हाल ही में हरियाणा से एक पिता की दर्द भरी कहानी सामने आयी. उन्होंने अपनी बेटियों को पढ़ाया-लिखाया और उनका सहारा बने रहे, लेकिन उनकी मौत के बाद उनकी कोई बेटी अंतिम संस्कार में नहीं पहुंची. नेपाल, उत्तर प्रदेश और मुंबई में रह रहीं तीनों बेटियों ने वीडियो कॉल के जरिये पिता को अंतिम विदाई दी. अंतिम संस्कार की रस्म वीडियो में देखते हुए मुंबई में रहने वाली बेटी बार-बार पूछती भी रही कि कितनी देर और लगेगी. अस्थियां चुनने आने के लिए बेटियों ने मना कर दिया और तेरहवीं के कार्यक्रम से भी उन्होंने दूरी बनायी. यह कहानी ज्यादा दर्दनाक इसलिए भी है, क्योंकि पिछले कुछ साल से वह व्यक्ति वृद्धाश्रम में अकेले रह रहे थे. बीमार होने से पहले वह अपनी बेटियों से अक्सर बात करते थे, पर जब उनकी तबीयत ज्यादा खराब होने लगी, तो बेटियों के फोन आने कम हो गये. उनकी बिगड़ती हालत की जानकारी बेटियों को दे दी गयी थी, पर वे उनसे मिलने नहीं आयी थीं. ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश में झांसी का है. वहां एक व्यक्ति की मौत के 39 घंटे बाद अंतिम संस्कार हो सका. अंतिम संस्कार में यह देरी किसी परिजन के इंतजार में नहीं हुई, बल्कि मृतक के बेटे-बेटियों के बीच संपत्ति विवाद के कारण हुई. एक ओर शव सामने पड़ा रहा, दूसरी तरफ जमीन के विवाद को लेकर परिवार की पंचायत चलती रही. जब भाई-बहनों के बीच जमीन का मसला सुलझ गया, तब मृतक का अंतिम संस्कार किया जा सका.खत्म होती जा रही मानवीय संवेदनाओं से संबंधित एक और घटना दिल्ली के कालकाजी में घटी. वहां सत्तर वर्षीय पूर्व नेवी अफसर का शव कूड़े के ढेर के पास मिला. पुलिस व मृतक के रिश्तेदारों ने अमेरिका में रह रहे उनके बेटे व पत्नी को फोन कर इसकी जानकारी दी और अंतिम संस्कार के लिए भारत आने की गुजारिश भी की है, लेकिन सब तब हैरान रह गये, जब बेटे के साथ मृतक की पत्नी का भी जवाब आया कि वे अपने काम में व्यस्त हैं, इसलिए अभी भारत नहीं आ सकते. बेटे ने मेल कर दिल्ली पुलिस से कहा कि उसके चाचा पिता का अंतिम संस्कार कर देंगे. अक्सर विदेश में रहने वाले बच्चों के बारे में ऐसी ही खबरें आती रहती हैं कि उन्होंने माता-पिता के अंतिम संस्कार में आने से मना कर दिया, लेकिन यहां तो देश में रहने वाली संतानें भी पिता के अंतिम संस्कार में संवेदनहीनता का परिचय दे रही हैं.कुछ साल पहले एक बेटा विदेश से मुंबई लौटा, तो उसे अपनी मां का कंकाल घर में मिला. पता चला कि पिछले डेढ़ साल में उसने अपनी मां से कोई संपर्क ही नहीं रखा था. ऐसे ही, गुड़गांव के एक फ्लैट से बहुत बदबू आ रही थी. फ्लैट जबरन खोले जाने पर वहां बुजुर्ग पति-पत्नी के शव मिले, जबकि उनके बच्चे आसपास ही रहते थे. एक और घटना में बेटा मां को वृद्धाश्रम में छोड़ गया. कहकर गया कि दो दिन में वापस आकर ले जायेगा, मगर वहां से निकलते ही उसने अपना फोन बंद कर दिया. कभी वापस नहीं आया. पांच साल बाद मां की मृत्यु हो गयी. एक और बेटा अपने पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ गया और कभी नहीं लौटा. तमिलनाडु में एक पुत्र अपनी मां को व्हीलचेयर पर बिठाकर रेल पटरी के पास लाया और मां को तेज गाड़ी के सामने फेंक दिया. मां की क्षत-विक्षत लाश मिली. हम राजा रघुवंशी और केतन की सनसनीखेज हत्याओं के दौर में हैं, जब रिश्ते मायने ही नहीं रखते. हर दिन रिश्तों की हत्या हो रही है. पति और प्रेमियों द्वारा पत्नियों, प्रेमियों को मार डालने के मामले तो आते ही रहते हैं. अब पतियों और होने वाले पतियों की हत्याओं में उनकी पत्नियों या मंगेतरों की लिप्तता सामने आ रही है. आखिर हमारे संबंधों को हुआ क्या है? आत्मीयता, भावुकता, एक-दूसरे को समझने की ताकत, विपत्ति में मदद करने का जज्बा कहां गया? बूढ़े माता-पिता से लोग बूढ़े घोड़े की तरह ही मुक्ति पाना चाहते हैं. इसीलिए वे उन्हें वृद्धाश्रमों में छोड़कर फिर नहीं लौटते. माता-पिता इनसे अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव तक उम्मीदें लगाये रहते हैं, मगर व्यर्थ. कहते हैं कि लड़कों के मुकाबले लड़कियां अपने माता-पिता को लेकर अधिक संवेदनशील होती हैं, मगर जिन लड़कियों ने अपने पिता के अंतिम समय में भी उनकी खोज-खबर नहीं ली, उनकी संवेदनशीलता कहां गयी. फिर लड़कियां ही तो किसी की बहू बनती हैं. बहुत-सी बहुएं भी सास-ससुर को देश निकाला दिलवाने में खूब भूमिका निभाती हैं. वक्त बदल गया है और इस दौर में 'खाओ, पियो, मौज उड़ाओ' के विचार का बोलबाला है. जिम्मेदारियों से भागने की प्रवृत्ति महिलाओं में भी बढ़ी है और पुरुषों में भी. मीडिया, खासकर सोशल मीडिया ने मनुष्य के लगातार स्वार्थी और व्यक्तिवादी होने की प्रवृत्ति को गति दी है. यही कारण है कि संबंधों में टूट-फूट मची है. ऐसा क्यों हो गया है कि विज्ञापन में तो दिखता है 'हीरा है सदा के लिए', लेकिन कोई संबंध सदा तो क्या, दो-चार साल में ही अपनी भावुकता, गुणवत्ता और महत्व खो देता है! (ये लेखिका के निजी विचार हैं.)