गांधी-मार्ग और एमजी रोड
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 07 Oct 2019 1:46 AM
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रविभूषणवरिष्ठ साहित्यकारravibhushan1408@gmail.com भारत ही नहीं, बाहर के कई देशों में भी महात्मा गांधी के नाम पर एक मार्ग है, जो अपने देश में एमजी रोड के नाम से जाना जाता है. महाराष्ट्र में यह सर्वाधिक है- 12 और नीदरलैंड में ऐसे मार्गों की संख्या 28 है. दक्षिण अफ्रीका में गांधी के नाम के रोड की […]
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रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
ravibhushan1408@gmail.com
भारत ही नहीं, बाहर के कई देशों में भी महात्मा गांधी के नाम पर एक मार्ग है, जो अपने देश में एमजी रोड के नाम से जाना जाता है. महाराष्ट्र में यह सर्वाधिक है- 12 और नीदरलैंड में ऐसे मार्गों की संख्या 28 है. दक्षिण अफ्रीका में गांधी के नाम के रोड की संख्या दो है, जबकि मॉरिशस में छह और संयुक्त राज्य अमेरिका में पांच. बेल्जियम, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, जमैका, हंगरी, ईरान, इटली, जॉर्डन, लेबनान, मेक्सिको, मंगोलिया, सर्बिया, स्पेन, श्रीलंका, टर्की और यूके में गांधी के नाम पर रोड हैं. देश की राजधानी दिल्ली में छह से अधिक रोड हैं गांधी के नाम पर. बड़े धूम-धाम, ताम-झाम, आयोजनादि से गांधी की 150वीं वर्षगांठ मनायी जा चुकी है.
अब यह सवाल करना मुझ जेसे ‘साधारण’ भारतीय नागरिक को आवश्यक लग रहा है कि गांधी-मार्ग और महात्मा गांधी रोड (एमजी रोड) में क्या केवल नाम-साम्य भर नहीं है? गांधी-मार्ग से मेरा मतलब 31 जुलाई, 1958 को आरआर दिवाकर, राजेंद्र प्रसाद और जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्थापित गांधी शांति प्रतिष्ठान से प्रकाशित अहिंसा-संस्कृति के द्वैमासिक पत्र ‘गांधी-मार्ग’ से नहीं है, जिसके संपदाक कुमार प्रशांत पर अगस्त में ओडिशा में दो एफआइअार किये गये.
गांधी-मार्ग का सामान्य अर्थ है- गांधी का मार्ग, वह रास्ता जिस पर गांधी केवल स्वयं एकाकी नहीं चले करोड़ों भारतीयों को राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में अपने साथ चलाया, चलने का एक पथ बनाया. क्या यह पथ हमारे लिए गौण हो चुका है?
गांधी का विचार और जीवन-दर्शन मार्क्स, सावरकर-गोलवलकर, लोहिया, आंबेडकर, बोस- सबसे भिन्न है. वह न तो पूंजीवाद है, न समाजवाद. हम जिसे गांधीवाद कहते हैं, उसे गांधी ने कभी स्वीकार नहीं किया. भारत और विश्व में जितने भी प्रकार के विचार-दर्शन और ‘वाद’ (इज्म) हैं, गांधीवाद उनसे भिन्न है.
गांधी ने साफ शब्दों में यह कहा है कि गांधीवाद जैसी कोई चीज नहीं है. उन्होंने केवल शाश्वत सत्य को दैनिक जीवन और समस्याओं से जोड़ने, लागू करने के प्रयत्न किये. उन्होंने कहा है कि मेरे पास दुनिया को सिखाने के लिए कुछ नहीं है. सत्य और अहिंसा उतने ही प्राचीन हैं, जितने पर्वत. गांधी एक बड़े पर्वत की तरह हैं और हम सब अपनी आंखें ऊपर उठाकर उन्हें बार-बार निहारते हैं- कभी अकेले कभी समूह में.
नागार्जुन ने उन्हें यों ही 1948 की अपनी एक कविता में- ‘निविड तिमिर में जाज्वल्यमान’ और ‘व्यक्ति-व्यक्ति के मन मंदिर में विद्यमान’ नहीं कहा था. अब सच यह है कि गांधी अपने ही देश के ‘व्यक्ति-व्यक्ति के मन-मंदिर में विद्यमान’ नहीं हैं, पर यह पहले से कहीं अधिक सच है कि वे आज के घने अंधकार में केवल केवल भारत के लिए ही नहीं, संपूर्ण विश्व के लिए प्रकाश-स्तंभ हैं. गांधी की पूजा गलत है.
गांधी पत्थर नहीं हैं, जड़ नहीं हैं, उनकी गति के साथ ही हम गतिमान और जीवंत हो सकते हैं. गांधी का नाम-जाप कहीं-न-कहीं अपने को ठगने और दूसरों को भरमाने-भटकाने के लिए भी है. ‘हम तुम्हें नहीं ठग सकते हैं/ यह अपने को ठगना होगा/ शैतान आयेगा रह-रह हमको भरमाने/ अब खाल ओढ़कर तेरी सत्य-अहिंसा का/ एकता और मानवता के.’
एमजी रोड पर सभी चलते हैं, लेकिन महात्मा गांधी रोड पर चलनेवालों में कितने गांधी-मार्ग के पथिक हैं? गांधी-मार्ग सत्य और अहिंसा का मार्ग है. आज हिंसा नृत्य कर रही है और झूठों की विपुल संख्या है. गांधी के इस्तेमाल से अपनी छवि बनाने-चमकानेवालों की कमी नहीं है. गांधी के प्रशंसक गांधी-मार्ग के पथिक हों, जरूरी नहीं है. गोडसे ने गांधी को गोली मारने से पहले झुककर प्रणाम किया था.
गांधीवाद के दो प्रमुख स्तंभ हैं- सत्य और अहिंसा. राजनीति में इन दोनों स्तंभों के लिए कोई जगह नहीं है, पर गांधी ने इसे राजनीतिक अस्त्र बनाया. वे सबसे बड़े राजनीतिज्ञ थे. उनका जीवन आदर्शमय था, पर एक राजनीतिज्ञ की हैसियत से गांधी कहीं अधिक प्रैक्टिकल-टैक्टिकल थे.
उन्होंने सत्य को नरसंहार के किसी भी बड़े हथियार से कहीं अधिक शक्तिशाली बना दिया था. सत्य और अहिंसा पर आधारित उनके विचार-दर्शन और जीवन-दर्शन से आज की राजनीति का कोई संबंध नहीं है. दो व्यक्ति, दो समुदाय, दो संप्रदाय, दो धर्म, दो राष्ट्र में भिन्नता हो सकती है, लेकिन वहां हिंसा को स्थान देना सबको आग की भट्टी में झोंक देना है. गांधी ने हिंसा, भीड़ हिंसा और कायरता को कभी महत्व नहीं दिया.
स्वाधीन भारत में कई रंगों की सरकारें आयीं और गयीं, लेकिन किसी सरकार ने उनके जीवन-दर्शन से कुछ भी नहीं सीखा. धनपशु, परिग्रही, उपभोगी, घोर व्यावसायिक-व्यावहारिक गांधी को नहीं समझ सकते. गांधी पर लिखना-बोलना, भाषण-वक्तव्य देना जितना सरल है, उतना ही अधिक कठिन है उनके विचारों को अपने जीवन-आचरण में उतारना. गांधी के यहां श्रम-परिश्रम प्रमुख था. शारीरिक श्रम न करनेवाले गांधी को कैसे समझेंगे.
बार-बार हम सब कहते आ रहे हैं गांधी जरूरी हैं, प्रासंगिक हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो अक्तूबर को ‘द न्यूयार्क टाइम्स’ के अपने लेख ‘इंडिया एंड द वर्ल्ड नीड गांधी’ में गांधी के स्वप्न को उनके प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो’ में व्यक्त माना है. दूसरों को पीड़ा पहुंचानेवाला अपने विरोधियों को ‘राष्ट्रद्रोह’ कहनेवाला क्या कोई गांधी के मार्ग का पथिक हो सकता है? वह गांधी-मार्ग का पथिक नहीं, एमजी रोड पर चलनेवाले लाखों लोगों में बस एक है.
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