लोकतंत्र में प्रतिबंध के कानून

Updated at : 04 Apr 2017 5:50 AM (IST)
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लोकतंत्र में प्रतिबंध के कानून

आकार पटेल कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया गोवध को लेकर गुजरात में एक विचित्र कानून पारित हुआ है. इस राज्य ने पशु संरक्षण अधिनियम में संशोधन कर बैल और गाय की हत्या के दोषियों को मिलनेवाली सजा में बदलाव कर दिया. इस संशोधन के बाद अब गोवध के दोषियों को आजीवन कारावास की या कम […]

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आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
गोवध को लेकर गुजरात में एक विचित्र कानून पारित हुआ है. इस राज्य ने पशु संरक्षण अधिनियम में संशोधन कर बैल और गाय की हत्या के दोषियों को मिलनेवाली सजा में बदलाव कर दिया. इस संशोधन के बाद अब गोवध के दोषियों को आजीवन कारावास की या कम से कम 10 वर्ष की सजा हो सकती है. इस निर्णय का अर्थ यह हुआ कि गुजरात ने किसी नागरिक की हत्या करने और जानवर की हत्या करने के कृत्य को एक समान अपराध मान लिया है. गुजरात के मुख्यमंत्री ने कहा है कि वे गुजरात को एक शाकाहारी राज्य बनाना चाहते हैं.
इसके अतिरिक्त उन्होंने यह कहा कि वे किसी भी प्रकार के खान-पान यानी फूड के विरुद्ध नहीं हैं. यह बात कुछ विचित्र सी है. ऐसे में कोई भी यह पूछ सकता है कि अगर उन्हें भोजन से आपत्ति नहीं है, तो इसका मतलब यह है कि मुख्यमंत्री की पार्टी में बीफ यानी गाेमांस होने से भाजपा को कोई समस्या नहीं होगी? तो इसका उत्तर है कि उन्हें परेशानी होगी. इस कानून के पारित होने का कारण ही गोमांस है और इसके पीछे कोई दूसरा वैध कारण नहीं है. इस कानून का वैध पक्ष हमारे संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांत में शामिल है, जो कहता है कि आर्थिक कारणों से गाय और बैल को संरक्षित किया जाना चाहिए.
यह तर्क उस समय का है, जब बैल का उपयोग खेतों को जोतने के लिए किया जाता था. किसी दूसरे देश के पास इस तरह का कोई आर्थिक कारण नहीं है, यह केवल भारत के पास है. और वह इसलिए क्योंकि गोमांस को लेकर हिंदू असहज होते हैं. भारत ढोंग करता है कि उसका संविधान किसी धर्म विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है. वस्तुत:, मेरे जैसे भारतीय हमेशा इस बात को लेकर बेहद गर्व महसूस करते हैं कि हम पाकिस्तान, जिसने धर्म के आधार पर देश का निर्माण किया, से बहुत अलग हैं. सच तो यह है कि भारत का कानून उच्च वर्गीय हिंदुआें के रिवाज का ही रूपांतरण हैं. दूसरा उदाहरण है निषेध. संविधान में शराब को गलत माना गया है. समाजशास्त्री एमएम श्रीनिवास कहते हैं कि निषेध दरअसल सांस्कृतिक अधिनयम था. यह सत्य है.
गोमांस की तरह ही बहाने से शराब पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है या उसे निषिद्ध कर दिया गया है. भारतीय राज्यों ने कई बार निषेध को लेकर प्रयोग किया है, लेकिन उनमें अधिकतर अक्सर असफल रहे हैं. बिहार ने शराब रखने को सामूहिक तौर पर गैरकानूनी घोषित करने का कानून बनाया. इसका मतलब यह है कि अगर मेरे घर से शराब की बोतल बरामद होती है, तो मेरे घर में मेरी पत्नी सहित घर के बाकी सदस्यों को आरोपी माना जायेगा. यह कानून इतना हास्यास्पद था कि इस बात पर विश्वास करना कठिन था कि कोई राज्य इस पर विचार करेगा. अंतत: अदालत ने इसे रोकने के लिए कदम तो उठाया, लेकिन उसने इस कानून के एक-दूसरे स्वरूप को लागू कर दिया.
जाे लोग नीतीश कुमार को हिंदुत्व राजनीति के उपयुक्त विकल्प के रूप में देख रहे हैं, उन्हें इस पर विचार करना चाहिए. अदालत हमेशा व्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में विचार नहीं करती है.
इन दिनों हमारा देश अदालत द्वारा दिये गये आदेश, जिसमें कहा गया है कि राजमार्ग के 500 मीटर के दायरे में शराब बेचने या परोसनेवाले प्रतिष्ठानों को बंद कर देना चाहिए, को लागू करने में जुटा है. उत्तर-पूर्व मेें कुछ एेसे पर्वतीय राज्य हैं, जहां बहुत कम सड़कें हैं, वहां इस कानून के लागू होने का मतलब यह होगा कि वहां के ऐसे अधिकतर प्रतिष्ठान बंद हो जायेंगे. लेकिन न्यायालय ने इन राज्यों को छूट प्रदान की है, हालांकि मैं पूरी तरह से इस तर्क को समझ नहीं पाया हूं. अगर यह सुरक्षा का मामला है, तो इससे किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता है.
मेरे हिसाब से यह मामला व्यक्तिगत स्वतंत्रता का है. राज्य को यह मानना चाहिए कि उसके नागरिक जिम्मेवारी के साथ शराब का सेवन करेंगे. साथ ही जो लोग गैर-जिम्मेवारी के साथ शराब का सेवन करेंगे और दूसरों तथा खुद के जीवन को जोखिम में डालेंगे, उन पर मुकदमा चलाने की क्षमता और इरादा भी राज्य के पास होना चाहिए. लेकिन, ऐसा करने की बजाय राज्य सरकार इस तरह का प्रतिबंध लगा कर यह मान रही है कि आम तौर पर राज्य के नागरिक गैर-जिम्मेवार हैं. इस मामले में राज्य व्यक्ति के अधिकारों का अतिक्रमण कर रही है और देखा जाये, तो वह एक तरीके से निषेध को थोप रही है.
सच तो यह है कि इस प्रकार की अनेक कार्रवाईयों के जरिये धर्म दबे पांव हमारे गणतांत्रिक संरचना में घुस रहा है. बेशक दूसरे देशों में भी ऐसा होता है. बसंत उत्सव के समय पाकिस्तान में पतंगबाजी होती है. हालांकि, वहां भी इसे कुछ लोग गैर-इसलामिक मानते हैं अौर इसलिए अक्सर कानून का सहारा लेकर इसके लिए मुश्किलें खड़ी करते हैं. न्यायालय की नजर में पतंगबाजी पक्षियों और नागरिकों की सुरक्षा के लिए खतरा है, इसलिए उसका मानना है कि इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए. यह ठीक उसी तरह की सोच है, जैसी हम भारत में देख रहे हैं.
अंतर सिर्फ इतना है कि पाकिस्तान अपने संविधान और कानून के धर्मनिरपेक्ष होने का दावा नहीं करता है. हालांकि, इस सत्य की वजह से कि केवल धर्म ही हमें आधुनिक सरकार के लिए रूपरेखा तैयार करने की तजवीज नहीं करता है, कई पाकिस्तानी असहज महसूस करते हैं. भारत में इसके विपरित है. हमारे यहां हम जैसे कई लोग बेचैन रहते हैं कि हमारा गणतंत्र जितना हो सकता था या इसे होना चाहिए, वह उतना हिंदू नहीं है. इसी बेचैनी के कारण ऐसे कानून बन रहे हैं, जैसा गुजरात में बना है.
हमें यह स्वीकार करना होगा कि यह हिंदुत्व की संकुचित व्याख्या है, जो भाजपा द्वारा भारतीय नागरिकों पर थोपी जा रही है. वैसे भारतीय, जो चमड़े या मांस के कारोबार से जुड़े हैं, जैसे दलित या मुसलिम, उन्हें इस नये कानून से परेशानी झेलनी होगी. लेकिन, हम हमेशा उन्हें यह आश्वासन दे सकते हैं कि आधिकारिक तौर पर हम एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं, जिसके कानून का उद्देश्य उन्हें प्रताड़ित करना नहीं है.
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