कुमारस्वामी की भारतमाता!

Updated at : 06 Apr 2016 5:50 AM (IST)
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कुमारस्वामी की भारतमाता!

चंदन श्रीवास्तव एसोसिएट फेलो, कॉमनकॉज आनंद कुमारस्वामी की एक किताब है ‘ऐसेजइन नेशनल आयडिलिज्म’. जीए नेटसन एंड कंपनी, मद्रास से 1909 में प्रकाशित इस किताब में संकलित एक आलेख का नाम है- माता भारत! आलेख अनूठा है, इस अर्थ में कि उसमें पहली दफे भारतमाता की कथा कही गयी है. बंकिमचंद्र ‘वंदे मातरम्’ गीत में […]

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चंदन श्रीवास्तव
एसोसिएट फेलो, कॉमनकॉज
आनंद कुमारस्वामी की एक किताब है ‘ऐसेजइन नेशनल आयडिलिज्म’. जीए नेटसन एंड कंपनी, मद्रास से 1909 में प्रकाशित इस किताब में संकलित एक आलेख का नाम है- माता भारत! आलेख अनूठा है, इस अर्थ में कि उसमें पहली दफे भारतमाता की कथा कही गयी है.
बंकिमचंद्र ‘वंदे मातरम्’ गीत में भारतमाता का आद्यरूप गढ़ चुके थे, इस आद्यरूप को अबनींद्रनाथ टैगोर की तूलिका ने अपने कैनवस पर मूर्तिमान किया लेकिन, गीत और चित्र से उठनेवाले अर्थों की प्रामाणिक व्याख्या अभी शेष थी. व्याख्या का यही काम भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ आनंद कुमारस्वामी ने अपने ‘माता भारत’ शीर्षक लेख में किया.
कुमारस्वामी के आलेख की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है- ‘कभी की बात है, एक स्त्री थी- लंबी और गोरी. एकदम निर्मल, धैर्य और कृपा की प्रतिमूर्ति…! ’ आलेख में आगे प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत का संकेत करते हुए लिखा गया है कि विद्या-बुद्धि के मामले में यह स्त्री विश्वगुरु थी, बहुतों ने उसका हाथ मांगना चाहा और इनमें से एक जिससे उसे रंचमात्र ही प्रेम था, बरसों तक उसकी काया का स्वामी बना रहा. फिर एक और आया, इस अनजान प्रणय-याचक ने वादे किये स्वतंत्रता और शांति के, उसकी संतानों की सुरक्षा के. और, उसने विश्वास करके उसे अपना हाथ सौंप दिया…!
इसके बाद आलेख में सन् 1857 का जिक्र आता है कि स्त्री के कुछ बच्चे नये स्वामी के विरुद्ध उठ खड़े हुए.उन्हें लगा कि उनकी ताकत छिनी जा रही है और उनके आपस के बात-व्यवहार जिन नियम-कायदों से संचालित होते हैं, उनके साथ छेड़छाड़ की जा रही है. भारतमाता की इस कथा में एक नया मोड़ आता है, जब 1857 के बाद के मध्यवर्गीय मानस के दोहरेपन को इंगित करते हुए कुमारस्वामी लिखते हैं कि नये स्वामी से माता ने एक संतान जना और स्वामी खुश था कि वह (एक कन्या का जन्म) उसके रंग-ढंग की होगी, उसके अपने लोगों की कन्या के समान.
वह धनवान और रूपवान होगी, उसके अपने लोगों के पुत्र की दुल्हन बनेगी. लेकिन जब इस संतान का जन्म हुआ, तो माता जैसे स्वप्न से जागी और सिर्फ अपनी बेटी की खातिर जीने लगी. बड़ी होती बेटी मां को उसके यौवन के दिनों की याद दिलाती थी. वह विदेशी स्वामी की पक्षधर नहीं थी, तो भी उसमें उस (विदेशी स्वामी) जैसी ऊर्जा और व्यावहारिक मामलों की चतुराई थी. मां चुपके से बेटी को प्राचीन ज्ञान सिखाती और बेटी का हृदय अपने पिता, उसके लोगों और उनके आचार-व्यवहार से दूर होता चला गया.
कथा के आखिर में आता है कि बेटी की आचार-व्यवहार से माता को संतोष था, अब उसके केश उजले हो चले थे, उम्र के हाथों वह कमजोर हो चली थी और एक समय आया जब वह नहीं रही, क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था. बेटी को पिता की निरंकुशता जरा भी बर्दाश्त नहीं थी.
उसे सभी माता कहते थे, और वह अपने से पहले जन्म लेनेवाले बच्चों की भी मां थी, कुमारस्वामी लिखते हैं कि ‘इस माता (क्योंकि उसने कहा कि वह सबकी मां होगी लेकिन ब्याहता किसी की नहीं) ने सब संतानों की मदद की. उसने सबको एक-दूसरे से प्रेम करना और एक-दूजे की मदद करना और अपने को मां पुकारना सिखाया.’
यह कथा बार-बार याद की जानी चाहिए, क्योंकि आज एक राज्य का मुख्यमंत्री कह रहा है कि भारत माता की जय नहीं बोलनेवालों को इस देश में रहने का अधिकार नहीं है. दूसरे राज्य में एक वरिष्ठ नेता स्कूल-कॉलेज चलानेवाले एक ट्रस्ट का संचालक है. वह नियम बना रहा है कि ट्रस्ट के स्कूल-कॉलेज के प्रवेश फाॅर्म पर भारत माता की जय नहीं लिखा, तो प्रवेश नहीं मिलेगा.
तीसरे राज्य में धर्म की एक संस्था फतवा जारी करती है कि मुसलमान जिस तरह वंदे मातरम् नहीं बोल सकते, इसी तरह भारत माता की जय भी नहीं बोल सकते. जहरबुझी बयानबाजियों के बीच ऐसा लगता है यह 21वीं सदी के दूसरे दशक का नहीं 1930-40 का भारत है, जब एक देश के भीतर धर्म-केंद्रित दो राष्ट्रीयताओं के सिद्धांत ने जोर पकड़ा था. इतिहास दोहराने के आतुर इन बयानवीरों में से क्या किसी को भारतमाता की कथा याद है?
आनंद कुमारस्वामी की भारतमाता की कथा किसी एक धर्म की कथा नहीं है, वह धार्मिकताओं के समाहार की कथा है. इस कथा की पहली सीख है कि अतीत में लौटना नहीं हो सकता और दूसरी सीख है कि भारतमाता स्वयं स्वामिनी (संप्रभु) हैं, सब ही उनकी संतान हैं, सो कोई एक अपने को वारिस बता कर शेष पर भारतमाता के नाम से हुक्म के कोड़े हांकने की निरंकुशता नहीं बरत सकता.
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