हमारी सॉफ्ट पावर सीढ़ी

Updated at : 25 Aug 2016 12:32 AM (IST)
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हमारी सॉफ्ट पावर सीढ़ी

संदीप मानुधने विचारक, उद्यमी एवं शिक्षाविद् आज के जुड़े हुए विश्व में, एक राष्ट्र अपनी शक्ति दो तरीकों से दिखा सकता है- हार्ड पावर (कठोर शक्ति) और सॉफ्ट पावर (मृदु शक्ति). उदाहरण के लिए, डिजिटल इंटरनेट दुनिया (सॉफ्ट पावर) में देखें, तो 80 प्रतिशत ब्रांड्स अमेरिका की दिखते हैं, और आमजन उस देश की सर्वोच्चता […]

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संदीप मानुधने
विचारक, उद्यमी एवं शिक्षाविद्
आज के जुड़े हुए विश्व में, एक राष्ट्र अपनी शक्ति दो तरीकों से दिखा सकता है- हार्ड पावर (कठोर शक्ति) और सॉफ्ट पावर (मृदु शक्ति). उदाहरण के लिए, डिजिटल इंटरनेट दुनिया (सॉफ्ट पावर) में देखें, तो 80 प्रतिशत ब्रांड्स अमेरिका की दिखते हैं, और आमजन उस देश की सर्वोच्चता बिना प्रश्न किये मान लेता है. आइटी में भारत एक बड़ा ब्रांड बन गया है.
सैन्य क्षेत्र (हार्ड पावर) में भारत शीर्ष पांच में आता है, जहां चीन भी अनेक मामलों में लोहा लेने से कतराता है. वहीं विनिर्माण में (हार्ड पावर) चीन का मुकाबला अमेरिका भी ढंग से नहीं कर पाता. ऐसी अनेक रणनीतिक वैश्विक दौड़ें जारी हैं. सुपरपावर बनने का स्वप्न संजोये एक विशाल देश उससे अछूता नहीं रह सकता. आइए इसी पृष्ठभूमि में, हम भारत और हमारे ओलिंपिक प्रदर्शन का एक निरपेक्ष विश्लेषण करें.
हमारे देश में ओलिंपिक के प्रति आमजन सामान्यतः उदासीन ही रहता है. उसके अनेक कारण हैं- सरकारों की प्राथमिकताओं में ओलिंपिक का नहीं होना, अनेक खेलों का बेहद महंगा होना और खेलों को कैरियर का लक्ष्य नहीं मानते हुए पढ़ाई या जीविकोपार्जन में युवाओं का लगा होना. प्रति चार वर्षों में जब-जब ये खेल होते हैं, देश का मीडिया भी उन्हीं कुछ हफ्तों में अचानक से राष्ट्रीय अस्मिता और प्राथमिकताओं पर केंद्रित होने लगता है. इस वर्ष तो गजब हो गया- बेटियों को गर्भ में मार डालनेवाले और बहुओं को जिंदा जला डालनेवाले हमारे समाज में, बेटियों के मेडल जीतने पर सब बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, बेटी खिलाओ के नारे लगाने लगे. देखने लायक होगा कि ये नारे लगानेवाले और सोशल मीडिया में अपने स्टेटस पर यों लिखनेवाले, बेटी पैदा होने पर मिठाई बांटेंगे क्या?
खैर! ओलिंपिक गुजरा नहीं कि अगले तीन सालों तक सब सामान्य हो जाता है और हमारी रोजमर्रा के झंझट हावी हो जाते हैं.
ऐसा अनेक दशकों से हो रहा है, और कोई कारण नहीं है कि मैं ये विश्वास करूं कि अगले चार वर्षों में भी ऐसा ही नहीं होगा. कोई चमत्कार नहीं होगा. दबी जुबान में तो सरकारी अधिकारी भी मानते हैं कि वर्तमान व्यवस्था से यदि हम ओलिंपिक में चमत्कार की आशा कर रहे हैं, तो निरी मूर्खता होगी. नीचे से ऊपर तक की बीमारियों ने भारतीय खेलों को खोखला कर रखा है- राजनेताओं का दबदबा और भ्रष्टाचार, व्यक्तिगत पहुंच का असर और दोहन. प्रतिभाशाली व ईमानदार प्रशासकों का नितांत अभाव हमें हर बार ले डूबता है. ऐसे में यदि हम वाकई में भारत की छवि को लेकर चिंतित हैं और अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक मंच पर अपना सिक्का ‘टॉप टेन’ में जमाना चाहते हैं, तो हमें इस पांच सूत्रीय कार्यक्रम पर ध्यान देना चाहिए…
सूत्र एक- ओलिंपिक अहिंसक तरीके से भारत के सॉफ्ट-पावर सिद्ध करने और धाक जमाने का जरिया है, यह बात यदि हमारे राजनेता समझ लें, तो चमत्कार हो सकता है. ओलिंपिक को केवल एक अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता न मान कर, देशों का एक भीषण किंतु शांत युद्ध मानें और जिस प्रकार हम रक्षा व्यय और सुरक्षा बलों व सेना के आधुनिकीकरण से हिंद महासागर व दक्षिण एशिया में सिक्का जमा रहे हैं, वही काम हमारा ओलिंपिक प्रदर्शन करेगा, यह हम समझें. पूरा तर्क ही बदल जायेगा. राजनेताओं का पूरा बल सफल प्रदर्शन पर होगा, न कि सैर-सपाटे और टांग खींचने पर.
सूत्र दो- ओलिंपिक में सफलता हमें केवल एक पूर्ण रूप से पृथक बनी व्यवस्था से ही मिल सकती है. हमारे खेल मंत्रालय को सब कुछ करने दिया जाये, बस ओलिंपिक नहीं. यदि हम वाकई में गंभीर हैं, तो हमें अलग से एक ओलिंपिक मंत्रालय बना कर शून्य से रूप-रेखा बनानी होगी. यह विचार उतना विचित्र नहीं है, जितना पहली बार में दिख सकता है. याद करें, हमने बाघों और हाथियों तक के लिए पूरी-पूरी योजनाएं बनायी हैं और ढंग से चलायी हैं.
नतीजे भी आये हैं! जिस प्रकार भारत का आइटी उद्योग अपने पृथक होने और सरकारी दखल से बचे होने की वजह से पनप सका और पूरे विश्व में सिक्का जमा सका, वही फाॅर्मूला हमें रणनीतिक तौर पर अपनाना चाहिए. ओलिंपिक का मंत्री भी अलग हो (जो विशुद्ध नेता न होकर एक खिलाड़ी या प्रशासक हो), उस मंत्रालय की टॉप टीम में केवल वरिष्ठ खिलाड़ी, सैन्य बलों के अधिकारी और सामान्य लोक सेवा प्रशासक हों, जिनका बजट और कार्य-निष्पादन एक ऑनलाइन डैशबोर्ड में रोज अपडेट होता रहे.
सूत्र तीन- केवल कुछ चुने हुए खेलों को चिह्नित कर, एक निश्चित मात्रा में मेडल का लक्ष्य बना कर, एक प्रोजेक्ट के रूप में आठ वर्षों की (कम-से-कम) कार्य-योजना बनानी होगी. नेता और अधिकारी यह समझें कि यह कोई संविधान संशोधन या नया कानून बनाने या नयी बड़ी घोषणा करने का काम नहीं है कि घोषणा हुई (या नया कानून बना) और वाह-वाही लूट ली, फिर भले ही जमीनी स्तर पर सब टूट-फूट जाये. ओलिंपिक में आप श्रेष्ठों में श्रेष्ठ से भिड़ रहे होते हैं, और सामान्यता व मध्यमता के लिए उतनी ही जगह होती है, जितनी आज तक चली सरकारी योजनाओं में अटूट ईमानदारी के लिए!
सूत्र चार- पूरे देश से एक वर्ष तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तर्ज पर संभावित खिलाड़ियों का चुनाव किया जाये और चुने जानेवाले खिलाड़ियों हेतु अगले दस या पंद्रह वर्षों के लिए तय वेतनमान और भत्ते सुनिश्चित किये जायें. खिलाड़ी यदि रोटी और छत की चिंता से मुक्त रहेगा, तो ही कुछ कर सकेगा. ऐसा आज तक भारत में नहीं हुआ, बावजूद इसके हमारे खिलाड़ी पदक जीतते आये हैं! हां, चुने हुए खिलाड़ी अपने परिवार से अलग हो जायेंगे और हर वर्ष कुछ समय की छुट्टियां ले पायेंगे.
सूत्र पांच- एक देश के रूप में, हम अपनी दखलअंदाजी को विश्राम देकर, इस ओलिंपिक मंत्रालय को दस वर्षों का समय दें. बेवजह का दखल व निंदा बिल्कुल न करें. यह लड़ाई सामान्य हथियारों से नहीं लड़ी जा सकती, इसको समझें. मासिक परफॉरमेंस ऑडिट से दिखता रहे कि कोई भारी गड़बड़ तो नहीं हो रही है, अन्यथा उन्हें समय दें. चमत्कार हो सकता है.हममें कमाल करने की क्षमता हमेशा से रही है. जरूरत है एक शीर्ष नेता की, जो इस सोच से एक नयी गाथा लिख डाले.
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