सब कुछ टूटता-बिखरता हुआ

घर, परिवार, समाज, मैत्री, प्रेम, विश्वास, आस्था, उम्मीद, संबंध- सब टूट कर बिखर रहा है. एक अंधानुकरण में लिप्तता भयावह है. यह एक भूकंपकारी स्थिति है-स्वनिर्मित. हम सब मंझधार में फंसे और घिरे लोग हैं. हमारी बाह्येंद्रियों की एक सीमा है. हमारी आंखें बहुत दूर तक नहीं देख पातीं और न श्रवणोंद्रिय उन ध्वनियों को […]
गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ और अरविंद ने ‘फाउंडेशंस ऑफ इंडियन कल्चर’ में सभ्यता और संस्कृति के प्रश्नों को अधिक महत्व दिया था. बाद में आर्थिक-सांस्कृतिक प्रश्न गौण हुए और राजनीतिक प्रश्न प्रमुख बने. गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ में आधुनिक सभ्यता को पतन का प्रमुख कारण माना, जिसमें बाहरी दुनिया की खोज और शारीरिक सुख ही प्रमुख है. आधुनिक सभ्यता को उन्होंने तकनीकी विकास से जोड़ कर देखा था. आज तकनीकी विकास शीर्ष पर है, जिसने लोगों के जीवन में सुविधाओं का अंबार खड़ा कर दिया है. आजादी के समय ही गांधी ने कांग्रेस में सत्ता-लोलुपता देखी थी- बाद में प्राय: सभी राजनीतिक दलों में उन्नीस-बीस के अंतर से यह फैल गयी.
तकनीकी विकास के साथ-साथ सत्ता-लोलुपता बढ़ती गयी है. ‘विकसित’ और ‘विकासशील’ देश में ‘विकास’ का अर्थ औद्योगिक-तकनीकी विकास है, जिसका सारा ढांचा यूरोपीय-अमेरिकी है. गांधी ने ‘भारत की आत्मा’ की बात कही थी और भारत के लिए यह खतरा माना था कि वह अपनी आत्मा खो बैठे. उनके लिए भारत की आत्मा का पुनराविष्कार प्रमुख था और नेहरू के लिए यूरोपीय ढंग से नवीनीकरण. न तो पुनराविष्कार हुआ और न नवीनीकरण. नेहरू का स्वप्न औद्योगिक भारत का स्वप्न था. टैगोर के लिए मूल्य (वैल्यू) प्रमुख था. उन्होंने चिंतन और क्रिया की जिस स्वाधीनता पर बल दिया, स्वतंत्र भारत में वह स्वाधीनता दुर्लभ हो गयी. भारत के नीति-निर्माताओं ने अपनी पश्चिमोन्मुखी, अमेरिकीन्मुख दृष्टि को ही सवरेपरि माना. आजादी के बाद कोई नयी संरचना-भारतीय संरचना निर्मित नहीं की गयी.
जीवन कहीं अधिक यांत्रिक हो गया है. औपचारिकता, प्रदर्शन, कृत्रिमता, दिखावा सब चरम पर है. वह जो एक धागा लोगों को आपस में जोड़े रखता था, टूट रहा है. भारत एक भंवर में फंसा हुआ है. लोकतंत्र के सभी पाये बुरी तरह से हिल रहे हैं. वे भीतर से कमजोर हो चुके हैं. होड़ा-होड़ी, छीना-झपटी, लूट-खसोट, मार-धाड़ कम नहीं है. हत्या और आत्महत्या की संख्या बढ़ रही है. अकेलापन बढ़ रहा है, पारिवारिकता, सामाजिकता, सामुदायिकता घट रही है. क ल का जो भी पारिवारिक, मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा अपनी जड़ों से विच्छिन्न होता जा रहा है. जो जीवनशैली हमने विकसित की है, वह निहायत अश्लील, भद्दी, नकली, कृत्रिम, दिखावटी और सतही है. सांस्कृतिक क्षरण सर्वाधिक है. घर टूट रहा है, संबंधों में दूरी आ चुकी है और बाजार हमें नियंत्रित-संचालित कर रहा है. यह प्रक्रिया क्षरण और अलगाव की जारी है-सब कुछ जो अब तक मूल्यवान था-घर, परिवार, समाज, मैत्री, प्रेम, विश्वास, आस्था, उम्मीद, संबंध- सब टूट कर बिखर रहा है. एक अंधानुकरण में लिप्तता भयावह है. यह एक भूकंपकारी स्थिति है-स्वनिर्मित. हम सब मंझधार में फंसे और घिरे लोग हैं. एकल परिवार में एक-दूसरे के बारे में सोचनेवाले कम हैं. एक-दूसरे के साथ जीने का, सहारा देने का परंपरागत मूल्य नष्ट हो रहा है.
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