नाबालिगों के प्रश्न पर निर्णय का वक्त

Published at :17 Jan 2014 3:44 AM (IST)
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नाबालिगों के प्रश्न पर निर्णय का वक्त

हाल ही में रांची शहर के पास कमड़े में मैट्रिक की एक छात्र के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ. उस समय वह अपने दोस्त के साथ जा रही थी. घटना के 24 घंटे के अंदर आरोपी पकड़े गये. गिरफ्तारी के बाद पता चला कि दुष्कर्म के दस आरोपियों में नौ नाबालिग हैं. उसमें तो एक लड़का […]

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हाल ही में रांची शहर के पास कमड़े में मैट्रिक की एक छात्र के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ. उस समय वह अपने दोस्त के साथ जा रही थी. घटना के 24 घंटे के अंदर आरोपी पकड़े गये. गिरफ्तारी के बाद पता चला कि दुष्कर्म के दस आरोपियों में नौ नाबालिग हैं. उसमें तो एक लड़का ऐसा भी था जिसकी उम्र लगभग 12 साल है. ठीक से दाढ़ी-मूंछ भी नहीं निकली है. यह इस बात का प्रमाण है कि युवा पीढ़ी कैसे भटक रही है.

युवा देश के भविष्य हैं लेकिन यही युवा अगर भटकने लगे, तो क्या होगा देश का? इस घटना ने अनेक सवालों को जन्म दिया है. नाबालिगों पर जुवेनाइल एक्ट के तहत मामला चलेगा और इसका लाभ इन लड़कों को मिल जायेगा. अगर ये लड़के दोषी पाये जाते हैं, तो इन्हें मामूली सजा मिलेगी. क्या कानून में बदलाव होना चाहिए? दुष्कर्म करनेवालों को कडी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए. मिलती भी है. इसमें उम्रकैद से लेकर फांसी की सजा होती है. लेकिन आरोपी अगर नाबालिग है, तो बहुत कम सजा होती है.

यह बहुत गहरी दुविधा का मामला है. एक तरफ घिनौना अपराध, तो दूसरी तरफ बचपन? ‘निर्भया’ मामले के बाद से ही नाबालिगों के गंभीर अपराधों को लेकर समाज में तीखी बहस चल रही है. इसलिए जुवेनाइल एक्ट में संशोधन की बात भी हो रही है. कानून में जो कमियां हैं, उसका लाभ दुष्कर्मी उठाते हैं. अगर 18 साल से एक दिन भी कम उम्र है, तो दुष्कर्मी को उसका लाभ मिल जाता है. समय आ गया है, इस पर फैसला लेने का. यह भी सही है कि सिर्फ कानून से अपराध खत्म नहीं हो जायेंगे. सवाल नैतिकता का है, मूल्यों का है, संस्कार का है.

बच्चों में संस्कार भरने की परंपरा कम हो गयी है. माता-पिता अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं, उन्हें पता नहीं होता कि उनके बच्चे किस राह पर जा रहे हैं. जब तक वे जान पाते हैं, काफी विलंब हो गया होता है. बच्चों को ऐसी शिक्षा दी जाये, उनमें ऐसे संस्कार डाले जायें कि वे भटके नहीं. टेलीविजन कल्चर ने बच्चों की जिंदगी ही बदल दी है. बच्चे टेलीविजन पर जो देखते हैं, उसे ही अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं. इसी क्रम में उनका भटकाव होता है. इसलिए बच्चों को सही राह दिखाने के लिए परिवार, समाज, स्कूल तीनों स्तर पर काम करने की जरूरत है.

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