बुजुर्गों को सहारे की है जरूरत
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :16 Dec 2019 6:44 AM (IST)
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आशुतोष चतुर्वेदी प्रधान संपादक, प्रभात खबर ashutosh.chaturvedi @prabhatkhabar.in जीवन के दो पड़ाव हैं बचपन और बुढ़ापा, जब हर शख्स को सहारे की जरूरत पड़ती है. मौजूदा दौर में देश में बुजुर्गों की देखभाल एक व्यापक समस्या के रूप में सामने आ रही है. देश में पुरानी सामाजिक व्यवस्था तेजी से टूटती जा रही है और […]
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आशुतोष चतुर्वेदी
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
ashutosh.chaturvedi
@prabhatkhabar.in
जीवन के दो पड़ाव हैं बचपन और बुढ़ापा, जब हर शख्स को सहारे की जरूरत पड़ती है. मौजूदा दौर में देश में बुजुर्गों की देखभाल एक व्यापक समस्या के रूप में सामने आ रही है. देश में पुरानी सामाजिक व्यवस्था तेजी से टूटती जा रही है और नयी व्यवस्था के लिए हम तैयार नहीं हैं. देश में संयुक्त परिवारों का दौर चला गया है. नयी एकल परिवार की व्यवस्था में मां-बाप के लिए कोई स्थान नहीं है.
समाज ने भी बुजुर्गों का सम्मान करना बंद कर दिया है. उनके अनुभव का लाभ उठाने के बजाय उन्हें बोझ समझा जाने लगा है. इसके मद्देनजर केंद्र की मोदी सरकार ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के रखरखाव और कल्याण (संशोधन) विधेयक, 2019 लोकसभा में पेश किया. हालांकि यह इस सत्र में पारित नहीं हो सका. इसमें माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी का विस्तार किया गया है. अब यह जिम्मेदारी सिर्फ बेटे-बेटियों को ही नहीं, बहू और दामाद को भी उठानी होगी.
विशेष परिस्थितियों में नाती-नातिन और पोता-पोती भी देखभाल के लिए कानूनी तौर पर बाध्य होंगे. मतभेद और संपत्ति विवाद को लेकर अक्सर बुजुर्गों के साथ मारपीट तक की जाती है और उनके साथ बेहद बुरा सलूक किया जाता है. इस विधेयक में ऐसे प्रावधान हैं कि अगर बच्चे माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करते हैं अथवा उन्हें अकेला छोड़ देते हैं, तो उनको छह महीने के कारावास या 10 हजार रुपये जुर्माना या दोनों हो सकता है. विधेयक में दुर्व्यवहार को भी परिभाषित किया गया है, जिसमें शारीरिक, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार के साथ-साथ अनदेखी और उन्हें उनके हाल पर छोड़ना शामिल है. इसके अलावा मानसिक कष्ट देना भी दुर्व्यवहार में शामिल है. जो ज्यादा कमाते हैं, नये संशोधन में उन्हें अपने माता-पिता की देखभाल के लिए ज्यादा पैसे देने होंगे.
वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सहायता के दावे दाखिल करने के लिए एक ट्रिब्यूनल की स्थापना का भी प्रावधान है. विधेयक में 80 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों की शिकायत को प्राथमिकता देने की बात कही गयी है. उनके दावों का निबटारा 60 दिन के भीतर किया जायेगा. सिर्फ अपवाद स्वरूप यह अवधि केवल एक बार अधिकतम 30 दिन के लिए बढ़ाई जा सकेगी, लेकिन इसके लिए ट्रिब्यूनल को कारण लिखित में दर्ज करना होगा.
80 साल से कम के वरिष्ठ नागरिकों के दावों का निबटारा ट्रिब्यूनल को 90 दिनों के भीतर करना होगा. साथ ही माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े मामलों के लिए हर पुलिस थाने में एक नोडल अधिकारी तैनात होगा, जो एएसआइ रैंक से नीचे का नहीं होगा. साथ ही हर जिले में वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए एक विशेष पुलिस इकाई होगी, जिसका प्रमुख कम-से-कम डीएसपी रैंक का अधिकारी होगा.
साथ ही भरण-पोषण आदेश के क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार एक भरण-पोषण अधिकारी नियुक्त करेगी. माता-पिता या वरिष्ठ नागरिकों के लिए उक्त अधिकारी समन्वयक के तौर पर कार्य करेगा. विधेयक में सरकार को यह सुनिश्चित करने का अधिकार दिया गया है कि हर सरकारी और निजी अस्पताल में वरिष्ठ नागरिकों के लिए बेड आरक्षित हों और बाह्य चिकित्सा विभाग में उनके लिए अलग पंक्ति की व्यवस्था हो. साथ ही हर राज्य में वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं के लिए अलग से एक हेल्पलाइन नंबर होगा.
बिहार की नीतीश कुमार सरकार इस दिशा में पहले ही कदम उठा चुकी है. अन्य राज्य सरकारों को उसका अनुसरण करना चाहिए. बिहार सरकार ने बेटे-बेटियों से प्रताड़ित होनेवाले माता-पिता को यह अधिकार दिया गया है कि वे डीएम के पास अपील कर सकते हैं. उन्हें परिवार न्यायालय में जाने की जरूरत नहीं होगी. पहले ऐसे मामलों के लिए बुजुर्गों को परिवार न्यायालय में जाना पड़ता था. राज्य सरकार ने ऐसे मामलों की अपील की सुनवाई का अधिकार स्थानांतरित कर डीएम को दिया है.
माता-पिता भरण-पोषण की जिम्मेदारी किसी संतान द्वारा न निभाने पर अनुमंडल स्तर पर एसडीओ की अध्यक्षता में गठित ट्रिब्यूनल में हस्तक्षेप का निवेदन कर सकते थे. एसडीओ के ट्रिब्यूनल के फैसले का पालन नहीं होने पर माता-पिता को जिले के परिवार न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के कोर्ट में अपील के लिए जाना पड़ता था. इन कठिनाइयों को देखते हुए नीतीश सरकार ने अपील का अधिकार डीएम को स्थानांतरित कर दिया है.
इससे यह सुविधा होगी कि समाज कल्याण विभाग माता-पिता व वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं की मॉनीटरिंग भी कर सकेगा. पहले सुनवाई का अधिकार परिवार न्यायालय में होने के कारण विभाग उसकी समीक्षा नहीं कर सकता था. माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 25 (2) में सजा का प्रावधान है. इस प्रकार के अपराध को संज्ञेय और जमानतीय अपराध माना गया है. इसके तहत ट्रिब्यूनल बेटे-बेटी को पैतृक संपत्ति से बेदखल भी कर सकता है.
दरअसल, नयी अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी ने भारत को वैश्विक कर दिया है. हम पश्चिम का मॉडल तो अपना रहे हैं, पर उससे उत्पन्न चुनौतियों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं. जब भारत में वैश्वीकरण का दौर शुरू हुआ था, तो इसके असर के बारे में गंभीर विमर्श नहीं हुआ. अगर वैश्वीकरण के फायदे हैं, तो नुकसान भी हैं. यह संभव नहीं है कि आप विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति दें और आपकी संस्कृति में कोई बदलाव न आए. कुछ समय पहले तक भारत में संयुक्त परिवार की व्यवस्था थी, जिसमें बुजुर्ग परिवार के अभिन्न हिस्सा थे. यह खंडित हो गयी.
नयी व्यवस्था में परिवार एकल हो गये- पति पत्नी और बच्चे. यह पश्चिमी मॉडल है. इसमें माता-पिता का कोई स्थान नहीं हैं. पश्चिम के सभी देशों में परिवार की परिभाषा है- पति-पत्नी और 18 साल से कम उम्र के बच्चे. बूढ़े मां-बाप और 18 साल से अधिक उम्र के बच्चे परिवार का हिस्सा नहीं माने जाते हैं. अगर गौर करें, तो पायेंगे कि भारत में भी अनेक संस्थान और विदेशी पूंजी निवेश वाली कंपनियां परिवार की इसी परिभाषा पर काम करने लगी हैं. सामाजिक व्यवस्था में आये इस बदलाव को हमने नोटिस नहीं किया है.
ऐसा अनुमान है कि भारत में अभी 6 फीसदी आबादी 60 साल या उससे अधिक की है, लेकिन 2050 तक बुजुर्गों की यह संख्या बढ़ कर 20 फीसदी तक होने का अनुमान है. पश्चिम के देशों में बुजुर्गों की देखभाल के लिए ओल्ड एज होम जैसी व्यवस्था हैं, लेकिन भारत में ऐसी कोई ठोस व्यवस्था नहीं है. आगामी कुछ वर्षों में यह समस्या और व्यापक और गंभीर होती जायेगी. इसके समाधान में सरकार और सामाजिक संस्थाओं को जुटना होगा, तभी कोई रास्ता निकल पायेगा.
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