नयी रणनीतियां अपनायें बैंक
Updated at : 25 Sep 2019 12:42 AM (IST)
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डॉ निशिकांत दुबे सांसद, लोकसभा delhi@prabhatkhabar.in वर्ष 2006-2008 में यूपीए सरकार के शासन काल में जब आर्थिक वृद्धि मजबूत थी और विद्युत उत्पादन के संयंत्र जैसे बुनियादी ढांचे की पूर्ववर्ती परियोजनाएं नियत समय तथा बजट में पूरी हो रही थीं, उसी वक्त बड़ी संख्या में ‘बुरे ऋणों’ की शुरुआत हुई. दरअसल, बैंकाें से ऐसे ही […]
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डॉ निशिकांत दुबे
सांसद, लोकसभा
delhi@prabhatkhabar.in
वर्ष 2006-2008 में यूपीए सरकार के शासन काल में जब आर्थिक वृद्धि मजबूत थी और विद्युत उत्पादन के संयंत्र जैसे बुनियादी ढांचे की पूर्ववर्ती परियोजनाएं नियत समय तथा बजट में पूरी हो रही थीं, उसी वक्त बड़ी संख्या में ‘बुरे ऋणों’ की शुरुआत हुई. दरअसल, बैंकाें से ऐसे ही समय में गलतियां हो जाती हैं.
वे पिछले परिणामों के आगे भी जारी रहने की आशा करते हुए परियोजनाओं की पूंजी में प्रवर्तकों के कम शेयरों तथा अधिक उधार राशियों को भी स्वीकार कर लेते हैं. कई बार तो उन्होंने जरूरी जांच-परख को ताक पर रख प्रवर्तकों के निवेश बैंकों की रिपोर्ट के आधार पर ही उन्हें बड़ी ऋण राशियां मंजूर कर दीं. अर्थव्यवस्था के ऐसे दौर में पूरे विश्व में ऐसी गलतियां की जाती हैं.
यूपीए के शासन काल में सियासी प्रणाली भ्रष्टाचार से भरी थी, पर बैंकरों की लापरवाही, अक्षमता तथा भ्रष्टाचार को एक-दूसरे से पृथक कर पाना कठिन होता है. तब बैंकर अति आत्मविश्वास से भरे हुए थे और उन्होंने इनमें से कुछ ऋणों के मामले में बहुत कम जांच-पड़ताल की.
बहुतों ने तो कोई स्वतंत्र विश्लेषण तक न कर, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अथवा आईडीबीआई द्वारा इन मामलों में निर्धारित की गयी सीमा रेखाओं को ही मान लिया. विश्लेषणों के मामलों में इस तरह अन्य विश्लेषकों पर यकीन करना प्रणाली की कमजोरी प्रदर्शित करते हुए अनुचित प्रभावों की संभावनाओं के द्वारा खोल देता है.
प्रारंभिक ऋणों के भुगतान के बाद भी बैंकरों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा. ऐसे धोखेबाज प्रवर्तकों पर लगाम की कोई व्यवस्था नहीं थी, जिन्होंने पूंजीगत उपकरणों की लागत बढ़ा-चढ़ा कर दिखायी. जब प्राइवेट सेक्टर के बैंक ऐसी परियोजनाओं से अपने हाथ खींच रहे थे, उस वक्त भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक उन्हें वित्त उपलब्ध कराते रहे.
इससे स्प्ष्ट है कि बैंकों का मॉनिटरिंग तंत्र कमजोर था. बहुत सारे बैंकरों ने प्रारंभिक ऋणों की असफलता तथा प्रवर्तकों की नीयत संदेहास्पद होने के बाद भी उन्हें आगे और ऋण देते जाना जारी रखा. अंत में, ऊंचे रसूख वाले प्रवर्तकों को भी बहुत सारे ऋण दिये गये, जबकि ऋण लेकर उन्हें न चुकाने की उनका एक इतिहास रहा है.
मैं समझता हूं कि किन्हीं खास ऋणों के लिए बैंकरों को जिम्मेदार ठहराने की बजाय बैंक के निदेशक मंडल तथा अन्वेषण एजेंसियों को चाहिए कि वे ऐसे ऋणों के लिए जिम्मेदार किसी खास बैंक सीईओ के समय दिये गये बुरे ऋणों में एक पैटर्न की तलाश करें. इसके बाद उस सीईओ की बेनामी संपत्ति की जांच भी होनी चाहिए, ताकि भ्रष्टाचार को लेकर एक स्पष्ट राय कायम की जा सके.
सरकार को सिर्फ पिछले संकट पर ही ध्यान केंद्रित करने की बजाय, अगले संकट की जड़ों पर गौर करना चाहिए. सरकार को चाहिए कि वह महत्वाकांक्षी ऋण लक्ष्य तय करने अथवा ऋणों को माफ करने से बाज आये. इस संबंध में इन कुछ बिंदुओं पर गौर किया जाना चाहिए:
कई बार जरूरी जांच-पड़तालों को शिथिल करते हुए ऋण लक्ष्य तय किये जाते हैं, जो भविष्य के ‘डूबे ऋणों’ के अनुकूल वातावरण तैयार करता है. हालांकि मुद्रा ऋण तथा किसान क्रेडिट कार्ड दोनों लोकप्रिय हैं, पर ऋण जोखिम के विरुद्ध उनकी ज्यादा गहरी जांच की जरूरत है. सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों के लिए सिडबी द्वारा संचालित ऋण गारंटी योजना भविष्य में अधिकाधिक जोखिम की वजह बनती जा रही है और इसकी तत्काल पड़ताल की जरूरत है.
जैसा आरबीआई ने बार-बार कहा है, ऋण-माफी ऋण संस्कृति को विषाक्त कर माफ करनेवाली राज्य अथवा केंद्रीय सरकार के बजट को संकट में डाल देती है. कृषि पर गंभीरता से गौर करने की जरूरत है, पर ऐसा ऋण-माफी द्वारा नहीं किया जाना चाहिए. चूंकि कई राज्यों में चुनाव निकट हैं, अतः इस संबंध में एक सर्वदलीय सहमति बनाना राष्ट्रीय हित में होगा.
गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों का संकट बुरे ऋणों का एक नया भय पैदा कर रहा है, चूंकि अब अधिकाधिक पंगु बैंक बुरे ऋणों की गर्त से बाहर निकल रहे हैं, वृद्धि की बढ़ती सुस्ती तथा गैर-बैंकिंग ऋण-प्रदाताओं का लंबा खिंचता संकट उनकी परिसंपत्तियों की गुणवत्ता पर ताजा चुनौतियां खड़ी करता है.
अंततः, लेखा संधारण (एकाउंटिंग) तथा रिपोर्टिंग की बजाय ये गुणवत्ताविहीन ऋण-प्रक्रियाएं ही हैं, जो वित्तीय संकट पैदा करती हैं. इसके निवारण के लिए बैंकों द्वारा समस्यामूलक ऋणों एवं साख घाटे की ससमय पहचान तथा सारी प्रक्रियाओं में इतनी पारदर्शिता कि बाजार, विनियामकों एवं अन्य के द्वारा उसे भलीभांति समझा जा सके, ऐसे संकटों को रोकने के लिए अहम हैं.
जैसा हमने देखा है, बैंकों को एकाउंटिंग, विनियामकीय तथा कर विचारण द्वारा इसके लिए कई तरह से प्रोत्साहित किया जा सकता है कि खासकर तब, जब आर्थिक माहौल अपेक्षाकृत नरम हो, समस्यामूलक ऋणों की पहचान तथा उनके विरुद्ध राशियां सुरक्षित रखने की प्रक्रिया (प्रावधानीकरण) कैसे तय की जाये कि इनमें कमी लायी जा सके.
अपेक्षित नुकसानों की शीघ्र पहचान से बैंकों को फिर से संभलने, अपने बैलेंस शीट पर संकट के प्रभाव को कम करने और उस मंदी की संभावनाओं में कमी लाने में मदद मिलती है, जिसके नतीजतन एक ऐसा ऋण संकट पैदा होता है, जो वर्षों और कभी-कभी तो दशकों तक बना रहता है.
प्रावधानीकरण पर विचार करने के पूर्व ही पारदर्शी, समझ में आने योग्य तथा आर्थिक रूप से सार्थक कसौटियों पर समस्यामूलक ऋणों की पहचान की जाने की जरूरत है. मगर इसके विषय में अभी कोई भी आम सहमति नहीं हो सकी है कि ये कसौटियां क्या हों? इसी तरह, परिसंपत्तियों के वर्गीकरण के लिए भी अधिक स्वीकार्य प्रक्रिया की जरूरत है.
सरकार को भी एक त्रिमुखी रणनीति अपनानी चाहिए. पहली, दबावग्रस्त प्रवर्तकों तथा सरकार के बीच संवादहीनता की स्थिति लगती है, जिसे हर सेक्टर के लिए विशिष्ट कार्यबल का गठन कर सुलझाया जा सकता है. दूसरी, कार्यबल को हर सेक्टर के लिए खास मुद्दों से निपटने के तरीके सुझाने चाहिए.
तीसरी, इस तथ्य पर स्पष्टता होनी चाहिए कि दिवाला एवं दिवालियापन संहिता ‘डूबे ऋणों’ से निपटने का कोई दीर्घावधि समाधान नहीं है और इसका कोई विकल्प भी तलाशा जाना चाहिए. बैंक परिसंपत्तियों की प्रकृति तथा गुणवत्ता को समझा जाना बैंकिंग प्रणाली के स्वास्थ्य की कुंजी है और इसलिए इस क्षेत्र में पारदर्शिता वित्तीय स्थिरता हेतु अनिवार्य है.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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