गांव के चौराहे पर हुंकार की बात

Published at :23 Oct 2013 2:57 AM (IST)
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गांव के चौराहे पर हुंकार की बात

।।चंचल।। (सामाजिक कार्यकर्ता) काका! यह हुंकार का होता है? लखन कहार के सवाल पर चिखुरी टस्स से मस्स नहीं हुए. सामने अखबार आंखों के पास जमा रहा. आसरे की भट्ठी बदस्तूर धुआं उगलती रही. धुएं ने न्यू बाम्बे हेयर कटिंग सैलून के उस बोर्ड को घेर लिया, जो नीम के पेड़ के नीचे लटका है, […]

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।।चंचल।।

(सामाजिक कार्यकर्ता)

काका! यह हुंकार का होता है? लखन कहार के सवाल पर चिखुरी टस्स से मस्स नहीं हुए. सामने अखबार आंखों के पास जमा रहा. आसरे की भट्ठी बदस्तूर धुआं उगलती रही. धुएं ने न्यू बाम्बे हेयर कटिंग सैलून के उस बोर्ड को घेर लिया, जो नीम के पेड़ के नीचे लटका है, जिस पर अमिताभ बच्चन का भद्दा सा चेहरा मुस्कुरा र हा है. वह खूंटी अभी खाली ही है, जो नीम के पेड़ में गड़ी पड़ी है और जिस पर थोड़ी देर बाद ‘बोफोर्स’ के बाबू आकर शीशा लटकायेंगे और नीचे काठ की कुर्सी रख कर सैलून ‘ओपन’ कर देंगे. (एक जमाने तक अमिताभ अपने बाप से जाने जाते थे, बाद में बच्चन जी अमिताभ से, उसी तरह ररा नाई अपने बेटे बोफोर्स से जाने जाते हैं. अब यह कहानी लंबी है कि ररा नाई के लड़के का नाम बोफोर्स क्यों पड़ा? हुआ यों कि जिस दिन बोफोर्स के चलते वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने, उसी दिन ररा नाई के घर उसकी पत्नी ने एक बालक को जन्म दिया. वह मूर में पैदा हुआ और उसकी जन्मपत्री में ‘ब’ से नाम पड़ने की घोषणा थी, चुनांचे उसका नाम बोफोर्स पड़ा. जब चौराहे पर ररा ने सैलून खोलने का फैसला किया, तो ररा बोफोर्स के बाबू के नाम से जाने गये.)

मूल कथा पर आने से पहले आपको यह बताना जरूरी लगा कि आप इस चौराहे को रांची, पटना, कलकत्ते से तुलना न करें. यह गांव का चौराहा है, जो देश में आये ‘विकास’ की कहानी बताता है. आज देश के हर चार गांव के बगल में ये चौराहे बन गये हैं. गांव का विकास बापू की कामना थी. सरकार को उस कामना के लिए विकास तक आना ही पड़ा और विकास हुआ भी. आज बहुत से चालबाज पढ़ाकू हैं, जो विकास नापने लिए सड़क सूंघते हैं. बिजली के खंभे गिनते हैं. जबकि चिखुरी का कहना है- ये कमबख्त जो कुर्सियों में धंसे दिनभर कलम घिसते रहते हैं, इन्हें न विकास की समझ है न देश की. अब इस सड़क को ही लीजिए, यह ‘वन वे’ है. यह गांव का माल मंडी नहीं ले जाती, शहर का कचड़ा लाकर गांव में गिरा देती है. कल तक हम गुड़ और चबैना से मेहमान का स्वागत करते थे, आज चाय-बिस्कुट और चिप्स परोसते है. भांति-भांति के सामान प्लास्टिक में लपेट कर अक्खा गावन में फैला दिया है. का करे गांव सुबह जब सोकर उठता है, शहर के जहर से जिनगी शुरू करता है. नीम के पेड़ बेमानी हो गये हैं, मनइ के लिए. हम ‘झागवाले’ से दांत मांजते हैं. कहां तक बताएं. रही-सही कसर बिजली ने पूरा कर दी. एक भी उद्योग किसी घर में नहीं लगा, पर टीवी हर घर में. लाछमीना गोरी होने के क्रीम खरीदती है, क्योंकि उसे शाहरुख ने बताया है. न पतिया रहे हो तो टीवी देख लो. हर दुकान पे प्लास्टिक का लोटा-थरिया तक आ गया है. मुसहर और कुम्हार गांव छोड़ कर शहर जा बसे हैं और रिक्सा खींच कर घोड़े के अस्पताल में मर रहे हैं. यही विकास है का भाई? पर यह हो चुका है. इन्हीं सड़कों के किनारे चौराहा बन रहा है, लोग अहले सुबह यहां आ जाते हैं, अखबार की खबर के साथ आसरे की चाय का लुत्फ लेते हैं. न्यू बाम्बे में बाल कटता है. चैनलों की भीड़ में पैदा हुई पीढ़ी पीतल की कलछुल बेच कर ‘सिम’ खरीदती है और सरेआम कान में ‘आला’ डाले बहरों की तरह घूमती है. कल तक गांव के जो सवाल गांव के चौपाल पर हल होते थे, अब चौराहे पर होते हैं. तभी तो लखन कहार ने चिखुरी से पूछा है- काका इ हुंकार का होता है?

तक यह सवाल गाढ़ा होता, तब तक कई और सदस्य चाय की दुकान और अपनी-अपनी जगह पर काबिज हो चुके हैं. कयूम पिसटीन वाले, कोलई दुबे ‘मांटेसरी वाले’, उमर दरजी, भीखइ मास्टर रिटायर, नवल उपाधिया और पत्रकार मद्दू (पूरा नाम महंथ दुबे है, पर पहले ‘म दू’ हुए, फिर मद्दू हो गये). सब के सब हैं, पर लखन कहार का सवाल- यह हुंकार का होता है?- बना रहा. चिखुरी जवाब नहीं देंगे तो क्या और कोई नहीं देगा? कोलई ने जवाब देना शुरू किया. हुंकार? यह तो मनइ की भाषा ना है. तो? लखन ने फिर पूछा. अब ऐसे समझो. जिसे बकरी कहते हैं, क्या करती है? मिमियाती है न? और बिल्ली? म्यांऊ-म्यांऊ करती है न? कुकुर? भूंकता है न? बीच में कीन उपधिया आ गये. बकवास तो करो इ मत. ऊ हुंकार रैली अहै. करोड़ों की साड़ी, बिलाउज, साया, कुर्ता, पजामा, टोपी सब जा रहा है बटने.

अब चिखुरी से नहीं रहा गया. अखबार परे खिसकाये. धोती संभारा और चालू हुए- सुन कीन! ऊ दिल्ली ना है कि कुर्ता बांटी के नारा लागिऔबे. ऊ बिहार है. उसने चंपारण से गांधी को दिया है. जेपी की कर्मभूमि है. कर्पूरी की जमीन है. इसे बिहारी कहते हो न? इसका जज्बा और दिल देखो. जब दूसरे लोग भाषा, जाति, मजहब के नाम पर हिंसा पर उतरते हैं, बिहार फराक्दिली से स्वागत करता है. क्या हुआ था बंबई में, हमारे बच्चे सड़कों पर घसीट कर मारे गये. और बिहार का देखो, उसने अनुदान नहीं खाया है, उसे तो स्वाभिमान पसंद है.

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