संतोषजनक बजट सत्र
Updated at : 17 Mar 2016 6:34 AM (IST)
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संसद के मौजूदा सत्र का पहला चरण बुधवार को समाप्त हो गया. सत्र का दूसरा हिस्सा 17 मार्च से 24 अप्रैल तक के अंतराल के बाद 25 अप्रैल को प्रारंभ होगा. इस अंतराल के दौरान स्थायी समितियां विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों का अध्ययन करेंगी. पिछले दो सत्रों- मॉनसून सत्र एवं शीतकालीन सत्र- में हंगामे […]
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संसद के मौजूदा सत्र का पहला चरण बुधवार को समाप्त हो गया. सत्र का दूसरा हिस्सा 17 मार्च से 24 अप्रैल तक के अंतराल के बाद 25 अप्रैल को प्रारंभ होगा. इस अंतराल के दौरान स्थायी समितियां विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों का अध्ययन करेंगी.
पिछले दो सत्रों- मॉनसून सत्र एवं शीतकालीन सत्र- में हंगामे के कारण दोनों सदनों का कामकाज प्रभावित हुआ था, लेकिन मौजूदा सत्र का रिकॉर्ड अभी तक अपेक्षाकृत बेहतर रहा है. संसदीय गतिविधियों पर अध्ययन करनेवाली संस्था पीआरएस इंडिया के मुताबिक, मंगलवार यानी 15 मार्च तक लोकसभा की उत्पादकता 120 फीसदी और राज्यसभा की 97 फीसदी रही. पिछले मॉनसून सत्र में लोकसभा की उत्पादकता 48 फीसदी और राज्यसभा की महज नौ फीसदी रही थी. तुलनात्मक रूप से बेहतर शीतकालीन सत्र में लोकसभा और राज्यसभा में यह आंकड़ा क्रमशः 98 और 50 फीसदी रहा था. मौजूदा सत्र के रिकॉर्ड को देखते हुए कहा जा सकता है कि सत्तारूढ़ और विपक्षी खेमा परस्पर तनातनी के माहौल से निकल कर संसदीय गरिमा को राजनीतिक रस्साकशी से ऊपर रखने में काफी हद तक कामयाब रहा है.
इसी कारण अनेक महत्वपूर्ण विधेयकों और मुद्दों पर चर्चा हो सकी. लेकिन इस सत्र में भी कई ऐसे अवसर आये, जब दोनों पक्ष हंगामे और विरोध पर उतारू हुए तथा बहस के दौरान तल्ख तेवर भी देखने को मिले. हैदराबाद विवि में छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या, दिल्ली के जेएनयू में छात्रों की गिरफ्तारी, कार्ती चिदंबरम पर आरोप, इशरत जहां मुठभेड़, विजय माल्या का देश से निकल जाना, यमुना नदी के किनारे सांस्कृतिक आयोजन आदि अनेक मसलों पर जम कर हंगामा हुआ तथा सदन के कामकाज में व्यवधान हुआ.
पर, इन व्यवधानों के बावजूद चर्चाएं हो सकीं और राष्ट्रपति के अभिभाषण, आम बजट, रेल बजट, रियल इस्टेट विधेयक, आधार विधेयक जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर कार्यवाही समुचित तरीके से संपन्न हुई. इस तरह इस सत्र के दूसरे चरण में वस्तु एवं सेवा कर से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक और दिवालिया विधेयक पारित होने की उम्मीदें बढ़ी हैं.
राजनीतिक विरोध और असहमतियां लोकतंत्र को मजबूत बनाती हैं, पर सभी पक्षों का यह दायित्व भी है कि वे मतभेदों को पाटते हुए देशहित में जरूरी विधेयकों को पास करायें तथा राष्ट्रीय मुद्दों पर संतुलित बहस से समस्याओं के समाधान की राह बेहतर बनायें. आशा है कि सरकार और विरोधी दल बजट सत्र के दूसरे चरण में भी संसदीय जिम्मेवारियों का बखूबी निर्वाह करेंगे.
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