एक मुखरता का मौन होना

Updated at : 29 Jul 2016 4:48 AM (IST)
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एक मुखरता का मौन होना

प्रकाश कुमार रे महाश्वेता देवी 14 जनवरी, 1926 – 28 जुलाई, 2016 आधुनिक भारतीय साहित्य का कोई भी प्रतिनिधि संकलन महाश्वेता देवी की रचनाओं के बिना पूरा नहीं सकता है. पर यह तथ्य उनके होने के महत्व की एक अधूरी अभिव्यक्ति है. स्वातंत्र्योत्तर भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिप्रेक्ष्य के समुचित आकलन के लिए […]

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प्रकाश कुमार रे
महाश्वेता देवी
14 जनवरी, 1926 – 28 जुलाई, 2016
आधुनिक भारतीय साहित्य का कोई भी प्रतिनिधि संकलन महाश्वेता देवी की रचनाओं के बिना पूरा नहीं सकता है. पर यह तथ्य उनके होने के महत्व की एक अधूरी अभिव्यक्ति है. स्वातंत्र्योत्तर भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिप्रेक्ष्य के समुचित आकलन के लिए भी हमें उनकी साहित्यिक और गैर-साहित्यिक लेखन से होकर गुजरना पड़ेगा. लेकिन महाश्वेता देवी के पूरे व्यक्तित्व और उनकी अथक सक्रियता का एक बड़ा हिस्सा होते हुए भी उनका लेखन उनके होने का एकमात्र परिचय नहीं है.
समाज की शोषणकारी संरचना में सबसे निचले पायदान पर भयावह परिस्थितियों में जीने के लिए बेबस उन आदिवासी समुदायों, जिन्हें कभी औपनिवेशिक शासन ने आपराधिक जनजातियों की अमानवीय सूची में डाल दिया था और जो स्वतंत्र भारत की सरकारों द्वारा उस सूची से हटा दिये जाने के बाद भी सामाजिक और प्रशासनिक क्रूरता से मुक्त न हो सके थे, की आह और आवाज को मुख्यधारा के विमर्श और नीतिगत पहलों में जगह महाश्वेता देवी के संघर्ष से ही मिली. बंगाल से शुरू हुआ यह प्रयास आज एक देशव्यापी आंदोलन है.
दलितों, महिलाओं और किसानों के हितों और मानवाधिकारों के लिए दशकों तक वह बोलती, लिखती और चलती रहीं. लेखन के लिए उन्हें साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान मिले, तो सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के लिए पद्म विभूषण और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार दिये गये. बंगाल और बंगाल से बाहर लाखों लोगों ने महाश्वेता देवी को ‘दी’ और ‘मां’ कह कर संबोधित किया. उन्होंने हमेशा बंगाली में लिखा और उनकी रचनाएं अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में अनुदित हुईं, उन पर फिल्में बनीं और नाटक रचे गये.
बंगाल, झारखंड, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, सुदूर दक्षिण तक भारत के वंचितों के जीवन की सच्चाइयों को विमर्श के केंद्र में लानेवाला उनका लेखन भाषाओं, समाजों और संस्कृतियों की सीमाओं से परे संप्रेषित हो सका. यह विलक्षण और अद्भुत बौद्धिक परिघटना है. यह भी एक विशिष्ट साहित्यिक उपलब्धि उनके खाते में है कि उन्हें विचलित करनेवाले वर्तमान को परिलक्षित और अभिव्यक्त करने के लिए कथेतर लेखन का सहारा नहीं लेना पड़ा, जो अक्सर साहित्यकारों को करना पड़ता है.
सत्ता से चिर क्षुब्ध महाश्वेता के वक्तव्य और टिप्पणियां पिछले कई दशकों से भारतीय अंतरात्मा की आवाज की हैसियत पा गयी थीं. देश की जनता की आकांक्षाओं को पूरा नहीं करने के लिए स्वतंत्र भारत की सरकारों को उन्होंने लगातार कठघरे में खड़ा किया. अपने रोष को कभी छुपाने या नरम शब्दों में कहने की कोशिश भी नहीं की.
बंगाल की हर सरकार और हर राजनीतिक दल के साथ उनका टकराव रहा. नक्सलबाड़ी और अन्य क्रुद्ध असंतोषों के पक्ष में खड़ी हुईं और जब भी उन्हें लगा कि ये आंदोलन राह से भटक रहे हैं, तो उनका आलोचनात्मक स्वर भी मुखर हुआ. यह उनके नैतिक कद और साहसी व्यक्तित्व का असर था कि इन सबके बावजूद किसी नेता ने उन्हें निशाने पर लेने की हिम्मत नहीं की.
बंगाल के सांस्कृतिक इतिहास में ऐसे अनेक व्यक्ति हुए हैं, जिन्होंने न सिर्फ उस इलाके के, बल्कि पूरे देश की चेतना पर गहरा असर डाला है. महाश्वेता देवी इस सिलसिले का संभवतः अंतिम नाम है. यदि भारत को एक बेहतर और न्यायपूर्ण देश के रूप में प्रतिष्ठित करना है, तो हमें महाश्वेता देवी के संदेशों को मन, वचन और कर्म से अंगीकार करना होगा.
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