कमान संभालने को तैयार है तीसरी पीढ़ी

Updated at : 30 Aug 2019 7:57 AM (IST)
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कमान संभालने को तैयार है तीसरी पीढ़ी

प्रभु चावला एडिटोरियल डायरेक्टर द न्यू इंडियन एक्सप्रेस prabhuchawla @newindianexpress.com ईश्वर रहस्यमय तरीके से काम करता है. बहुत से लोग, जो सीमाओं के पार चले जाते हैं, दैवत्व प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन उनका स्थान सर्वशक्तिमान द्वारा चुने गये लोग भी प्राप्त कर लेते हैं. कई ऐसे भी हैं, जो विकल्प के अभाव में पड़े […]

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प्रभु चावला
एडिटोरियल डायरेक्टर
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस
prabhuchawla
@newindianexpress.com
ईश्वर रहस्यमय तरीके से काम करता है. बहुत से लोग, जो सीमाओं के पार चले जाते हैं, दैवत्व प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन उनका स्थान सर्वशक्तिमान द्वारा चुने गये लोग भी प्राप्त कर लेते हैं. कई ऐसे भी हैं, जो विकल्प के अभाव में पड़े रहते हैं और दैवीय हस्तक्षेप की प्रतीक्षा कर रहे हैं. दैवीय इच्छाएं हमारी राजनीति में भी दुखी प्रशंसकों और विरोधियों की बड़ी संख्या छोड़ जाती हैं, जैसे कुछ परेशान संस्थान भी इस नुकसान की भरपाई के लिए कुछ समय तक जूझते रहते हैं.
पिछले हफ्ते भाजपा को अपने सबसे बड़े नेताओं में से एक अरुण जेटली के असमय निधन का त्रासद झटका झेलना पड़ा. महज 66 वर्ष के जेटली ने अपने 45 वर्ष के सक्रिय राजनीतिक जीवन में अनेक संघर्ष जीते और हारे.
लेकिन बीते 15 वर्षों से वे प्रकृति की प्रतिकूल रासायनिक प्रक्रियाओं से लड़ाई लड़ रहे थे, जिनके कारण उन्हें दिल के दौरा से लेकर उत्तकों की विकृति तक झेलनी पड़ी थी. हालांकि, उन्हें अपने बुद्धि, चातुर्य और कुशल मीडिया प्रबंधन के कारण अपने विरोधियों को मात देने में महारत हासिल थी, लेकिन मौत की क्रूरता ने उनकी सौम्य आवाज को बाधित कर दिया. उनके निधन से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना एक ऐसा दोस्त खो दिया, जिसने अशांत समुद्र और तूफानी आसमान से बहादुरी से निकालते हुए उनकी नैया पार लगायी. भाजपा के वरिष्ठ नेताओं पर भगवान कभी दयावान नहीं रहे हैं.
साल 2006 के बाद से इसके अनेक चतुर सेनानी, जोशीले योद्धा, व्यावहारिक नेतृत्वकर्ता और प्रबंधकीय गुणों से युक्त नेताओं की असमय मृत्यु हुई है. ये सभी 60 वर्ष के आसपास थे और राजनीति में अभी इन्हें लंबी पारी खेलना था. इनमें प्रमोद महाजन, अनिल दवे, मनोहर पर्रिकर, गोपीनाथ मुंडे, अनंत कुमार, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली शामिल हैं. मौत के हाथों जानेवाले पहले योद्धा प्रमोद महाजन थे, जिन्हें वाजपेयी और आडवाणी के बाद भावी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर देखा जाता था.
इससे पहले कि वे विलय और अधिग्रहण के मामले में अपनी विशेषज्ञता का विस्तार करते या कॉरपोरेट को घुटने टेकने पर मजबूर करते, उनके भाई ने उनकी जान ले ली. जटिल सरकारी मुद्दों को संभालने के मामले में वे असाधारण रूप से प्रतिभाशाली थे. इस मामले में वाजपेयी-आडवाणी के बाद की पीढ़ी के नेताओं में केवल वे ही समान रूप से विश्वासी थे. महाजन के बाद पिछड़े वर्गों के बड़े नेता और उनके रिश्तेदार गोपीनाथ मुंडे की मृत्यु हुई, जो पूर्व केंद्रीय मंत्री और महाराष्ट्र में भाजपा के सबसे शक्तिशाली नेता थे.
इतिहास ने महापुरुष अटल बिहारी वाजपेयी, असाधारण रूप से लोकप्रिय सुषमा स्वराज, सांगठनिक दक्षता वाले अनंत कुमार और गोवा के दूरदर्शी मनोहर पर्रिकर का मृत्युलेख लिखा. इन सभी में कुछ न कुछ अद्वितीय गुण थे, जिसने खासो-आम को पार्टी से जोड़ा और उसे मारक क्षमता प्रदान की.
वे सामूहिक रूप से पार्टी का चेहरा, स्तंभ और वैचारिक पथ-प्रदर्शक थे. कड़ी मेहनत और राजनीतिक कौशल से इनके व्यक्तित्व ने पार्टी के भीतर और बाहर के नेताओं को बौना कर दिया. साथ मिलकर इन्होंने सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने का नेतृत्व किया और यह सुनिश्चित किया कि नरेंद्र मोदी जैसे उत्तराधिकारी भारत को हिमालय जैसी ऊंचाइयों पर ले जाएं और भारत के दो तिहाई हिस्से को अपने प्रभुत्व में लायें. मृत्यु की बारंबारता भाजपा के रथ को रोक नहीं सकती.
अपने मंत्रमुग्ध कर देनेवाले संदेशों और सुशासन से मोदी ने साबित किया है कि न केवल अपने प्रमुख नेताओं के दुख को झेलने, बल्कि प्रतिभाशाली और समर्पित नेताओं को प्रस्तुत करने के लिए भी वह तैयार हैं. साठ से अधिक आयु के अपने नेतृत्व के साथ, भाजपा की तीसरी पीढ़ी भविष्य की कमान संभालने के लिए तैयार है.
मोदी ने युवा नेताओं को महत्वपूर्ण विभागों के साथ पदाधिकारी, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के रूप में चुना है. किसने सोचा था कि गुजरात में मोदी सरकार के अंतर्गत एक सामान्य मंत्री के रूप में काम कर चुके अमित शाह सबसे सफल पार्टी प्रमुख और गजब के प्रभावी केंद्रीय मंत्री बन पायेंगे? भाजपा के आधे से अधिक मुख्यमंत्री 50 वर्ष से कम उम्र के हैं. पार्टी की सफलता का रहस्य वंशावली और वंशवाद की मजबूरियों की बजाय योग्यता-आधारित उत्तराधिकार में निहित है.
भाजपा के विपरीत कांग्रेस, जिसने अतीत में अपने कई सारे लोकप्रिय नेताओं को खो दिया था, सफल उत्तराधिकारी देने में विफल है. जहां एक ओर राष्ट्रीय स्तर पर इसका नेतृत्व एकमात्र गांधी परिवार से संबंधित रहा, वहीं राज्य के एक भी नेताओं को इस बात की अनुमति नहीं थी कि वे किसी कद्दावर नेता की मृत्यु पर अबाधित रूप से पार्टी की कमान संभाल सकें. विलासराव देशमुख की मौत के बाद कांग्रेस महाराष्ट्र में उनके जैसा उत्कृष्ट और विश्वसनीय नेता पैदा नहीं कर सकी.
उत्तर प्रदेश में अभी भी ऐसे नेता की तलाश है, जिसकी अपने जिले में ही स्वीकृति हो, पूरे प्रदेश की बात तो जाने दीजिए. कभी कांग्रेस में हेमवंती नंदन बहुगुणा, वीपी सिंह, नारायण दत्त तिवारी, के कामराज, वाइएस रेड्डी, भजन लाल, जगन्नाथ मिश्र, शीला दीक्षित, नंदिनी सत्पथी, चिमनभाई पटेल, के करुणाकरण सरीखे नेता थे. इनमें से ज्यादातर का या तो निधन हो गया है, या वे पार्टी छोड़कर चले गये, क्योंकि गांधी परिवार इस पर अपना नियंत्रण मजबूत करने में व्यस्त था.
इसके उलट भाजपा ने अपने संगठन के आधार को विस्तार देने और शासन एवं विचारधारा के वैकल्पिक मॉडल की पेशकश की दोहरी नीति को अपनाया. कांग्रेस कभी संगठन-आधारित पार्टी नहीं रही, उसने अपने व्यापक समर्थन को खोना शुरू किया और उसे पलायन का सामना करना पड़ा. कांग्रेस का नुकसान भाजपा का फायदा था, जिसने दिल्ली की सत्ता का राष्ट्रवादी मार्ग प्रशस्त किया.
किसी भी संगठन के प्रभुत्व को बनाये रखने के लिए अच्छे व्यक्ति की मौत की भरपाई बेहतर नेतृत्व से करनी चाहिए. पुनर्जन्म पर भगवद्गीता का कहना है, जैसे कोई आत्मा पुराने वस्त्रों को बदलकर नये वस्त्र धारण करती है, आत्मा नये भौतिक शरीर को अपना लेती है, पुराने और अनुपयोगी को त्याग देती है.
निरंतर चक्र के रूप में नेतृत्व का बदलाव ही मोदी के नेतृत्ववाली 38 वर्षीय भाजपा की जीवनी शक्ति है- 135 वर्षीय पुरानी पार्टी के विपरीत, जो अानुवंशिक रूप से अतीत में ठहरी हुई है. ठीक उसी तरह जैसे शोकगीत अपनी ऊर्जा को दबा देते हैं.
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