एडमंड बर्क ने निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए याद दिलाया था कि वे अपने मतदाताओं के प्रति केवल अपने पद के लिए नहीं, अपने विवेक और निर्णय के लिए भी उत्तरदायी हैं. आज भारत का लोकतंत्र एक अलग सवाल के सामने खड़ा है : जो लोग जनता की ओर से सत्ता का इस्तेमाल करते हैं, उनके लिए जनता को आखिर कितनी कीमत चुकानी चाहिए? बर्क ने कल्पना नहीं की होगी कि लोकतंत्र एक दिन किसी कॉरपोरेट प्रतिष्ठान जैसी संस्थागत व्यवस्था का रूप ले लेगा, जिसकी बढ़ती हुई वेतन व्यवस्था, भत्ते, वाहन, आवास और विशेषाधिकार होंगे. आज भारत इसी असहज वास्तविकता का सामना कर रहा है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने जब घोषणा की कि राज्य के सभी 234 विधायकों को सरकारी वाहन, ईंधन, रख-रखाव और चालक के खर्च के लिए हर महीने 75,000 रुपये तथा एक सहायक के लिए 25,000 रुपये दिये जायेंगे, तब शायद उनका उद्देश्य विधायकों को अपने मतदाताओं की बेहतर सेवा करने में सक्षम बनाना रहा हो. पूरे पांच वर्ष के कार्यकाल में इस व्यवस्था पर 200 करोड़ से अधिक खर्च होंगे. विजय ने अनजाने में प्रतिनिधि सरकार की कीमत और राजनीतिक पद की बढ़ती लागत के लेन-देन आधारित राजनीति का रूप लेने के सवाल पर बहस फिर शुरू कर दी है. विधायकों को अपनी जिम्मेदारियां निभाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने का तर्क मौजूद है. एक विधायक से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने निर्वाचन क्षेत्र में यात्रा करे, जनसभाओं में शामिल हो, अधिकारियों से मिले, सरकारी योजनाओं का निरीक्षण करे और हजारों व्यक्तिगत शिकायतों का समाधान करे, पर उचित सहायता और राजनीतिक उदारता के बीच एक ऐसी सीमा है, जिसे लोकतांत्रिक सरकारें लगातार पार करती दिखाई दे रही हैं. सार्वजनिक सेवा को सक्षम बनाने के लिए दी गयी सुविधा एक बार मिलने के बाद अधिकार समझी जाने लगती है, जबकि नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे सार्वजनिक खर्च को नियंत्रित रखने, सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने और सरकारी विभागों में मितव्ययिता को स्वीकार करें. यह विरोधाभास अब लगातार बड़ा होता जा रहा है. तमिलनाडु अकेला उदाहरण नहीं है. बिहार में सत्तारूढ़ राजनीतिक व्यवस्था ने विधायकों के लिए सुविधाओं के विस्तार में काफी उदारता दिखाई है. चुनाव से ठीक पहले विधायकों के लिए अतिरिक्त सरकारी आवास को मंजूरी दी गयी और नये आवासीय परिसरों के निर्माण की व्यवस्था की गयी. सरकारें बदलती हैं, दल बदलते हैं और राजनीतिक बयानबाजी भी बदलती रहती है, लेकिन सत्ता हासिल करने के बाद राजनीतिक वर्ग एक समान भाईचारे को फिर खोज लेता है. बेहतर कारें, बेहतर घर, बेहतर वेतन और विधानसभाओं में बैठे लोगों के लिए बेहतर सुविधाएं. दूसरी ओर नागरिकों को लगातार वित्तीय अनुशासन की याद दिलाई जाती है. इसीलिए सवाल को केवल इस आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता कि विधायकों, सांसदों को अधिक वेतन मिलता है या नहीं. विडंबना यह है कि राजनीतिक वर्ग अधिक महंगा हो गया है, जबकि विधानमंडलों में विचार-विमर्श की प्रक्रिया कमजोर हुई है. औसतन राज्य विधानसभाएं वर्ष के केवल एक हिस्से में ही बैठक करती हैं और कई राज्यों में सदन की बैठक के दिनों की संख्या बेहद कम रही है. संसद के सत्र भी लगातार स्थगन, विरोध, बहिर्गमन और राजनीतिक टकराव से प्रभावित होते हैं, जिसके कारण कानूनों, सरकारी खर्च और कार्यपालिका के फैसलों की विस्तृत तथा लगातार समीक्षा के लिए पर्याप्त समय नहीं बचता. लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल बैठकों की संख्या से नहीं मापी जा सकती, लेकिन जब विधायी कार्य के लिए उपलब्ध समय घटता जाए और राजनीतिक विशेषाधिकार बढ़ते जाएं, तो नागरिक को यह पूछने का अधिकार है कि क्या ये दोनों प्रवृत्तियां अनिश्चितकाल तक साथ-साथ चल सकती हैं. अनुमानों के अनुसार, करीब 4,200 विधायकों और संसद के 788 सदस्यों पर सरकारी खजाने से सालाना 2,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होते हैं. उन्हें निर्वाचन क्षेत्रों में सुविधाओं पर खर्च करने के लिए एक से पांच करोड़ रुपये तक की राशि भी दी जाती है. हालांकि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि जनप्रतिनिधियों के इतने बड़े विवेकाधीन खर्च ने हमारे गांवों या छोटे शहरों को रहने के लिए बेहतर स्थान बना दिया है. इसका अर्थ यह भी नहीं कि विधायकों के लिए मितव्ययिता ही समाधान है. कम वेतन पाने वाला राजनेता भ्रष्टाचार, संरक्षणवाद और निजी प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकता है. समाधान विशेषाधिकार और प्रदर्शन के बीच अधिक विश्वसनीय समझौता स्थापित करने में है. यदि विधायकों को वाहन दिये जाते हैं, तो उनके इस्तेमाल की व्यवस्था पारदर्शी और लेखा परीक्षण योग्य होनी चाहिए. यदि उन्हें सहायक दिये जाते हैं, तो उस खर्च का पूरा हिसाब होना चाहिए. यदि निर्वाचन क्षेत्र के लिए धन उनके नियंत्रण में रखा जाता है, तो प्रत्येक परियोजना का पता लगाया जा सके, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए. यदि वेतन और भत्तों में वृद्धि की जाती है, तो इसके साथ सदन में उपस्थिति, समितियों में भागीदारी, विधायी मामलों की जांच और उत्पादक बैठक के दिनों को लेकर समानांतर अपेक्षा भी होनी चाहिए. खतरा यह नहीं है कि आलीशान सुविधाएं पाने वाले निर्वाचित नेता भारत को दिवालिया कर देंगे. असली खतरा यह है कि राजनीतिक विशेषाधिकार धीरे-धीरे सभी दलों और राज्यों में सामान्य बात बन जाए और फिर किसी को यह पूछने की जरूरत ही महसूस न हो कि जरूरत कहां समाप्त होती है और विलासिता कहां से शुरू होती है. तब सार्वजनिक सेवा की भाषा निजी सुख-सुविधा के लिए सुविधाजनक शब्दावली बन सकती है, जबकि करदाता सत्ता की विस्तृत होती संरचना का खर्च उठाता रह सकता है. भारत को लोकतंत्र पर धन खर्च करना ही चाहिए, लेकिन लोकतंत्र का मूल्यांकन अंतत: इस बात से होना चाहिए कि शासन करने वाले उनके हाथों में सौंपे गये धन, संस्थाओं और जनता के विश्वास के साथ कितनी जिम्मेदारी से व्यवहार करते हैं. एक परिपक्व लोकतंत्र को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि वह अपने राजनेताओं का खर्च उठा सकता है या नहीं, बल्कि समय-समय पर यह भी पूछना चाहिए कि जिन राजनेताओं का खर्च वह उठा रहा है, क्या उन्होंने उस भारी कीमत को सही ठहराने लायक प्रदर्शन किया है? भारत का लोकतंत्र अब एक बेहद विरोधाभासी सवाल के सामने खड़ा है- भारत को वेतन पाने वाला लोकतंत्र चाहिए या प्रदर्शन करने वाला लोकतंत्र? (ये लेखक के निजी विचार हैं.)