मुसलमानों को नागरिकता क्यों नहीं?
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :11 Aug 2015 12:21 AM (IST)
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आकार पटेल कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया मैंने आप्रवासन (इमीग्रेशन) पर छपी एक खबर देखी, जिसके बाद मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि सरकार जो कर रही है क्या उस पर उसने सोचा भी है. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘असम और पश्चिमोत्तर भारत के कुछ हिस्सों पर दूरगामी असर डालनेवाला एक कदम […]
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आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
मैंने आप्रवासन (इमीग्रेशन) पर छपी एक खबर देखी, जिसके बाद मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि सरकार जो कर रही है क्या उस पर उसने सोचा भी है. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘असम और पश्चिमोत्तर भारत के कुछ हिस्सों पर दूरगामी असर डालनेवाला एक कदम उठाते हुए, केंद्रीय गृह मंत्रालय नागरिकता कानून, 1955 में संशोधन करेगा, जो धार्मिक उत्पीड़न की वजह से पाकिस्तान और बांग्लादेश से भाग कर आये उन प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करेगा, जिनका नाम किसी दस्तावेज में दर्ज नहीं है.’
पिछले साल आम चुनावों में भाजपा के घोषणापत्र में साफ कहा गया था : ‘भारत नैसर्गिक रूप से उत्पीड़ित हिंदुओं का घर रहेगा और जो यहां शरण मांगने आयेंगे उनका स्वागत किया जायेगा.’ भाजपा का हमेशा से यह नजरिया रहा है, इसलिए इसमें ताज्जुब की बात नहीं है.
कानून में संशोधन से जुड़ी इस खबर में यह भी कहा गया है कि प्रवासियों में ‘सिर्फ हिंदू नहीं, बल्कि बौद्ध, ईसाई, पारसी, सिख और जैन भी’ शामिल किये जायेंगे. इसके लिए, सरकार एक विधेयक लाने जा रही है, जो उपरोक्त समुदायों के बाहर से आकर भारत में बसने को आसान बनायेगा.
मेरी समझ से यह अच्छी चीज है. अगर लोग अपने धर्म या अपनी नस्ल की वजह से उत्पीड़ित किये जा रहे हैं, तो राष्ट्रों का दायित्व बनता है कि वे उन्हें अपने यहां आने दें और उन्हें शरण दें.
पश्चिमी देश कई दशकों से अपने यहां ऐसे शरणार्थियों को आने दे रहे हैं और बहुत से अफ्रीकी और एशियाई मूल के लोगों को वहां पनाह मिली है. उनके यहां इसके लिए कोटा तक निर्धारित है. लेकिन रिपोर्ट में दी गयी सूची देखते हुए, मैं यह बहुत नेकनीयती से पूछना चाहता हूं, जो कि स्वाभाविक भी है : मुसलमानों का क्या? ऐसा लगता है कि सरकार ने जो फॉमरूला तय किया है, उसमें मुसलमानों को अलग से चिह्न्ति करके छोड़ा गया है.
यकीनन इसकी वजह बहुत स्वाभाविक लग सकती है. भारत का बंटवारा धार्मिक आधार पर हुआ था और कुछ हद तक लोकतांत्रिक भी था. 1945-46 के चुनावों (जो अलग निर्वाचन क्षेत्रों और बहुत सीमित संख्या में लोगों के मतदान के साथ संपन्न हुआ था) में मुसलिम सीटों पर मुसलिम लीग को मिली भारी जीत से देश के अंतिम रूप से बंटवारे की उसकी मांग को बल मिला. चूंकि मुसलमानों ने बंटवारा मांगा था और उन्हें यह मिला भी, इसलिए उन्हें यह शिकायत नहीं करनी चाहिए कि उन्हें अपने नये देश में अच्छा नहीं लग रहा है.
इस मुद्दे के प्रति भाजपा की समझ (जो पिछले साल चुनाव प्रचार में बिल्कुल साफ दिख रही थी) और अभी के प्रस्तावित कानून, दोनों के पीछे यही तर्क काम करता प्रतीत होता है. सूची में केवल मुसलमानों को छोड़ देना इसी सोच का नतीजा है. ऊपरी तौर पर देखें, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता और इसके खिलाफ एक हद से ज्यादा दलीलें नहीं दी जा सकतीं.
मुङो लगता है कि अविभाजित भारत के इलाकों से आये प्रवासी हिंदुओं और सिखों को भारत में सभी सरकारें हमदर्दी के साथ देखेंगी. मीडिया भी ऐसे लोगों के बिना शर्त पुनर्वास को समर्थन देगा.
मेरा मुद्दा केवल कानून में प्रस्तावित संशोधनों से जुड़ा हुआ है. उत्पीड़ित लोग भारत में प्रवेश पा सकें और फिर अपना पंजीकरण करा सकें, इसके लिए नागरिकता कानून और पासपोर्ट कानून में बदलाव की जरूरत होगी.
ये बदलाव उन लोगों का भी भारतीय नागरिक बनना आसान बना देंगे, जो पहले से भारत में हैं. यह सब ठीक है.सरकार कानूनों में कैसे वह भाषा शामिल करेगी जो सिर्फ एक खास धर्म को अलग-थलग करेगी? संविधान के अनुच्छेद 14 व 15 कहते हैं: ‘विधि के समक्ष समता : राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा.
धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर विभेद का निषेध : राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा.’
इस बारे में स्पष्टता के लिए मुङो इतना काफी लगता है. कानून में ऐसा कोई बदलाव कैसे हो पायेगा, मसलन जो बांग्लादेशी ईसाइयों, हिंदुओं, सिखों, यहूदियों वगैरह को तो उत्पीड़न के तहत प्रवास करने के योग्य माने जाने की गुंजाइश बनाये, पर बांग्लादेशी मुसलमानों को छांट दे?
मेरी राय में यह मुमकिन नहीं है, और यदि ऐसा कानून तैयार किया जाता है तो इसे चुनौती दी जायेगी. और यदि इसका आधार धर्म हुआ, तो यह बहुत आसानी से अमान्य करार दे दिया जायेगा. यहां यह दलील दी जा सकती है कि ये कानून केवल उन पर लागू होते हैं, जो पहले से देश के नागरिक हैं, न कि उन पर जो नागरिक बनना चाहते हैं.
लेकिन मुङो लगता है कि इस बिंदु पर बिल्कुल स्पष्ट नजीरें मौजूद होंगी और इन कानूनों से किसी को अलग-थलग रख पाना संभव नहीं होगा.
मेरी समझ से दूसरा स्वाभाविक सवाल है : इसलामी देशों से मुसलमान क्यों भागना चाहेंगे? इसका जवाब है, बहुत से मुसलमान ऐसा कर रहे हैं. सीरिया से लेकर इराक और लीबिया तक से लाखों लोग पहले से भाग रहे हैं.
ऐसी बहुत सी वजहें हैं, जिनके चलते किसी का उत्पीड़न व्यक्तिगत रूप से हो सकता है. हमारे खित्ते में, ‘मुसलमान’ होना किसी की पहचान का सिर्फ एक हिस्सा है. उन्हें शिया, अहमदिया, औरत, कम्युनिस्ट, धर्म को छोड़ देनेवाला, समलिंगी, नास्तिक, ईशनिंदक होने और अन्य अनेक कारणों से निशाना बनाया जा सकता है.
अब भी एक धर्मनिष्ठ सुन्नी व्यक्ति इसलामी धार्मिक सत्ता वाले राज्य को खारिज करनेवाला हो सकता है, और मैं पाकिस्तान में ऐसे कई सारे लोगों को जानता हूं. मसलन, क्या नया कानून पाकिस्तान अहमदिया को अपने दायरे से बाहर रखेगा, जो यह कहता है कि वह काननू द्वारा उत्पीड़ित है, क्योंकि उसे सरंक्षण के अयोग्य ठहराया हुआ है?
यकीनन उन देशों में कुछ लोग यह दलील दे सकते हैं कि खुद भारत का इतिहास अपने कुछ अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का है. उदाहरण के लिए 1984 में दिल्ली में सिखों पर हुआ जुल्म. लेकिन अभी के लिए उस दलील को छोड़ देते हैं. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेश मंत्रालय ‘गृह मंत्रालय को आगाह कर चुका है कि यह कदम भारत के अपने पड़ोसियों के साथ रिश्तों को नुकसान पहुंचा सकता है.
फिर भी, राजनीतिक फैसला लिया जा चुका है.’ मैं बस उम्मीद करता हूं कि यह फैसला लेते समय उन बिंदुओं को ध्यान में रखा गया होगा, जिनकी हमने ऊपर चर्चा की है. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा, यदि सरकार की नेकनीयत कोशिश हमारे संविधान के बुनियादी सिद्धांतों की अनेदखी करके आगे बढ़ेगी.
(अनुवाद : सत्य प्रकाश चौधरी)
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