अभी-अभी संपन्न हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने क्या भारत-चीन संबंधों में सुधार की प्रक्रिया को तेज करने में मदद की है? यदि भारत ब्रिक्स के भीतर मौजूद विरोधाभासों को संभाल सकता है, तो वह चीन के साथ अपने संबंधों में मौजूद विरोधाभासों को क्यों नहीं संभाल सकता? शिखर सम्मेलन से इतर मोदी-शी की मुलाकात संयुक्त घोषणा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी. दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति, व्यापारिक संबंधों, बाजार तक पहुंच, व्यापार असंतुलन की संरचनात्मक समस्या और लोगों के बीच अधिक संपर्क जैसे मुद्दों पर चर्चा की. इसे सुलह कहना जल्दबाजी है, पर यह एक अवसर है. दरअसल, भारत और चीन पहले से ही अलग-अलग क्षेत्रों में संबंधों को अलग रखने की नीति अपना रहे हैं. बिश्केक में एससीओ के शिखर सम्मेलन में दोनों देश पाकिस्तान, रूस और अन्य देशों के साथ एक ऐसी घोषणा में शामिल हुए थे, जिसमें आतंकवाद से निपटने में दोहरे मानदंडों को खारिज किया गया था. यदि ऐसे विरोधाभासों को एससीओ और ब्रिक्स में संभाला जा सकता है, तो द्विपक्षीय स्तर पर भी उन्हें संभाला जा सकता है. चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 112 अरब डॉलर है. चीन महत्वपूर्ण सक्रिय औषधीय घटक, इलेक्ट्रॉनिक कल-पुर्जे, मशीनरी, सौर ऊर्जा से जुड़े उपकरण और प्रसंस्कृत महत्वपूर्ण खनिज उपलब्ध कराता है. गलवान के बाद भारत ने चीनी निवेश और प्रौद्योगिकी तक पहुंच पर कड़े प्रतिबंध लगाये. फिर भी आयात बढ़ता रहा. राजनीतिक जोखिम को कम करने की कोशिश ने आर्थिक निर्भरता समाप्त नहीं की. चीन के प्रति भारत का रवैया याचक का नहीं होना चाहिए.चीन की आर्थिक ताकत प्रभावशाली है, पर उसकी कमजोरियां भी हैं. उसकी आबादी बूढ़ी हो रही है, उसका कार्यबल सिकुड़ने लगा है, उसका संपत्ति क्षेत्र संकट से जूझ रहा है, कर्ज ऊंचा है, घरेलू खपत कमजोर बनी हुई है और उसकी अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता के लिए बाहरी बाजारों की जरूरत लगातार बढ़ रही है. आइएमएफ का अनुमान है कि जनसांख्यिकीय बदलाव, उत्पादकता में कमजोरी और निवेश पर घटता प्रतिफल मध्यम अवधि में चीन की आर्थिक वृद्धि को धीमा करेंगे. इसलिए चीन को भी भारत की जरूरत है. भारत दुनिया के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है. यहां अपेक्षाकृत युवा श्रमशक्ति है और उन चीनी पूंजी निवेशों के लिए एक वैकल्पिक गंतव्य उपलब्ध है, जिन्हें दूसरे देशों में बढ़ती बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में, यदि आप भारतीय बाजार तक पहुंच चाहते हैं, तो यहां उत्पादन करें, यहां रोजगार दें, यहां से अधिक से अधिक कच्चा माल और अन्य सामग्री खरीदें और यहीं से निर्यात करें. शुरुआत भारत में कारखाना लगाने को लेकर बीवाइडी के साथ गंभीर बातचीत फिर शुरू करने से क्यों न की जाये? बीवाइडी अब दुनिया की प्रमुख विद्युत वाहन निर्माता कंपनियों में शामिल है. गलवान के बाद निवेश पर लगी रोक के कारण भारत में उसके विस्तार की योजनाएं प्रभावित हुई थीं. उसे फिर बातचीत की मेज पर आमंत्रित किया जाना चाहिए, पर भारत की शर्तों पर. यानी स्थानीय उत्पादन, भारतीयों को रोजगार, आपूर्तिकर्ताओं का विकास, कड़े आंकड़ा सुरक्षा प्रावधान और घरेलू स्तर पर मूल्यवर्धन में लगातार बढ़ोतरी. प्रेस नोट तीन को व्यापक संदेह की नीति से आगे बढ़कर जोखिम आधारित जांच की दिशा में विकसित किया जाना चाहिए. दूरसंचार नेटवर्क में चीनी भागीदारी और किसी राजमार्ग, गोदाम, जल परियोजना या सिंचाई व्यवस्था के वित्तपोषण में निष्क्रिय चीनी पूंजी को एक ही नजर से देखना उचित नहीं है. यह एक ऐसी व्यावहारिक नीति का प्रस्ताव है, जिसे नितिन पई, अजय शाह और इस लेखक ने पिछले सितंबर में सामने रखा था. इसका उद्देश्य ऐसी पूंजी को स्वीकार करना है, जिस पर प्रबंधन का नियंत्रण न हो, संवेदनशील चीनी प्रौद्योगिकी को बाहर रखना और शुरुआत ऐसे गैर-संवेदनशील बुनियादी ढांचे से करना है, जिसमें सुरक्षा जोखिम कम हों. उसके बाद कुछ छोटे दरवाजे तेजी से खोले जा सकते हैं. चीनी पर्यटकों, व्यापारिक यात्रियों, शिक्षाविदों और इंजीनियरों के लिए वीजा प्रक्रिया आसान बनायी जानी चाहिए. अधिक सीधी उड़ानें बहाल की जानी चाहिए. चीनी पर्यटकों के लिए एक बौद्ध पर्यटन परिपथ बनाया जा सकता है, जिसमें बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर और नालंदा शामिल हों. गैर-संवेदनशील विषयों में विश्वविद्यालयों के बीच साझेदारी फिर शुरू की जानी चाहिए. सिनेमा, खेल और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. साथ ही, भारत को चीन के विशाल उपभोक्ता बाजार तक पहुंच के लिए अधिक मजबूती से प्रयास करना चाहिए. व्यापार घाटे का समाधान केवल चीनी आयात कम करना नहीं हो सकता. इसके साथ भारत की अधिक दवाएं, खाद्य उत्पाद, सेवाएं, मनोरंजन सामग्री और अन्य वस्तुएं चीन में पहुंचनी चाहिए. कारोबार सुगमता की खराब रैंकिंग और पश्चिमी शैली की लोकतांत्रिक संस्थाओं के अभाव के बावजूद चीन की असाधारण आर्थिक वृद्धि इस बात की याद दिलाती है कि चीन को वैसा ही समझना चाहिए, जैसा वह वास्तव में है. भारत को न तो चीन की नकल करनी चाहिए और न ही उससे डरना चाहिए. उसे सीखना चाहिए, प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए और अपनी क्षमताओं का निर्माण करना चाहिए, खासकर अंतरिक्ष और विमानन, रक्षा, अर्धचालक, महत्वपूर्ण खनिज, औषधि और एआइ के क्षेत्र में. मजबूत आधार के साथ किया गया जुड़ाव ही सबसे सुरक्षित होता है. एआइ में आत्मनिर्भरता और तकनीकी क्षमता अंततः आयात प्रतिबंधों से कहीं बेहतर सुरक्षा कवच हैं. चीन के साथ संबंधों में सुधार की प्रक्रिया से अमेरिका, यूरोप, जापान या क्वाड के साथ भारत के संबंध कमजोर नहीं होने चाहिए. भारत को एक साथ ब्रिक्स, एससीओ, क्वाड, जी-20 और अन्य उपयोगी मंचों में सक्रिय रहना चाहिए. भारत के भविष्य के विकल्पों को इनमें से किसी भी संबंध के बंधक के रूप में नहीं रखा जा सकता. अगले वर्ष ब्रिक्स की अध्यक्षता चीन के पास होगी. अगले 12 महीने एक असाधारण अवसर प्रदान करते हैं. संबंधों में सुधार के लिए मित्रता की जरूरत नहीं है, और न ही इसके लिए पूर्ण विश्वास आवश्यक है. इसके लिए पारस्परिक हित और कुछ कल्पनाशीलता की जरूरत है. जहां जरूरी हो, वहां सुरक्षा करें. जहां उचित हो, वहां प्रतिस्पर्धा करें. जहां संभव हो, वहां सहयोग करें. और जुड़ाव से मिले समय और अवसर का इस्तेमाल खुद को और मजबूत बनाने में करें. ब्रिक्स ने शायद कुछ जमी हुई बर्फ पिघला दी है. अब भारत और चीन को देखना होगा कि क्या वे उस क्षण को एक व्यावहारिक और टिकाऊ संबंध में बदल सकते हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)