धर्म का विवेकानंद मार्ग
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :12 Jan 2015 5:51 AM (IST)
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मतिभ्रम के कारण आज तक मनुष्यों ने धर्म के नाम पर बहुत खून बहाया है. स्वामी विवेकानंद का मत था कि सभी धर्म एक ही सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं. एक दिन ऐसा आयेगा, जब राष्ट्र-राष्ट्र का भेद दूर हो जायेगा. यदि एक धर्म सच्चा है, तो निश्चय ही अन्य सभी धर्म भी सच्चे हैं. […]
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मतिभ्रम के कारण आज तक मनुष्यों ने धर्म के नाम पर बहुत खून बहाया है. स्वामी विवेकानंद का मत था कि सभी धर्म एक ही सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं. एक दिन ऐसा आयेगा, जब राष्ट्र-राष्ट्र का भेद दूर हो जायेगा.
यदि एक धर्म सच्चा है, तो निश्चय ही अन्य सभी धर्म भी सच्चे हैं. पवित्रता व दयालुता किसी एक संप्रदाय विशेष की संपत्ति नहीं है. प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय-उन्नत चरित्र स्त्री-पुरुषों को जन्म दिया है. धर्म का मूल तत्व देश-प्रेम और मानव-प्रेम है. ये बातें उन्होंने 11 सितंबर, 1893 को शिकागो में सर्वधर्म सम्मेलन में कही थीं.
उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि यदि मानवों में भक्ति है, तो हिंदू, मुस्लिम, इसाई एवं सिख एक हैं. ईश्वर को सभी पंथों से प्राप्त किया जा सकता है. सभी धर्मो का एक ही सत्य है और वह है जीवन जीने की राह को बताना. भक्तगण भगवान को विभिन्न नामों से पुकारते हैं.
एक तालाब के चार घाट हैं. हिंदू एक घाट पर पानी पी रहे हैं. वे उसे जल कहते हैं. मुसलमान दूसरे घाट पर पानी पीते हैं और वे उसे पानी कहते हैं. तीसरे घाट पर अंगरेज पानी पीते हैं और वे उसे वाटर कहते हैं. कुछ लोग चौथे घाट पर पानी को अक्वा कहते हैं. यही इस दुनिया के धर्म और संप्रदायों के अनुयायियों की सोच-सोच में फर्क है. दुनिया के विभिन्न धर्म और संप्रदाय के लोग अपने-अपने नजरियों से उसका मूल्यांकन कर रहे हैं, लेकिन उनमें से कोई भी सभी धर्मो और संप्रदायों के मूल तत्व की ओर झांकने का प्रयास नहीं कर रहा है.
आज अगर मनुष्यों की सोच में विषमता देखी जा रही है, तो इसका सिर्फ एक ही कारण है और वह मत-विभिन्नता है. आज जरूरत इस बात की नहीं कि धर्म की रक्षा कैसे की जाये. आज मानवता की रक्षा करना अधिक जरूरी है.
लक्ष्मी रानी लाल, जमशेदपुर
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