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पर्यावरण की चुनौती और भारत

विकसित देश अभी भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि विकासशील देशों में संसाधनों के विकास की अधिक आवश्यकता है, जिससे उन देशों के लोगों का जीवन स्तर बेहतर हो सके.

By हर्ष वर्धन त्रिपाठी
Updated Date
पर्यावरण की चुनौती और भारत
पर्यावरण की चुनौती और भारत
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कमाल की बात यह है कि पर्यावरण संतुलन बिगड़ा है पूरे विश्व का, प्रदूषण फैला है पूरे विश्व में, लेकिन विकसित विश्व के कुछ ही देश हुए हैं. अब वही विकसित देश पूरे विश्व पर दबाव बना रहे हैं कि आप लोग विकासशील ही बने रहें, विकसित मत हों क्योंकि इससे विश्व में प्रदूषण फैलता है. ऐसे में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया को रास्ता दिखाने की कोशिश की है.

उन्होंने ग्लासगो जलवायु सम्मेलन में पंचामृत के जरिये भारतीय भावनाओं को विश्व के सामने रखते हुए कहा कि भारत विश्व को पंचामृत की सौगात दे रहा है. पंचामृत में प्रथम है कि भारत 2030 तक 500 गीगावॉट ऊर्जा गैर जीवाश्म स्रोतों से पूरा करेगा. भारत की दूसरी सौगात यह होगी कि 2030 तक भारत की कुल ऊर्जा जरूरतों का आधा गैर जीवाश्म स्रोतों से ही पूरा किया जायेगा. प्रधानमंत्री मोदी ने तीसरे पंचामृत के बारे में कहा कि भारत अभी से 2030 तक 100 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन करेगा तथा 2030 तक ही भारत अपनी कार्बन तीव्रता को 45 प्रतिशत तक कम करेगा. पंचामृत का अंतिम अमृत तत्व यह है कि भारत 2070 तक पूरी तरह कार्बन उत्सर्जन से मुक्त देश होगा.

कार्बन उत्सर्जन मुक्त होने का प्रधानमंत्री मोदी का लक्ष्य कितना बड़ा है, इसका अनुमान कुछ आंकड़ों से लगाया जा सकता है. अमेरिका के एक व्यक्ति का कार्बन उत्सर्जन चीन के दो व्यक्तियों के कार्बन उत्सर्जन के बराबर है. ब्राजील के सात व्यक्तियों का कुल कार्बन उत्सर्जन एक अमेरिकी के बराबर होता है और नौ भारतीय कुल उतना कार्बन उत्सर्जन नहीं करते, जितना एक अमेरिकी करता है. इसी कारण प्रधानमंत्री मोदी ने यह कहा कि क्लाइमेट फाइनेंस से जुड़े अब तक के सभी वादे खोखले साबित हुए हैं.

उन्होंने कहा कि उनकी बातें सिर्फ शब्द नहीं हैं, बल्कि भावी पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य का जयघोष हैं. उन्होंने पर्यावरण संतुलन के लिए वित्तीय सहयोग पर विकसित देशों से आगे आने के लिए भी कहा. ग्लोबल वार्मिंग व कार्बन उत्सर्जन जैसे शब्दों का प्रयोग कर विकसित देश विकासशील देशों पर जो दबाव बनाते हैं, दरअसल उसके मूल में विकसित देशों द्वारा संसाधनों का अनाप-शनाप दोहन ही है. असल में, विश्व पर्यावरण संतुलन के लिए आवश्यक है कि कार्बन डाईऑक्साइड के साथ मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसों का कम से कम उत्सर्जन हो.

भारत ने खतरों को देखते हुए देश के विकास के साथ पर्यावरण व प्रकृति के साथ संतुलन की भी पक्की योजना बना ली है. ग्लासगो में प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि 2030 तक भारतीय रेल को पूरी तरह से कार्बन उत्सर्जन मुक्त बनाने का लक्ष्य तय किया गया है. कार्बन उत्सर्जन मुक्त का सीधा मतलब है कि जितना कार्बन बनेगा, उससे अधिक कार्बन समाप्त करेंगे. संपूर्ण विश्व की आबादी से अधिक लोग भारतीय रेलवे से प्रतिवर्ष यात्रा करते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व को भी पर्यावरण के लिए जीवनशैली का मंत्र दिया. क्योटो प्रोटोकॉल से लेकर पेरिस समझौते तक विकसित देशों ने सिर्फ विकासशील देशों पर सारी जिम्मेदारी थोपने की कोशिश की है. यहां तक कि जलवायु परिवर्तन के लिए आधार वर्ष मानने में भी यूरोपीय संघ ने 1992 की जगह 1990 को स्वीकारा, जबकि सोवियत संघ के विघटन के बाद वहां औद्योगिक गतिविधियां कम हुईं और दुनिया में कार्बन उत्सर्जन 1990 के मुकाबले 1992 में कम हो गया था. साल 1992 को आधार वर्ष नहीं मानने से कार्बन उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य को पाने में शुरुआती गड़बड़ हुई.

विकसित देश अभी भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि विकासशील देशों में संसाधनों के विकास की अधिक आवश्यकता है, जिससे उन देशों के लोगों का जीवन स्तर बेहतर हो सके. विकसित देशों में जीवन स्तर बेहतर रखते हुए अक्षय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग की ओर बढ़ा जा सकता है. एक और महत्वपूर्ण बात समझने की है कि मीडिया ने भी पश्चिमी दृष्टिकोण से ही बात बढ़ाते हुए सारा दबाव विकासशील देशों पर ही बनाने का प्रयास किया.

ग्लासगो में प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह से जिम्मेदारियों के अहसास के साथ भारत की पर्यावरण संतुलन के मामले में प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने का शानदार अनुभव विश्व के सामने प्रस्तुत किया है, उससे साफ है कि प्रकृति व पर्यावरण की चुनौती का समाधान खोजना है, तो उसका नेतृत्व भारत को ही सौंपना होगा. गैर जवाबदेह व कम ईमानदार नेतृत्व के साथ कभी भी बड़ा लक्ष्य नहीं पाया जा सकता है.

पर्यावरण संतुलन की चुनौती अभी विश्व के सामने सबसे बड़ा और कठिन लक्ष्य है. ऐसे कठिन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसी देश की अगुआई में चला जा सकता है, जिसने स्वयं ईमानदारी दिखायी हो. दुर्भाग्य से विकसित देश ऐसा करने में पिछड़ गये हैं. भारत ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अक्षय ऊर्जा के मामले में कमाल किया है और ऐसे ऊर्जा उत्पादन के मामले में भारत विश्व में चौथे स्थान पर है.

इंटरनेशनल सोलर अलायंस के अगुआ देश के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी ने विश्व को वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड का सिद्धांत दिया है. विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बेहतर विश्व की उम्मीद बन गया है. अब प्रधानमंत्री मोदी भारतीय संस्कार और संस्कृति के साथ जोड़कर विकास पथ पर बढ़ने का लक्ष्य तय कर रहे हैं.

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