शिक्षक दिवस के अगले ही दिन दिल्ली के सत्य निकेतन की एक इमारत के जमींदोज होने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने भारत की शहरी जनसंख्या की सुरक्षा, सहूलियतों और सुविधाओं का प्रश्न खड़ा कर दिया है. भारत की पहचान उसकी ग्रामीण और कृषि संस्कृति के लिए रही है. पर आधुनिक आर्थिकी को अपनाने के बाद भारत अपनी इस पहचान को लगातार पीछे छोड़ने की कोशिश में है. देश की बड़ी जनसंख्या कभी रोजगार, कभी शिक्षा, तो कभी स्वास्थ्य कारणों से लगातार शहरों की ओर पलायन कर रही है. पलायन की इस प्रवृत्ति को प्रतिशत के लिहाज से देखें, तो भले वह बड़ी न लगे, पर विशाल जनसंख्या वाले देश के लिहाज से असल में यह संख्या बहुत बड़ी है. इसका असर शहरी नियोजन और प्रशासन पर भी रोजाना दिखता है. पर आंकड़ों की बाजीगरी में इस दबाव की लगातार अनदेखी होती रहती है. शहरी नियोजन और उसकी चुनौतियों को समझने से पहले शहरी क्षेत्र में रह रही जनसंख्या और शहरों की ओर बढ़ती ललक के आंकड़ों पर ध्यान देना जरूरी है. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में शहरी जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का 31.16 प्रतिशत, यानी करीब 37.71 करोड़ थी. हालिया वैश्विक अनुमानों के अनुसार, यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 36 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया है. वर्ष 1981 की जनगणना रिपोर्ट की मानें, तो देश की शहरी जनसंख्या 15.9 करोड़ और तब की जनसंख्या का 23.3 प्रतिशत थी. संयुक्त राष्ट्र-हैबिटैट की वर्ल्ड सिटीज रिपोर्ट, 2016 के आकलन के अनुसार, 2015 में भारत की शहरी जनसंख्या 42 करोड़ थी. कुछ अनुमानों के अनुसार, 2030 तक भारत की 40 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहने लगेगी, जबकि कुछ अनुमानों में इसे पचास प्रतिशत तक बताया जा रहा है. यदि मौजूदा आंकड़ों के अनुसार मान लें कि लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या शहरों में रह रही है, तो एक सौ पचास करोड़ की जनसंख्या के लिहाज से यह संख्या साठ करोड़ के आसपास बैठती है. यह संख्या अकेले अमेरिका की जनसंख्या से दोगुनी है. पर अर्थव्यवस्था के लिहाज से देखें, तो भारत के लिए उसकी बराबरी कम से कम मौजूदा हालात में संभव नहीं है. उदारीकरण की जिस मौजूदा आर्थिकी को पूरी दुनिया ने अपना रखा है, वह अमेरिका और ब्रिटेन से आयी है. इस लिहाज से देखें, तो मौजूदा आर्थिकी के प्रभाव में पूरी दुनिया अमेरिका होना चाहती है, पर संसाधनों के संदर्भ में देखें, तो तत्काल ऐसा होना संभव नहीं है. न केवल भारतीय राजनीति, बल्कि लोकमानस भी इसी सिंड्रोम से गुजर रहे हैं. अमेरिका या यूरोप की तरह शहरों में बसना आज प्राथमिकता हो गयी है. सरकारें भी चाहती हैं कि गांवों की तुलना में शहर ही ज्यादा हों, क्योंकि शहरी जनसंख्या और रिहाइश घनी होती है, ग्रामीण जनसंख्या की तरह बिखरी हुई नहीं. इस कारण बिजली और परिवहन जैसी सुविधाएं गांवों की तुलना में शहरी जनसंख्या को कहीं अधिक आसानी से उपलब्ध करायी जा सकती है. इस पूरी प्रक्रिया में बेतहाशा बढ़ती शहरी जनसंख्या के लिए उचित सुविधाएं जुटाना न तो सरकारों के लिए आसान है, न ही शहरी प्रबंधन की जवाबदेही वाले स्थानीय निकाय के लिए. रही बात शहर आने वाले लोगों की, तो उनमें बड़ी संख्या कुछ हजार महीने कमाने वालों की ही है. इसी कारण शहरों की बड़ी जनसंख्या सस्ते या कई बार दड़बेनुमा सीलनभरे मकानों और कमरे में ही जिंदगी गुजारने को मजबूर है. कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के सामने भी कुछ वैसी ही चुनौतियां हैं. सत्य निकेतन में मारे गये छात्रों में से अधिकांश ऐसी ही पृष्ठभूमि से थे. मौजूदा अर्थव्यवस्था के चलते किसी भी राज्य या शहरी निकाय प्रशासन और सरकार के लिए संभव ही नहीं है कि हर व्यक्ति को साफ और उचित घर मुहैया करा सके. यह केंद्र सरकार के भी वश का नहीं है. परंतु सरकारें खुले बाजार में उचित दर पर सहूलियत भरे मकान उपलब्ध कराने वाले मकान मालिकों और छात्रावास संचालकों की निगरानी अवश्य कर सकती हैं. पर ऐसा होता नहीं है. स्थानीय प्रशासन और स्थानीय निकायों के लिए जवाबदेह अधिकांश लोगों की निगाह ऊपरी कमाई पर होती है. दिल्ली के लोगों को पता है कि वे यदि घर बनाना शुरू करते हैं, तो नगर निगम का स्थानीय बेलदार मकान मालिक से वसूलने में देर नहीं लगाता. कानूनी रूप से अब दिल्ली पुलिस की भूमिका इन मामलों में समाप्त कर दी गयी है. पर अब भी स्थानीय बीट कांस्टेबल निर्माण कार्यों के एवज में वसूली करते हैं. दिल्ली ही नहीं, देश के तमाम राज्यों में स्थानीय स्तर पर कई गांव भी शहरों में समा गये हैं. पर उनके प्रशासन और नियोजन के लिए स्थानीय निकायों में उस तरह की दिलचस्पी नहीं देखी जाती, जैसी विकसित कॉलोनियों और पॉश मोहल्लों के लिए दिखती है. यह भी एक कारण है कि सत्य निकेतन की बिल्डिंग जैसे कमजोर और अवैध मकान बनाने की प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लग रही. इसमें दो राय नहीं कि संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के बाद स्थानीय निकायों को वित्तीय और दूसरे अधिकार तो मिले ही हैं, उनके लिए आवंटन भी बढ़ा है, पर उन्हें जैसी चुस्ती दिखानी चाहिए, वह उनमें नहीं दिखती. शहरी निकाय प्रशासन की कल्पनाशक्ति जैसी होनी चाहिए, वह भी नजर नहीं आती. सत्य निकेतन की घटना के बहाने शहरी निकाय प्रशासन की उपरोक्त चुनौतियों पर खुला विमर्श होना चाहिए, तभी राह निकलेगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)