साहित्य में जातिवाद का कोल्हू

Updated at : 29 Jan 2020 7:14 AM (IST)
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साहित्य में जातिवाद का कोल्हू

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार kshamasharma1@gmail.com कुछ महीने पहले एक आयोजन में मुझे आमंत्रण भेजा गया था. उसमें एक और प्रतिभागी को बुलाया जाना था. आयोजनकर्ताओं ने बड़े संकोच से पूछा- इस सेमिनार में अमुक को बुलाया है. उनके विचारों के कारण आपको उनके साथ मंच पर बैठने में कोई आपत्ति तो नहीं? ऐसा मैं अकसर […]

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क्षमा शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

kshamasharma1@gmail.com

कुछ महीने पहले एक आयोजन में मुझे आमंत्रण भेजा गया था. उसमें एक और प्रतिभागी को बुलाया जाना था. आयोजनकर्ताओं ने बड़े संकोच से पूछा- इस सेमिनार में अमुक को बुलाया है. उनके विचारों के कारण आपको उनके साथ मंच पर बैठने में कोई आपत्ति तो नहीं?

ऐसा मैं अकसर सुनती और देखती आयी हूं कि फलां ने फलां के साथ मंच पर बैठने से मना कर दिया, लेकिन मेरे साथ ऐसा पहली बार हुआ था. मैंने आयोजकों से कहा कि मैं इस तरह के जातिवाद और राजनीति में फैले छुआछूत की घोर विरोधी हूं.

हम किसी भी मंच पर रहें और वहां कोई भी बैठा हो, कहेंगे तो वही जो हमारा विचार है. और वैसे भी कोई भी विचार इकलौता कभी सर्वश्रेष्ठ नहीं होता. हमें जीवनभर अक्सर अपने विचारों से अलग दूसरे विचारों से हमेशा कुछ न कुछ सीखना पड़ता है. किसी से लक्ष्य के प्रति समर्पण तो किसी से अच्छा लिखना, तो किसी से व्यवहार सीखते हैं. हमारे सबसे बड़े शिक्षक वही होते हैं, जो हमारे विरोधी होते हैं.

एक तरफ हम कहते हैं कि हर एक को अपने विचार रखने की आजादी है, लेकिन दूसरे के विचार की रत्तीभर भी कद्र नहीं करते, बल्कि किसी के विरोधी विचारों से सहमत होने की जगह अपनी राय व्यक्त करने की जगह हम उस व्यक्ति को ही अपना सबसे बड़ा शत्रु मान लेते हैं. उसके खिलाफ हर तरह का निंदा अभियान, उसके बहिष्कार से लेकर तरह-तरह की लानतें भेजी जाती हैं.

हालांकि, लानतें भेजनेवाले भी अवसरवादी और विचारों से पिछड़े, फूहड़ और अपने विचारों की तानाशाही में हर तरह से यकीन करनेवाले होते हैं. इन्हें अपने लिए हर तरह की आजादी और विचार का स्वातंत्र्य चाहिए, मगर दूसरे के विचारों के कारण अगर उसकी वैचारिक हत्या भी करनी पड़े, तो इन्हें कोई परहेज नहीं. वोट पाॅलिटिक्स के लिए आज किसी दल के साथ, तो कल किसी दल के साथ. उस पर वैचारिक मुलम्मा चढ़ाने की कवायद आजकल किसी को आकर्षित नहीं करती है.

यह कैसा विचार है, जो अपने लाभ के लिए पल-पल बदलता है, लाभ-हानि के गुणा-भाग में तत्पर रहते हुए खुद को नायक और दूसरों को खलनायक सिद्ध करता है. अफसोस यह है कि इस तरह की घटनाओं को, जातिवादी समीकरणों को बनाने और उसकी मुहिम चलाने में वामपंथी बहुत आगे रहते हैं.

उनमें भी वे साहित्यकार जो बात तो बनाते हैं कि साहित्य सबके लिए होता है, मगर उनके आचरण से लगता है कि उनका लिखा सिर्फ उन्हीं जैसों के लिए है. साहित्यकारों द्वारा बनायी गयी ऐसी लक्ष्मण रेखाएं अकसर देखने को मिलती हैं. उनके इसी छूआछूत ने उन्हें आजकल कहीं का नहीं छोड़ा है. जो विचार लोगों के भले के लिए था, उसे कुछ लोगों ने वामपंथ के नाम पर अपना दास बना लिया है.

समय बदल गया है. दुनियाभर में एक-दूसरे के विचारों से कुछ अच्छा सीखने और करने की होड़ लगी है. मगर हम हैं कि तरह-तरह के जातिवादी कोल्हू में पिस रहे हैं.

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