विधेयक पर आम सहमति की दरकार

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 07 Jul 2019 12:33 AM

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पवन वर्मा लेखक एवं पूर्व प्रशासक तीन तलाक की परिपाटी, जिसके अंतर्गत किसी मुस्लिम पुरुष द्वारा अपनी पत्नी को तीन बार ‘तलाक’ बोलने पर उनके बीच तत्काल तथा अपरिवर्तनीय रूप से तलाक हो जाता है, घृणित है. जैसा बहुत-से इस्लामी देशों में भी हो चुका है, इस व्यवहार का अंत होना ही चाहिए. सुप्रीम कोर्ट […]

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पवन वर्मा
लेखक एवं पूर्व प्रशासक
तीन तलाक की परिपाटी, जिसके अंतर्गत किसी मुस्लिम पुरुष द्वारा अपनी पत्नी को तीन बार ‘तलाक’ बोलने पर उनके बीच तत्काल तथा अपरिवर्तनीय रूप से तलाक हो जाता है, घृणित है. जैसा बहुत-से इस्लामी देशों में भी हो चुका है, इस व्यवहार का अंत होना ही चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने इस परिपाटी पर प्रतिबंध लगा कर एक सही एवं प्रगतिशील कार्य किया है.
चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपना काम पूरा कर दिया है, तो संसद को यह अधिकार है कि वह इसका अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु कानून बनाये. किंतु केंद्रीय कानून मंत्री द्वारा संसद में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019 पेश किये जाने पर वहां जो विवाद पैदा हुआ, उसकी जड़ में इस विधेयक का स्वरूप ही था. इस नये विधेयक में ऐसे प्रावधान हैं, जिन पर सावधानीपूर्ण विचार की जरूरत है.
इसकी धारा 3 में यह कहा गया है कि ‘किसी भी मुस्लिम पति द्वारा अपनी पत्नी को मौखिक, लिखित अथवा इलेक्ट्रॉनिक रूप में तलाक कहना अमान्य तथा गैर-कानूनी होगा.’ यह प्रावधान तो पूरी तरह माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप है. पर इसके बाद अगली ही धारा 4 गंभीर विवाद की वजह बन चुकी है, जो यह कहती है कि ‘कोई भी मुस्लिम पति जो अपनी पत्नी को धारा 3 में संदर्भित तलाक कहता है, तीन साल तक के कारावास के अलावा जुर्माने का भी भागी होगा.’
इसके आगे धारा 7 (क) में विधेयक कहता है कि यह अपराध संज्ञेय होगा, जिसका अर्थ यह है कि किसी आरोपी को एक पुलिस अफसर बगैर किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकता है. ऐसी कोई गिरफ्तारी न केवल उस विवाहित महिला की शिकायत पर संभव है जिसे तलाक कहा गया है, बल्कि खून अथवा वैवाहिक रिश्ते में उस महिला से बंधे किसी भी व्यक्ति द्वारा की गयी शिकायत पर भी यह हो सकती है. इस तरह, न सिर्फ प्रत्यक्ष रूप से पीड़ित महिला, वरन उसके विस्तारित परिवार से भी ऐसी किसी शिकायत पर इतनी व्यापक दंडात्मक शक्ति उसके दुरुपयोग का ही रास्ता साफ करती है.
यह बिंदु खास तौर से इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि धारा 7 (ग) यह कहती है कि ‘ऐसे किसी भी व्यक्ति के द्वारा, जो इस अध्यादेश के अंतर्गत दंडनीय किसी अपराध का आरोपी हो, दायर याचिका पर एक मजिस्ट्रेट द्वारा तब तक जमानत मंजूर नहीं की जा सकती, जब तक वह तलाक बोली गयी उस विवाहित महिला की बातें सुन कर संतुष्ट न हो जाए कि उस व्यक्ति की जमानत मंजूर किये जाने का उचित कारण मौजूद है.’ इस प्रकार, एक ऐसी श्रेणी के अपराध में, जहां जमानत एक आरोपी का अंतर्निहित अधिकार है, उसे कठोर रूप से सशर्त बना दिया गया है.
स्पष्ट तौर पर इरादा तीन तलाक को जुर्माने के अतिरिक्त तीन वर्ष तक के कारावास से दंडनीय अपराध बना देने का है. यहां एक उचित सवाल यह उठता है कि क्या यह आवश्यक है और क्या यह एक भेदभाव नहीं है? पहली बात तो यह है कि इसमें कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां हैं.
प्रस्तावित विधेयक की धारा-5 यह कहती है कि ‘एक विवाहित मुस्लिम महिला, जिसे तलाक कहा गया है, अपने पति से अपने और अपने बच्चों के लिए एक मजिस्ट्रेट द्वारा निर्धारित राशि का गुजारा भत्ता प्राप्त करने की हकदार होगी,’ पर यदि आरोपी पति कारागार में होने की वजह से धनार्जन में असमर्थ हो, तो इस भत्ते का भुगतान वह किस तरह हो सकेगा? दूसरा, इसके भी पर्याप्त कारण नहीं बताये गये हैं कि क्यों यह जुर्म किसी दीवानी कानून के मौजूदा प्रावधान के अंतर्गत दंडनीय नहीं हो सकता? इसे अवश्य ही याद रखा जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट इस परिपाटी को पहले ही प्रतिबंधित कर चुका है.
ऐसे में यदि इस परिपाटी का अस्तित्व अब और ज्यादा रह ही नहीं सकता, तो बात सिमट कर पति द्वारा अपनी पत्नी और बच्चों के ऐच्छिक परित्याग पर चली आती है, पर यह जुर्म सिर्फ मुस्लिम समुदाय में ही नहीं, बल्कि सभी धार्मिक समुदायों में हुआ करता है. ऐसे में क्यों हमें सिर्फ मुस्लिम पतियों को ही वैसे दंड का निशाना बनाना चाहिए, जो खासा कठोर तथा निष्ठुर है?
इस तरह, इस दलील में दम नजर आता है कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, जो सभी नागरिकों को कानून के सामने बराबरी अथवा कानून के समान संरक्षण की गारंटी देती है.
बुनियादी प्रश्न यह उठता है कि हालांकि व्यक्तिगत कानून में कभी-कभी सुधार की जरूरत होती है, पर इसे टिकाऊ और समानतापूर्ण बनाने का क्या तरीका हो सकता है? इस बिंदु पर यह सलाह बिल्कुल प्रासंगिक प्रतीत होती है कि ऐसे किसी कदम के पक्ष में एक व्यापक आम सहमति के आधार पर उसे उठाने से ही वह टिकाऊ एवं सतत वहनीय हो सकता है.
(अनुवाद: विजय नंदन)
‘तीन तलाक’ विधेयक के प्रावधान
मुस्लिम महिला (विवाह अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2019 के अनुसार एक बार में तीन तलाक बोल कर संबंध विच्छेद करना असंवैधानिक है.
इस कानून में लिखित या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से तलाक देने को भी असंवैधानिक माना गया है. ऐसा करने वाले पुरुषों के लिए तीन वर्ष जेल की सजा का प्रावधान है. इसके एक प्रावधान के मुताबिक, एक महिला अपने और अपने नाबालिग बच्चे के ‘निर्वाह भत्ता’ के लिए मजिस्ट्रेट से संपर्क कर सकती है. बच्चे के संरक्षण के मुद्दे पर मजिस्ट्रेट को निर्णय लेने का अधिकार है.
केंद्र सरकार का रुख
केंद्र सरकार का मानना है कि लैंगिक समानता और महिलाओं के सम्मान से किसी भी दशा में समझौता नहीं किया जा सकता है. सरकार के अनुसार तीन तलाक को समानता के अधिकार और भेदभाव के रूप में देखा जाना चाहिए. मूल अधिकारों के तहत संविधान के अनुच्छेद 14 में लैंगिक समानता का प्रावधान है, तो वहीं अनुच्छेद 15 में इस बात का निर्देश है कि महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक तरीके से अधिकार मिलने चाहिए.
तीन तलाक पर तकरार
इस्लामिक नियमों के अनुसार, तलाक बोलने के लिए समय सीमा तय की गयी है. हर बार तलाक बोलने के बीच में अंतराल होता है. इस पूरी प्रक्रिया में महिला के अधिकारों का पूरा ख्याल रखा जाता है. एक बार में ही तीन तलाक कह देने से न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है. इसी मसले को लेकर मुस्लिम महिलाएं और कई संगठन मुखर हैं.
क्या है तीन तलाक
शरिया कानून के मुताबिक ‘तीन तलाक’ पति-पत्नी के बीच संबंध-विच्छेद की प्रक्रिया है. नियमों के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में तीन माह का समय लगता है. इस अ‌वधि में सुलह की संभावनाओं पर विचार करने का भी प्रावधान है.
अदालत में कैसे आया यह मामला
वर्ष 2016 में उत्तराखंड की पैंतीस वर्षीय मुस्लिम महिला सायरा बानो ने अपने पति द्वारा तलाक दिये जाने के एक वर्ष बाद अदालत में तीन तलाक, निकाह हलाला को खत्म करने की मांग को लेकर एक याचिका दायर की थी.
याचिका में तलाक को संविधान के अनुच्छेद-14 और 15 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया. इस याचिका के साथ ही चार अन्य मुस्लिम महिलाएं आफरीन रहमान, गुलशन परवीन, इशरत जहां और अतिया साबरी की याचिकाएं भी संलग्न थीं. सायरा ने तलाक, निकाह हलाला, बहुविवाह आदि प्रथाओं को अवैधानिक, असंवैधानिक, भेदभावपूर्ण और लैंगिक समानता के सिद्धांतों के खिलाफ बताया था. विदित हो कि सायरा बानाे को उनके पति ने शादी के पंद्रह वर्ष बाद तीन तलाक दिया था.
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