता है. वहां संप्रभु शासक की ओर से दिया जाने वाला उपहार आमतौर पर चांदी के फ्रेम में लगी हस्ताक्षरित तस्वीर होती है. चीनी राजकीय यात्राओं में इसके बजाय एक जैसे जोड़े और चीनी मिट्टी के बर्तन पसंद किये जाते हैं. खाड़ी देशों के शासक भव्यता को प्राथमिकता देते हैं. जहां अन्य देशों की कूटनीति में उपहार को एक गौण औपचारिकता माना जाता है, वहीं मोदी उसे बयान और संदेश, दोनों के रूप में देखते हैं. इन उपहारों में इतनी विशिष्टता होती है कि वे जिज्ञासा और बहस को जन्म दे दें. मोदी के उपहार उनके अतिथियों की अपनी जीवन कथा के इर्द-गिर्द तैयार किये जाते हैं. जहां दूसरी परंपराएं उपहारों के आदान-प्रदान को अभिलेखीय टिप्पणियों तक सीमित कर देती हैं, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे बड़े पैमाने पर सार्वजनिक दृश्यता देते हैं, जिससे उस वस्तु का आगे का जीवन संग्रहालयी रिकॉर्ड तक सीमित न रहकर सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनता है. उन्होंने कूटनीति की एक नयी शैली विकसित की है. इसमें उपहार औपचारिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि वही संदेश है. पहले के नेता सांस्कृतिक उपहारों को सजावटी तत्व की तरह देखते थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें रणनीति के रूप में इस्तेमाल करते हैं. वह हस्तशिल्प और प्राचीन ग्रंथों के माध्यम से भारत की एक विशेष तस्वीर दुनिया के सामने रखते हैं. 'तिरुक्कुरल' या 'महाभारत' अपने साथ एक शांत राजनीतिक संदेश भी लेकर चलते हैं. यह संदेश सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में निहित है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)