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मेले की संस्कृति

Updated at : 23 Jan 2020 6:35 AM (IST)
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मेले की संस्कृति

डॉ कविता विकास लेखिका kavitavikas28@gmail.com दिसंबर और जनवरी की ठंड के साथ जो बात सामने आती है, वह है पिकनिक और मेलों का आनंद. समय चाहे जितना बदल जाये, जीने के पैमाने बदल जायें, लेकिन जो क्रियाकलाप मौसम के साथ होते हैं, उनमें कोई कमी नहीं आती है. शरीर को जिस ऊष्मा की तलाश होती […]

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डॉ कविता विकास

लेखिका

kavitavikas28@gmail.com

दिसंबर और जनवरी की ठंड के साथ जो बात सामने आती है, वह है पिकनिक और मेलों का आनंद. समय चाहे जितना बदल जाये, जीने के पैमाने बदल जायें, लेकिन जो क्रियाकलाप मौसम के साथ होते हैं, उनमें कोई कमी नहीं आती है. शरीर को जिस ऊष्मा की तलाश होती है, वह पिकनिक के बहाने पूरी हो जाती है. अब भी संयुक्त परिवार हैं, जहां लोग नौकरी या व्यवसाय की आपाधापी से कुछ क्षण के लिए निजात पाना चाहते हैं. पिकनिक के बहाने वे अक्सर दूर के इलाकों में भी निकल जाते हैं.

पिकनिक या सामूहिक भोज तनाव आदि से छुटकारा पाने का सुलभ साधन है. यह सामूहिकता में जीना सिखाता है और प्रकृति के बीच कुछ पल रहना सिखाता है. चिड़ियों की बोली, नदियों की धारा, झरनों का सुरम्य संगीत और सूरज की गुनगुनी किरणों को मनुष्य अपने जेहन में बसाना चाहता है. साथ रहते हुए भी लोग एक-दूसरे से खूब सारी बातें नहीं कर पाते हैं, पर ऐसे अवसर इस शिकायत को भी दूर कर देते हैं.

मेल-मिलाप की ऐसी ही प्रकृति मेले की संस्कृति में छिपी रहती है. मेला चाहे संक्रांति का हो, राष्ट्रीय पर्वों का हो या फिर किसी संस्था द्वारा आयोजित, यह जीवन के विविध पहलुओं और लघु उद्योगों के सामानों को लोगों तक पहुंचाने का साधन होता है. हमारे देश के हरेक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व के शहरों में अक्सर लगनेवाले मेले उन दुर्लभ वस्तुओं को हम तक पहुंचाते हैं, जो अन्यत्र नहीं मिलते हैं. शांतिनिकेतन का पौष मेला, कुंभ मेला, गंगा घाट का मेला, कार्तिक महीने का सिमरिया मेला आदि उत्तर भारत के प्रसिद्ध मेले हैं, जिनका सबको इंतजार रहता है. इनमें देश-विदेश के पर्यटक भी आते हैं.

मूढ़ी, लावा, गेहूं, चना, मकई और गुड़ आदि के पारंपरिक व्यंजन और पकवानों को लोग इन मेलों में बड़े चाव से खाते हैं. चूड़ी-बिंदी, टिकुली आदि के ठेले महिलाओं के लिए आकर्षण के केंद्र होते हैं. बांस और लकड़ियों के गृह-सज्जा उत्पाद, झूमर-झालर, चीनी-मिट्टी और टेराकोटा के रंग-बिरंगे सामान हमारा ध्यान खींचते हैं. हथकरघे के कपड़े महानगरों में दोगुने-तिगुने दामों में मिलते हैं, उन्हें इन स्थानों पर कम दाम में लिया जा सकता है.

बच्चों का उत्साह इन मेलों में देखते ही बनता है. इस तरह के आयोजन लाखों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़े हैं. खिलौनेवाले, बैलूनवाले और बच्चों को लुभानेवाले गाजे-बाजे आदि ग्रामीणों के रोजगार से संबंधित हैं.

हालांकि, हमारा संभ्रांत वर्ग इस तरह की भीड़-भाड़ से दूर ही रहता है. उन्हें यह जमावड़ा आउटडेटेड लगता है. अपनी संस्कृति के रक्षक तो हमीं हैं और उन्हें प्रोत्साहन देने में अगर हम सक्रियता नहीं दिखलायेंगे, तो कौन दिखलायेगा? इसलिए अगर ऐसे छोटे-छोटे बिक्रेता पिकनिक, मेले या शहर में कहीं मिल जायें, तो उनकी चीजों को अवश्य खरीदें. क्योंकि इनको बनानेवाले लघु उत्पादक अपने पसीने की कमाई को सीधे-सीधे हम तक पहुंचाने के लिए दूर से चल कर आते हैं.

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