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योगेंद्र यादव अध्यक्ष, स्वराज इंडिया yyopinion@gmail.com क्या हरियाणा और पंजाब के मसले को हिंदुस्तान और पाकिस्तान के झगड़े की तरह लड़कर निपटाया जायेगा? या कि इस मसले को दोनों प्रदेश और पूरे देश के हित को ध्यान में रखते हुए सुलझाया जायेगा? आज यह सवाल सिर्फ हरियाणा और पंजाब के नागरिकों के सामने ही नहीं […]

योगेंद्र यादव
अध्यक्ष, स्वराज इंडिया
yyopinion@gmail.com
क्या हरियाणा और पंजाब के मसले को हिंदुस्तान और पाकिस्तान के झगड़े की तरह लड़कर निपटाया जायेगा? या कि इस मसले को दोनों प्रदेश और पूरे देश के हित को ध्यान में रखते हुए सुलझाया जायेगा? आज यह सवाल सिर्फ हरियाणा और पंजाब के नागरिकों के सामने ही नहीं पूरे देश के सामने मुंह बाये खड़ा है.
बहुत समय बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक मौका दिया है इस मसले को हमेशा के लिए सुलझाने का. क्या इन दोनों प्रांतों में ऐसे नागरिक, बुद्धिजीवी संगठन और राजनेता हैं, जो इस मौके का फायदा उठा सकें या कि हमेशा की तरह यह मसला फिर से छिछली राजनीति के टुच्चे वाक युद्ध, झूठे वाद-विवाद और नकली झगड़े में उलझकर रह जायेगा?
बीते नौ जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा राज्य सरकारों के बीच नदी जल के बंटवारे के पुराने मुकदमे पर एक महत्वपूर्ण आदेश दिया.
इस मामले में पुराने आदेश को लागू करवाने की बजाय सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों राज्यों को आदेश दिया कि वे मिल-बैठकर बात करें और कोई समाधान निकालने की कोशिश करें. कायदे से तो यह प्रयास बहुत पहले होना चाहिए था, लेकिन अफसोस कि इतने वर्ष तक दोनों राज्यों के बीच ऐसी पहल नहीं हो पायी. जो काम नेताओं, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को करना चाहिए था, वह काम सुप्रीम कोर्ट को करना पड़ा.
दरअसल, रावी और व्यास नदी के पानी के बंटवारे को लेकर हरियाणा और पंजाब सरकार के बीच का यह विवाद उतना ही पुराना है, जितना कि हरियाणा राज्य. यह दोनों सरकारों का झगड़ा है, हरियाणा और पंजाब की जनता का झगड़ा नहीं है. विवाद इतना बड़ा नहीं है जितना बताया जाता है.
सतलुज नदी के पानी के बंटवारे को लेकर कोई भी विवाद नहीं है. रावी-व्यास के पानी को लेकर विवाद दो बिंदुओं पर है. पहला तो यह कि रावी-व्यास में कुल पानी कितना है. और दूसरा यह कि उसमें पंजाब का कितना हिस्सा होना चाहिए. चूंकि यह विवाद नहीं सुलझा है, इसलिए सतलुज यमुना लिंक कैनाल (एसवाइएल) अटकी हुई है.
पिछले कई साल से मैं हरियाणा और पंजाब दोनों राज्यों के संजीदा नागरिकों से अपील कर रहा हूं कि हमें मिल-बैठकर इस विवाद का समाधान निकालना चाहिए. मेरा सुझाव यह रहा है कि हरियाणा सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये अपने कानूनी हिस्से में से कुछ अंश पंजाब के लिए छोड़ने पर सहमत हो जाये और उसके बदले में पंजाब सरकार एक निश्चित समय अवधि में एसवाइएल को बनाने और उसमें पानी के निर्बाध प्रवाह के लिए तैयार हो जाये.
समाधान के लिए पहला कदम हरियाणा की तरफ से आना चाहिए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के 2002 के फैसले के मुताबिक हरियाणा का पलड़ा भारी है. दक्षिण हरियाणा की पानी की जरूरत वाजिब है, लेकिन एसवाइएल को हरियाणा की जीवन रेखा बतानेवाली भाषा सही नहीं है.
सच यह है कि हरियाणा के नेताओं ने एसवाइएल का मुद्दा दबाकर इसलिए रखा हुआ है कि जब चाहे चुनाव में इस्तेमाल किया जा सके. अगर हरियाणा के नेताओं को दक्षिणी हरियाणा की इतनी ही चिंता होती, तो वे पिछले 50 साल में हरियाणा के अपने पानी में से दक्षिण हरियाणा को न्यायसंगत हिस्सा देने का प्रयास करते.
हरियाणा की जनता के हित में यह है कि उसे रावी-व्यास के पानी का जितना भी हिस्सा मिलना है, वह वास्तव में मिल जाये, एसवाइएल बन जाये और यह मामला 20 साल तक और ना लटका रहे. इसलिए पंजाब के साथ बातचीत में हरियाणा को अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से कुछ कम हिस्सा भी स्वीकार करना पड़े, तो उसमें कोई हर्ज नहीं है.
उधर पंजाब के नेताओं ने भी इस सवाल पर भावनाओं को भड़काया है, समाज में उतर फैलाये हैं और कई और संवैधानिक काम किये हैं. इसमें कोई शक नहीं की इंदिरा गांधी ने पानी के बंटवारे पर एकतरफा फैसला देकर पंजाब के साथ अन्याय किया था और मालवा के किसान को अचानक उस पानी से वंचित नहीं किया जा सकता, जिसका इस्तेमाल वह दशकों से कर रहा है.
लेकिन, पंजाब के राजनेताओं को एक भी बूंद हरियाणा और राजस्थान को ना देनेवाली भाषा छोड़नी होगी, पुरानी सरकारों द्वारा किये गये समझौतों का सम्मान करना होगा और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मानना होगा.
इस समाधान में केंद्र सरकार और राष्ट्रीय दलों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी. समय की मांग है कि प्रधानमंत्री दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बैठकर इस पर एक सहमति बनायें.
केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वह रावी-व्यास में बंटवारे के लिए उपलब्ध पानी की पैमाइश करवाये. इसके साथ ही, भारत के हिस्से का जो पानी पाकिस्तान में बह जाता है, उसे बचाकर भी दोनों राज्यों को उपलब्ध करवाया जाये. इसमें सबसे बड़ी भूमिका इस देश की तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों की होगी. पिछले कई दशकों से इन पार्टियों ने दोमुहा रुख अख्तियार कर रखा है. कांग्रेस और बीजेपी की हरियाणा इकाई एक बात करती है, तो पंजाब इकाई ठीक उल्टी बात करती है और राष्ट्रीय नेता चुप्पी बनाये रखते हैं.
पंजाब और हरियाणा तो सिर्फ एक मिसाल है. यही खेल देशभर में खेला जा रहा है. कर्नाटक और तमिलनाडु में कावेरी जल के बंटवारे के विवाद पर भी कमोबेश यही स्थिति है. कर्नाटक की कांग्रेस और बीजेपी इकाई एक भाषा में बोलती है, तो कांग्रेस और बीजेपी की तमिलनाडु इकाई ठीक विपरीत भाषा बोलती है.
इन पार्टियों के राष्ट्रीय नेता राष्ट्रीय महत्व के इन मुद्दों पर कुछ नहीं बोलते. गौरतलब है कि पिछले पांच साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी रावी-व्यास और कावेरी जल विवाद पर दो शब्द भी नहीं बोला. न ही उन्होंने इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों या नेताओं को बैठाकर मामले को सुलझाने की कोई कोशिश की. तमिलनाडु में भयंकर सूखा पड़ता है या असम में भयानक बाढ़ आती है, तब भी हमारी राष्ट्रीय चेतना नहीं जागती.
ऐसा लगता है मानो टीवी स्टूडियो में बैठकर पड़ोसी देशों और अपने देश के कुछ लोगों को गाली देना ही हमारे राष्ट्रवाद की निशानी बन गया है. ये भारतीय राष्ट्रवाद की उदात्त और महान विरासत के पतन के लक्षण हैं. देश के नागरिकों, राज्यों और समुदायों के बीच मनमुटाव और विवादों को सुलझाना एक सच्चे राष्ट्रवाद की पहली कसौटी है.
Prabhat Khabar Digital Desk
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